तस्वीरों में: शरणार्थी कैंप में ऐसी है ज़िंदगी

  • 8 अगस्त 2018
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दक्षिण सूडान में 2013 के दौरान गृह युद्ध शुरू हुआ था. तब से वहां के 10 लाख से ज़्यादा लोग सीमा पार कर पड़ोसी देश युगांडा पहुंच चुके हैं.

ये लोग वहां के शरणार्थी शिविरों में ज़िंदगी बसर कर रहे हैं. टॉमी ट्रेन्कार्ड इन कैंपों में पहुंचे और वहां मौजूद चीज़ों को कैमरे में कैद किया.

टॉमी की ये तस्वीरें शरणार्थी कैंपों में ज़िंदगी की झलक पेश करती हैं.

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Image caption ये जूते 32 साल के ओकोंगो चार्ल्स के हैं. रेंग में हुई लड़ाई के दौरान वो अपने बच्चों से बिछड़ गए थे. अब चार्ल्स के बच्चे उनकी मां के साथ जुबा में रहते हैं.

टॉमी कहते हैं, "संकट के शुरुआती दिनों में यहां ज़िंदगी मुश्किल थी. लेकिन धीरे-धीरे यहां रहने वाले शरणार्थियों के हालात सुधारने लगे."

शरणार्थियों के प्रति युगांडा की नीति दूसरे देशों के लिए मिसाल है.

"हर परिवार को खेती करने के लिए ज़मीन का टुकड़ा दिया गया है. वो मुफ्त में देश में व्यापार कर सकते हैं. यहां के शरणार्थी कैंपों में रहने वालों की ज़िंदगी काम करते हुए, खाना बनाते हुए, खेती, खेल-कूद और ना खत्म होने वाले इंतज़ार में बीतती है."

शांति समझौते पर हस्ताक्षर के बाद शरणार्थियों के स्वदेश लौटने की उम्मीदें बढ़ गई हैं.

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Image caption मिट्टी की दीवार पर टंगे इस पोस्टर को पढ़कर बच्चे जानवरों के नाम याद करते हैं. ये घर बिडी बिडी शिविर में रहने वाली लोना किजी का है. 2016 को दक्षिण सूडान के सेंट्रल इक्वेटोरिया राज्य में जब हिंसा भड़की तो लोना भागकर इस शरणार्थी शिविर में आ गई थीं.
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Image caption बिडी बिडी शिविर में ही रहने वाले मलिस जस्टिन की झोपड़ी.
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Image caption खिलौने वाली कार से खेलता एक बच्चा. यहां पूरे शिविर में बच्चे ऐसी कारों से खेलते दिख जाएंगे. इन कारों को बोतलों के ढक्कन और खराब प्लास्टिक से बनाया जाता है.
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Image caption अफ्रीका में खेला जाने वाला एक खेल. इस खेल में ज़मीन में गड्ढे बनाकर कंकड़ डाले जाते हैं.
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Image caption एक सहायता समूह ने मलिस को खेती करने के लिए बीज, उपकरण और ट्रेनिंग दी है.
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Image caption बिडी बिडी कैंप में रहने वाले शरणार्थियों मे ज़्यादातर बच्चे हैं. एक हिंसक दृश्य का चित्र बनाता रिचर्ड.
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Image caption शरणार्थियों को दिया जाने वाला खाना.
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Image caption सजावट के लिए मिट्टी की दीवार पर बनाया गया एक ट्रक का चित्र.
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Image caption शरणार्थी टेंट के बाहर रखा एक सोलर पैनल. शिविर में बिजली आती-जाती रहती है. इसलिए कुछ शरणार्थियों ने सोलर पैनल खरीद लिए हैं तो कुछ को सहायता समूहों ने दान में दिए हैं.
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Image caption कील पर टंगी टॉर्चें और ईसा मसीह का निशान.
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Image caption नील नदी का पानी साफ करने के बाद शरणार्थियों को मुहैया कराया जाता है. टेबल पर रखे पानी के सैंपल.
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Image caption 42 साल के मार्टिन वारू ने अपने खेतों में भिंडी उगाई है. वो यहां अपनी पत्नी और नौ बच्चों के साथ रहते हैं.

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