जापान से क्यों हो गया था आइंस्टीन को प्यार

  • 30 जुलाई 2018
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पहली नज़र में हुआ मगर बेहद गहरा, ऐसा था जापान के लिए अल्बर्ट आइंस्टीन का प्यार.

इस महान भौतिक विज्ञानी को न सिर्फ़ जापान के समाज बल्कि यहां के लोगों की ज़िंदादिली ने भी अपना मुरीद बना लिया था.

1922 में कई देशों की यात्रा के लिए निकले आइंस्टीन मार्से से जापान के लिए रवाना हुए थे.

17 नवंबर को जब वो पहली बार जापान पहुंचे तो वहां के बाशिंदे धरती के सबसे लोकप्रिय लोगों में एक के दीदार का इंतज़ार कर रहे थे.

लोगों में आइंस्टीन के लिए कमाल की दीवानगी थी. जिन सभागारों में उन्हें अपने वैज्ञानिक कार्यों पर बात करनी थी, वे पूरी तरह भरे हुए थे.

ये पहला मौका था जब आइंस्टीन इस देश में आए थे. इस बारे में उन्होंने अपनी पर्सनल डायरी में भी लिखा था.

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Image caption उन्हें जापान के लोगों के संस्कार भी पसंद आए थे

'द ट्रैवल डायरीज़ ऑफ अल्बर्ट आइंस्टीन- द फ़ार ईस्ट, पैलस्टाइन ऐंड स्पेन 1922-1923' के संपादक ज़ीव रोज़नक्रैंट्स के साथ बातचीत में बीबीसी मुंडो को आइंस्टीन के आत्मविश्लेषी पहलू को जानने में मदद मिली.

ज़ीव रोज़नक्रैंट्स आइंस्टीन प्रॉजेक्ट पेपर के असिस्टेंट डायरेक्टर हैं. ये पेपर आइंस्टीन से जुड़े हजारों दस्तावेज़ों को ट्रांसलेट करके प्रकाशित करने वाले कैलिफ़ोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलजी का प्रॉजेक्ट है. अमरीका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और यरूशलन की हीब्रू यूनिवर्सिटी ने इसे स्पॉन्सर किया है.

जापान ने एक स्टार की तरह आइंस्टीन का स्वागत किया था. आइंस्टीन वहां की इन छह बातों से प्रभावित हुए थे:

1. व्यवहार कुशलता

थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के जनक को जापानी लोगों की शिष्टता, संस्कार और व्यवहार कुशलता बहुत पसंद आई थी.

रोज़नक्रैंट्स कहते हैं, "उन्हें जापानी लोगों की मुस्कुराहट और व्यक्तित्व रहस्यमय लगा. जापानियों की चीज़ों को व्यवस्थित करने की समझ और साफ-सफाई ने भी उन्हें मोह लिया."

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Image caption आइन्स्टीन को रहस्यमय लगी थी जापान के लोगों की मुस्कान

रिसर्चर कहते हैं, "टी सेरिमनी या चानोयू जापान की मौलिकता को प्रदर्शित करती है. उन्हें यह रिवाज भी पसंद आया."

इस समारोह में चाय देने से पहले ख़ास माहौल बनाना पड़ता है. जूते उतारने के बाद रिश्तेदारों, दोस्तों या मेहमानों के छोटे से समूह के साथ फर्श पर बैठकर इसका लुत्फ़ उठाया जाता है.

रोज़नक्रैंट्स कहते हैं, "ये एक ऐसा रिवाज है जिसमें बौद्ध धर्म या एशियाई संस्कृति की झलक मिलती है, जिसकी मूल भावना वर्तमान में जीने और इसका आनंद उठाने की है."

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Image caption टी सेरिमनी

जापानियों के शांतचित्त होने की भी आइंस्टीन ने तारीफ़ की है. रोज़नक्रैंट्स कहते हैं, "उन्होंने जापानियों के मिज़ाज की तुलना इतालवी लोगों से की है जो कि काफी मज़ेदार बात है. आइंस्टीन इटली के प्रति काफ़ी आकर्षित थे. इटली के लोगों की वास्तुशिल्प और कला के वो मुरीद थे मगर उनके लिए जापान का अनुभव बेहद ख़ास था. ऐसा, जो उन्होंने कहीं और महसूस नहीं किया था."

2. परिवेश के साथ समन्वय

इतिहासकार ज़ीव रोज़नक्रैंट्स कहते हैं, "जापान में तीन हफ़्ते रहने के बाद आइंस्टीन ने यहां के वास्तुशिल्प, घरों, मंदिरों और बागों के लिए अपना प्यार ज़ाहिर किया."

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Image caption नज़ारों पर फ़िदा हो गए थे आइन्स्टीन

"वो यहां के प्राकृतिक दृश्य से मुग्ध थे. उन्होंने देखा कि जापान के लोगों ने कैसे प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाया है और यह बात उनकी कला में भी नज़र आती है. वह यहां की कला, ख़ासकर दृष्य कला से काफी प्रभावित हुए. वैसे तो वह चित्रकला और काष्ठकला से प्रभावित हुए थे मगर उन्होंने वहां के थिएटर को "बेहद आकर्षक" पाया था."

रोज़नक्रैंट्स बताते हैं कि हालांकि गायन ही ऐसी कला थी, जिसने उन्हें थोड़ा परेशान किया. इतिहासकर बताते हैं कि ये कला उन्हें "अनोखी और अप्रिय" लगी थी.

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Image caption जापानी चित्रकला से प्रभावित हुए थे आइन्स्टीन

3. पश्चिम के मुक़ाबले काफ़ी कम भौतिकवाद

इतिहासकार रोज़नक्रैंट्स बताते हैं, "आइंस्टीन की कई पहचान थीं- जर्मन, स्विस, यहूदी, यूरोपीय और पश्चिमी. उनकी ट्रैवल डायरियों में हम देखते हैं कि वो अपने रुख और विचारों के आधार पर काफी यूरोपीय थे. इसी नज़रिए से उन्होंने जापान और उन देशों को देखा, जहां पर वो गए. वो यूरोपीय चश्मे से उन्हें देखते रहे."

रोज़नक्रैंट्स बताते हैं, "मज़ेदार बात यह है कि उनकी डायरियां उनके सार्वजनिक भाषणों और निजी लेखन के फ़र्क को दिखाती हैं. सार्वजनिक भाषणों में वह काफी प्रगतिवादी और मानवतावादी होते थे जिसमें सहिष्णुता की बात की जाती थी. मगर अपनी कुछ निजी टिप्पणियों में उन लोगों के प्रति उनके पूर्वग्रह नज़र आते हैं जिनसे वो मिले."

"उनके विचार में चीनी लोगों के मुक़ाबले जापानी काफी सकारात्मक थे. उन्होंने चीनियों को सुस्त बताया था. कुछ लेखों में उन्होंने यूरोपियों के ख़ुद को श्रेष्ठ समझने वाले विचारों को खारिज किया. उन्होंने यूरोपीयों को "संवेदनहीन और भौतिकवादी" करार दिया था."

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उन्होंने जापानियों को चेताया था कि वे बहुत ज्यादा पश्चिमी और भौतिकवादी न बनें. रोज़नक्रैंट्स के मुताबिक आइंस्टीन ने लिखा था, "मैं नहीं चाहता कि जापान पश्चिमी समाज की बहुत ज्यादा वस्तुवादी प्रकृति से प्रभावित हो."

आइंस्टीन के लिए जापानी लोग पश्चिमी लोगों के मुकाबले कम भौतिकवादी थे.

एक्सपर्ट बताते हैं कि एक तरफ़ तो वह चाहते थे कि जापान पश्चिमी मूल्यों को न अपनाएं, मगर दूसरी तरफ वह चाहते थे कि वह जापान पश्चिमी विज्ञान और शिक्षा को अपना ले.

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Image caption आइंस्टीन नहीं चाहते थे कि जापान के लोग पश्चिमी मूल्यों को अपनाएं

रोज़नक्रैंट्स बताते हैं, "अपनी डायरी के एक अन्य भाग में उन्होंने लिखा है कि जापान के लोगों में विज्ञान के प्रति कम जिज्ञासा है"

मगर विज्ञान के प्रति जिस जिज्ञासा पर आइंस्टीन ने सवाल उठाया था, उसी जिज्ञासा के कारण जापान हाल के दशकों में विज्ञान के मामले में शानदार प्रदर्शन कर रहा है.

उदाहरण के लिए जापान ने 25 नोबेल प्राइज़ जीते हैं औऱ उनमें से ज़्यादातार विज्ञान से हैं. इस मामले में कोई भी पश्चिमी देश उनका मुक़ाबला नहीं कर सकता.

1949 से लेकर अब तक जापान के वैज्ञानिकों ने सात मौकों पर भौतिक विज्ञान में नोबेल जीता है, रसायन विज्ञान में छह मौकों पर और मेडिसिन में चार मौकों पर. तीन नोबेल साहित्य के लिए मिले हैं और एक शांति के लिए.

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Image caption आज विज्ञान के मामले में बहुत आगे है जापान

4. सामूहिक हितों को अहमियत

आइंस्टीन को जापानी लोगों की जो बात पसंद आई, उसे उन्होंने सामाजिक समरसता का नाम दिया है.

रोज़नक्रैंट्स के मुताबिक आइंस्टीन ने पाया कि लोग अपनी निजी ज़रूरतों के बजाय सामूहिक ज़रूरतों को ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं.

"उन्होंने पाया कि जापानी समाज पश्चिमी देशों के मुकाबले कम व्यक्तिवादी है और काफी विनम्र भी है. जापान में गुजारे छह हफ्तों के दौरान उन्हें अपने पूर्वग्रहों को तोड़ने में कामयाबी मिली थी मगर चीन में उनके साथ ऐसा नहीं हो पाया था. जापान में वो शुरू से सकारात्मक रहे क्योंकि वो कुछ जापानी लोगों के साथ करीबी रिश्ता बनाने में कामयाब रहे थे."

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शोधकर्ता रोज़नक्रैंट्स बताते हैं, "इसी तरह की दोस्ती के कारण वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि जापान के परिवार पश्चिम के मुकाबले ज्यादा मज़बूत होते हैं. वो जिनके यहां रुके थे, उस परिवार से प्रभावित थे. उन्हें एक प्रोगेसिव पब्लिकेशन के निदेशक ने जापान बुलाया था. उनके घर पर लोगों के बीच तारतम्य देखकर वह हैरान रह गए थे. उन्होंने लिखा था कि जिस तरह की सामाजिक समरसता जापान में है, उसे पश्चिम को सीखना चाहिए."

5. देश के लिए प्यार

आइंस्टीन जापान का दौरा उस समय कर रह रहे थे जब जर्मनी राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुज़र रहा था.

चरमपंथी और कट्टर दक्षिणपंथियों के हाथों वहां कई हत्याएं हुईं. ख़ासकर यहूदियों को निशाना बनाया गया.

जून 1922 को जर्मनी के विदेश मंत्री वॉल्थर रादेनॉ की हत्या हो गई. वो यहूदी थे. यह घटना आइंस्टीन के यात्रा पर निकलने से कुछ महीने पहले ही हुई थी."

रोज़नक्रैंट्स बताते हैं, "इसके बाद आइंस्टीन जर्मनी छोड़ने को लेकर पक्का इरादा बना चुके थे. मगर कुछ हफ्तों बाद उन्होंने अपना फैसला बदला और सोचा कुछ महीनों के लिए बर्लिन से दूर रहा जाए. इसी दौरान उन्होंने ये यात्रा की."

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"ये बात साफ थी कि आइंस्टीन राष्ट्रवाद को पसंद नहीं करते थे मगर वो जापानियों की देशभक्ति और देश के लिए उनके प्यार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाए. वो इस बात से प्रभावित हुए कि जो जापानी लोग उनके साथ यात्रा कर रहे थे, वे उस समय कितने उत्साहित हो गए जब उनका जहाज़ जापान पहुंचा."

रोज़नक्रैंट्स के मुताबिक़ आइंस्टीन को ये बात भी मज़ेदार लगी कि कुछ जापानी अपने राजा को "भगवान" मानते थे.

6. ख़ुशी का रास्ता

जब आइंस्टीन टोक्यो के इंपीरियल होटल के अपने कमरे में थे, एक संदेशवाहक ने उनका दरवाज़ा खटखटाया. उनके लिए एक पैकेट आया था.

इस पैकेट को लेने के बाद आइंस्टीन ने देखा कि टिप के तौर पर देने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे.

उन्होंने संदेशवाहक को रुकने के लिए कहा, होटल के लेटरहेड से दो पन्ने निकाले और पेन उठाया.

एक पन्ने पर उन्होंने लिखा, "कामयाबी के पीछने भागने और लगातार अधीर रहने के बजाय विनम्रता और शांति भरा जीवन जीने से ज़्यादा ख़ुशी मिलती है." दूसरे पन्ने पर उन्होंने लिखा, "जहां चाह, वहां राह."

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Image caption जापान की राजधानी में लगी आइन्स्टीन की एक प्रतिमा

इसके बाद उन्होंने इन पन्नों पर हस्ताक्षर कर दिए. आइंस्टीन ने ये पन्ने संदेशवाहक को दिए और कहा कि एक दिन इन पन्नों की कोई कीमत होगी.

अक्तूबर 2017 में यरूशलम में हुई नीलामी ये दोनों नोट 1,560,000 अमरीकी डॉलर में बिके.

जापान की राजधानी में उन्होंने जो लिखा था, उसे आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ़ हैपीनेस कहा जाता है.

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Image caption आइन्स्टीन ने संदेशवाहक को यही नोट दिए थे

हालांकि ये साफ़ नहीं है कि उनके मन में ये विचार पहले ही आ गए थे या फिर जापान में रहकर उन्हें इनकी प्रेरणा मिली. मगर यह तो तथ्य है कि इन्हें जापान में लिखा गया था.

वॉल्टर आइसैकसन की बायोग्राफ़ी "आइंस्टीन: हिज़ लाइफ़ ऐंड द यूनिवर्स" के मुताबिक उन्होंने अपने बच्चों को भेजे एक ख़त में अपनी यात्राओं के बारे में क्या लिखा था, पढ़िए-

"मैं जितने भी लोगों से मिला, जापानी मुझे सबसे पसंद आए क्योंकि वे शालीन, समझदार, विचारशील और कला के प्रति झुकाव रखने वाले हैं."

'ट्रंप, क्या आपके पास हैं विज्ञान के शिक्षक?'

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