पाकिस्तान: 'सेना और इमरान ख़ान के लिए ये हनीमून पीरियड है'

  • 29 जुलाई 2018
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इसी महीने की 25 जुलाई को पाकिस्तान में आम चुनाव हुए और सबसे अधिक सीटें मिलीं पूर्व क्रिकेटर इमरान ख़ान की तहरीक़-ए-इंसाफ़ पार्टी को, लेकिन पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया और इसीलिए पार्टी अब गठबंधन सरकार बनाने की कोशिशें कर रही है.

इस बीच चुनाव अभियान के दौरान और बाद में इमरान ख़ान पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदियों ने आरोप लगाया कि उन्हें सेना का समर्थन हासिल है.

बीते कई सालों में दुनिया में भी पाकिस्तान सरकार के फ़ैसलों में सेना के हस्तक्षेप की चर्चा आम तौर पर होती रही है.

हालांकि रिफ़ॉर्म्स के वादे के साथ सरकार बनाने की कोशिश करने वाले इमरान ख़ान ने सत्ता में आने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है और वो किसी ख़ास राजनीतिक परिवार से नहीं आते. कई बार वो सेना की आलोचना करते देखे गए हैं तो कई बार उन्होंने सेना का समर्थन भी किया है.

लेकिन पाकिस्तान की भावी सरकार में क्या वाकई सेना के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश होगी और बीते सालों में इमरान ख़ान का सेना के साथ संबंध कैसा रहा है.

पढ़िए वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार मोहम्मद हनीफ़ का नज़रिया-

सेना के साथ इमरान ख़ान के संबंध अच्छे रहे हैं. शुरू में जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा उस वक्त वो सेना औ ख़ुफ़िया विभाग की आलोचना करते थे.

लेकिन बाद में जब मुशर्रफ़ का मार्शल लॉ लगा तो उन्होंने मुशर्रफ़ की हिमायत की थी, लेकिन उनकी उम्मीदें पूरी नहीं हुईं तो वो मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ हो गए थे.

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पिछले चुनावों के बाद से इमरान ख़ान के ताल्लुक़ात सेना के साथ बेहतर रहे हैं और वो सेना के काफ़ी क़रीबी भी माने जाते हैं. उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी तो उन्हें सेना का आदमी कहते हैं.

लेकिन इन आरोपों के बारे में किसी के पास कोई पुख़्ता सबूत नहीं हैं. जो हालात सामने हैं उन्हें देखकर तो ऐसा ही लगता है कि सेना चाहती थी कि इमरान ख़ान चुनाव जीतें और प्रधानमंत्री बनें.

आप देखें उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी नवाज़ शरीफ़ और उनकी बेटी मरियम नवाज़ जेल में हैं. इतना ही नहीं नवाज़ शरीफ़ के कई साथियों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे जेलों में हैं. कई हैं जिन पर भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं.

एक तरह से देखा जाए तो इमरान ख़ान तो एक अच्छी पिच तैयार कर के दी गई थी ताकि वो आएं और ख़ूब खुल कर खेलें.

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क्या आने वाले दिनों में सरकार बनने के बाद इमरान ख़ान और सेना दोनों के बीच ठीक तालमल रहेगा और सेना के राजनीतिक फ़ैसलों में हस्तक्षेप की संभावनाएं क्या रहेंगी?

इसमें असल सवाल ये नहीं है कि इमरान ख़ान सरकार में सेना का कितना हस्तक्षेप होने देंगे बल्कि सवाल तो ये है कि सेना कुछ फ़ैसलों में इमरान ख़ान का कितना हस्तक्षेप होने देगी.

इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि फ़िलहाल ये नई-नई शादी की तरह है जिसमें दोनों में काफ़ी प्यार होता है, भविष्य को लेकर एक सुंदर सपना देखा जाता है. जो लोग धनी होते हैं वो लोग हनीमून पर जाते हैं... आजकल तो सेना और इमरान ख़ान दोनों का ही हनीमून पीरियड चल रहा है.

लेकिन इस हनीमून पीरियड की मियाद कम होती है, धीरे-धीरे रिश्तों में तल्ख़ियां बढ़ती हैं और छोटी-छोटी बातों पर उलझना शुरू हो जाता है. पाकिस्तान की सेना और जनता के बीच भी कुछ ऐसा ही होता है.

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Image caption 1999 में मुशर्रफ़ के साथ नवाज़ शरीफ़

नवाज़ शरीफ़ को एक वक्त में सेना का ही आदमी समझा जाता था, लेकिन बाद में दोनों के बीच असहमतियों का दौर शुरु हुआ और ये इतनी बढ़ गईं कि नवाज़ शरीफ़ को देश से निकाल दिया गया.

लेकिन नवाज़ शरीफ़ मुल्क लौटे और प्रधानमंत्री बने और एक बार फिर उनके लिए मुश्किलें आई हैं और वो जेल में हैं.

अगर प्रधानमंत्री के दफ्तर की बात करें तो ये ज़िम्मेदारी ही ऐसी है कि नेता जनता के समर्थन के साथ आता है और लोगों को उससे उम्मीदें होती हैं.

ऐसे में नेता को कभी ना कभी और कोई ना कोई ऐसा काम करना ही पड़ता है जिसे सेना का समर्थन हासिल नहीं होता. उदाहरण के तौर पर सुरक्षा से जुड़े मसले या फिर विदेश नीति से जुड़े मामलों में सेना की भी राय शामिल होती है.

कई बार ऐसा भी होता है कि सेना नहीं चाहती कि जनादेश के आधार पर चुने गए नेता इन मामलों में हस्तक्षेप करें.

लेकिन बात देश चलाने की है और कभी ना कभी ऐसी स्थिति आ जाती है कि सेना की पसंद से हटकर भी प्रधानमंत्री को फ़ैसला लेना होता है और फिर इसके बाद तनाव का माहौल पैदा हो जाता है.

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इमरान ख़ान के सुधार के वायदों के साथ एक नया पाकिस्तान बनने की कगार पर है.

हमें देखना होगा कि इतिहास अपने को दोहराएगा या फिर इस बार पाकिस्तान में एक नई मिसाल कायम होगी.

(बीबीसी संवाददाता मानसी दाश से बीतचीत पर आधारित)

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