क्या तुर्की दुनिया को आर्थिक संकट के जाल में फंसाएगा

  • 14 अगस्त 2018
करेंसी इमेज कॉपीरइट Getty Images

अमरीकी डॉलर के मुक़ाबले तुर्की की मुद्रा लीरा बेहाल है. साल 2018 में डॉलर के मुक़ाबले लीरा 70 फ़ीसदी टूट चुकी है और अब ये दुनिया की सबसे कमज़ोर मुद्रा में शुमार है. पिछले हफ्ते लीरा में 20 फ़ीसदी की गिरावट आई थी और अब भी इसकी गिरावट थमने के आसार नज़र नहीं आ रहे हैं.

डॉलर के मुकाबले भारत का रुपया भी लगातार गिरता जा रहा है और हर दिन एक नया रिकार्ड बना रहा है.

जानकारों के मुताबिक ये लीरा का ही असर है कि यूरोप और एशिया की कई करेंसी दबाव में हैं.

पर सवाल ये है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

इस सवाल का जवाब देने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि तुर्की का संकट आख़िर है क्या और इससे दूसरे देशों पर कैसे असर पड़ रहा है.

कुछ समय पहले तक दुनियाभर की आर्थिक शक्तियों में तुर्की को वही स्थान हासिल था जो भारत और चीन को हासिल है. यानी तीनों देश तेज़ी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं थी. इन देशों की ग्रोथ दुनिया के अन्य देशों के मुक़ाबले काफ़ी अच्छी थी, हालाँकि ग्रोथ को मापने की नींव कमज़ोर थी और ये 2008 के आर्थिक संकट पर आधारित है.

साल 2008 के इस मंदी के माहौल के बाद अमरीका समेत दुनिया के तमाम विकसित देशों ने ग्रोथ हासिल करने के लिए ब्याज दरें घटाई ताकि उद्योगों को सस्ता कर्ज़ मिल सके. तुर्की ने इस माहौल का खूब फ़ायदा उठाया और वहाँ की कंपनियों को विदेशों ख़ासकर कई यूरोपीय बैंकों से सस्ता कर्ज़ मिला, जिसके दम पर वहाँ के रियल एस्टेट कारोबार और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को रफ़्तार मिली.

इमेज कॉपीरइट AFP

यूरोपीय बैंकों पर आफ़त

तुर्की के बैंक विदेशी बैंकों से डॉलर में कर्ज़ जुटा रहे थे और फिर इसे घरेलू अर्थव्यवस्था में झोंक रहे थे. कर्ज़दाता बैंक भी खुश थे कि जिस तरह से तुर्की की कंपनियां अपनी आय और मुनाफ़ा दिखा रही थी, उससे वे आश्वस्त थे कि उनका पैसा सुरक्षित है और इसके डूबने की कोई आशंका नज़र नहीं आ रही थी.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत और चीन के मुक़ाबले तुर्की विदेशी मुद्रा के कर्ज पर अधिक निर्भर था और यही उसके मौजूदा संकट की बड़ी वजह है. तुर्की की अर्थव्यवस्था में विदेशी मुद्रा का दबदबा है और कुल कर्ज़ में 70 फ़ीसदी से अधिक हिस्सा डॉलर में लिया गया कर्ज़ है.

बैंक ऑफ़ इंटरनेशनल सेटलमेंट (बीआईएस) के मुताबिक तुर्की की मुद्रा में भारी गिरावट के बाद यूरोपीय बैंक मुश्किल स्थिति में हैं. स्पेन के बैंक ने तुर्की को 83 अरब से अधिक का कर्ज़ दिया है, जबकि फ्रांस का 38.4 अरब डॉलर, इटली के बैंकों का 17 अरब डॉलर और जापान के बैंकों का 14 अरब डॉलर तुर्की की अर्थव्यवस्था में लगा है.

ब्रिटेन ने भी तुर्की को 19 अरब डॉलर का कर्ज़ दिया है, जबकि तुर्की के गले में फंदा डालने वाले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के देश अमरीका के बैंकों के भी 18 अरब डॉलर तुर्की में डूबने की कगार पर हैं. हालाँकि अमरीकी बैंकों का अधिकतर पैसा कर्ज़ की मद में न होकर तुर्की के शेयर बाज़ारों पर लगा है.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तुर्की के स्टील और एल्यूमीनियम पर आयात शुल्क बढ़ाकर दोगुना कर दिया है. तुर्की की मुद्रा लीरा में जारी गिरावट को ट्रंप के इस फ़ैसले से और धक्का लगेगा.

डॉलर के मुक़ाबले थरथर कांप रहा रुपया, ये है वजहें

सीमित विकल्प

तुर्की के पास लीरा को संभालने के विकल्प भी सीमित हैं. डर है कि अर्थव्यवस्था में आई मंदी से महंगाई भी बढ़ेगी, जो अभी 15 फ़ीसदी से ऊपर है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन लीरा को दुरुस्त करने के लिए ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं, जिससे महंगाई और बढ़ेगी. महंगाई दर का ये आंकड़ा कितना डराने वाला है, इसका अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि पड़ोस के यूरोपीय देशों में महंगाई दर 2 फ़ीसदी के लगभग है.

ख़तरा ये है कि लीरा का संकट दूसरे विकासशील देशों को भी अपनी चपेट में न ले ले. कई विश्लेषक अंदाज़ा लगा रहे हैं कि तुर्की का संकट 2008 के ग्रीस संकट जैसा है, हालांकि इसकी दूसरे जानकार इस आशंका को इस आधार पर ख़ारिज करते हैं कि तुर्की की अर्थव्यवस्था ग्रीस से चार गुना बड़ी है और इसकी आबादी भी ग्रीस के मुक़ाबले सात गुना है.

इस संकट से निपटने के लिए तुर्की के पास विदेशी मुद्रा भंडार नहीं है. तुर्की का विदेशी मुद्रा भंडार 130 अरब डॉलर का है और विदेशी कर्ज़ की बात करें तो ये तकरीबन 180 अरब डॉलर का है.

डॉलर के मुकाबले भारत और पाकिस्तान का रुपया भी अच्छी हालत में नहीं है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पाकिस्तानी रुपया इस साल के शुरुआती सात महीनों में डॉलर के मुकाबले अब तक 17.6 फ़ीसदी लुढ़क चुका है, जबकि भारतीय रुपया 9 फ़ीसदी कमज़ोर हुआ है. इंडोनेशिया का रुपैया डॉलर के मुक़ाबले साढ़े आठ फ़ीसदी टूटा है, जबकि अफ़ग़ानी में आठ फ़ीसदी से अधिक की गिरावट आई है.

भारत के लिए अच्छी ख़बर ये है कि उसका तुर्की की अर्थव्यवस्था में बहुत कम एक्सपोज़र है. एशियाई देशों में तुर्की में सबसे अधिक निवेश जापान ने किया है, दक्षिण कोरिया ने भी तुर्की को 17 अरब डॉलर का कर्ज़ दिया है.

एक्सपर्ट मानते हैं कि भारतीय रुपये की गिरावट का लीरा कनेक्शन ना के बराबर है. भारतीय रिज़र्व बैंक ने चूंकि रुपये की गिरावट को थामने के लिए ठोस कदम नहीं उठाएं हैं या यूँ कहें कि रिज़र्व बैंक का ये अनुमान है कि रुपये के इस स्तर पर दखल देने की ज़रूरत नहीं है.

भारतीय रुपये की गिरावट की मुख्य वजह पेट्रोल, डीज़ल की ख़रीद के लिए डॉलर में भुगतान करना है. भारत अपने कुल डॉलर ख़रीद का 70 फ़ीसदी से अधिक पेट्रोलियम उत्पादों की ख़रीद पर खर्च करता है.

भारतीय अठन्नी के बराबर हुआ पाकिस्तानी रुपया

क्या चीन को भारतीय मुद्रा छापने का ठेका मिला है?

10 हफ़्तों में ख़ाली हो जाएगा पाकिस्तान का ख़ज़ाना!

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए