ईरान को आख़िर अयातुल्लाह ख़ुमैनी से क्या मिला

  • 2 फरवरी 2019
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Image caption अयातुल्लाह ख़ुमैनी

यह 20वीं सदी की प्रमुख घटनाओं में से एक थी.

40 साल पहले धार्मिक नेता अयातुल्लाह ख़ोमैनी देश से निष्कासित किए जाने के बाद ईरान लौटे थे और उसके बाद उन्होंने इस्लामी क्रांति की शुरुआत की थी.

बीबीसी के जॉन सिम्पसन उस हवाई जहाज में मौजूद थे जो अयातुल्लाह को ईरान की राजधानी तेहरान लेकर आया था.

पेरिस के बाहर न्यूफ्ले-ला-साटो गांव पिछले 40 सालों में बहुत नहीं बदला है लेकिन अयातुल्लाह के ईरान वापस जाने के कुछ समय बाद ही उनके मुख्यालय को उड़ा दिया गया था.

पिछले 40 सालों में न्यूफ्ले के बाहर दुनिया में अपार बदलाव देखने को मिले हैं और जो कुछ भी इस शांत जगह में हुआ था, उसकी इस बदलाव की प्रकिया में अहम भूमिका रही है.

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भयावह ग़लतफ़हमी

1978 में माहौल काफ़ी ख़राब हो गया था. अयातुल्लाह को निष्कासितों की तरह इराक़ में शियाओं के पवित्र शहर नजफ़ में कड़े नियंत्रण में रखा गया था.

उस समय इराक़ में सद्दाम हुसैन का शासन था और ईरान के शाह ने उन्हें अयातुल्लाह को देश से निष्कासित करने के लिए कहा था. यह भयावह ग़लतफ़हमी थी.

अयातुल्लाह इसके बाद फ़्रांस चले गए और अचानक पूरी दुनिया से अपनी बात कहने में सक्षम हो गए.

अपनी क्रूरता और किसी तरह का समझौता नहीं करने की ज़िद के कारण उन्होंने एक अंतरराष्ट्रीय कद हासिल किया.

जनवरी, 1979 में जब ईरान की सत्ता से शाह बाहर हुए, अयातुल्लाह के लिए घर वापसी का रास्ता खुल गया और उन्होंने शाही व्यवस्था को फिर उखाड़ फेंका.

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बीबीसी के जॉन सिम्पसन का वो अनुभव

मैंने किसी तरह उनके चार्टर प्लेन में दो टिकटों का इतंज़ाम किया, एक मेरे लिए और दूसरा हमारे कैमरामैन के लिए.

बीबीसी ने मुझे उनके साथ नहीं जाने का आदेश दिया था, लेकिन मैं अपने उत्साह पर काबू नहीं कर पाया और चला गया.

मुझे थोड़ी ही देर में अहसास होने लगा कि मैंने ग़लती कर दी है. उड़ान के दौरान अयातुल्लाह के एक आदमी ने यह घोषणा की कि ईरान के वायु सेना उनके जहाज को ईरान की सीमा में घुसते ही मार गिराने की योजना बना रही है.

ईरान की वायु सेना उस वक़्त शाह के प्रति वफ़ादार थी.

इतना सुनते ही हम पत्रकार भाव शून्य हो गए और अयातुल्लाह के बाक़ी आदमी ख़ुशी से रोने लगे थे. वो शहीद होना चाहते थे.

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इस्लामी गणतंत्र की स्थापना

अयातुल्लाह जहाज की पहली श्रेणी में बैठे थे और हम उनका इंटरव्यू लेने के लिए आगे बढ़े. उन्होंने हमें पहले देखा और फिर नज़रअंदाज़ कर जहाज की खिड़की से बाहर देखने लगे.

इसी बीच एक पत्रकार ने उनसे पूछा- निष्कासित किए जाने के इतने साल बाद आप घर वापस जा रहे हैं, कैसा महसूस कर रहे हैं.

अयातुल्लाह ने जवाब दिया, "कुछ भी महसूस नहीं कर रहा हूं."

वायु सैनिकों ने हम पर हमला तो नहीं किया पर तेहरान एयरपोर्ट के ऊपर जहाज को चक्कर लगाने पड़ रहे थे. जहाज लैंड कराने के लिए नीचे के अधिकारियों से बातचीत चल रही थी. हम लोगों का दम अब जहाज के भीतर घुटने सा लगा था.

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Image caption देश के निष्कासित किए जाने के बाद फ्रांस के अपने घर में नमाज अता करते अयातुल्लाह ख़ुमैनी

कुछ देर बाद हम तेहरान एयरपोर्ट पर लैंड कर पाए और अयातुल्लाह के स्वागत में विशाल भीड़ एयरपोर्ट पर उमड़ पड़ी थी.

शायद मानव इतिहास की यह सबसे बड़ी इंसानों की जुटान थी.

ईरान में इस्लामी गणराज्य की विधिवत स्थापना हो चुकी थी और दुनिया भर के मुस्लिम मत एकजुट हो रहे थे और यहां से पश्चिमी उदारवाद के ख़िलाफ़ आंदोलन साकार होना शुरू हुआ.

इन सभी योजना की तैयारी फ़्रांस के गांव में हो चुकी थी, जहां की चर्चाएं ट्रैफ़िक जाम और बर्फ़बारी के इर्द-गिर्द होती हैं.

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अयातुल्लाह ख़ुमैनी की कहानी

अयातुल्लाह ख़ुमैनी ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेता थे, जिन्होंने साल 1979 में ईरान को दुनिया का पहला इस्लामी गणतंत्र बनाया था.

उनका असल नाम रुहोल्ला ख़ुमैनी था. ख़ुमैनी का जन्म मध्य ईरान के कोह्मेन में हुआ था. बाद में वो एक धार्मिक विद्वान बने और 1920 के शुरुआती दशक में उन्हें शिया विद्वान होने के नाते 'अयातुल्लाह' नाम दिया गया.

ईरान का शाह शासन पश्चिमी बदलावों का समर्थक था और अयातुल्लाह इसका खुल कर विरोध करते थे. इसी विरोध की वजह से उन्हें साल 1962 में गिरफ़्तार कर लिया गया था.

उनकी गिरफ़्तारी ने उन्हें राष्ट्रीय नायक बना दिया और फिर साल 1964 में उन्हें देश से निष्कासित कर दिया गया. निष्कासन के दौरान वो तुर्की, इराक़ और फ्रांस में रहे.

यहां से वो अपने समर्थकों से शाह को सत्ता से उखाड़ फेंकने का आग्रह करते रहे. 1970 के दशक के अंत तक शाह की लोकप्रियता घटने लगी और देश में चारों तरफ़ दंगे फैल गए, प्रदर्शन और हड़ताल होने लगी.

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शाह की सरकार का पतन

जनवरी, 1979 को शाह की सरकार का पतन हो गया और वो अपने परिवार के साथ देश छोड़ कर भाग गए.

एक फ़रवरी, 1979 को अयातुल्लाह ख़ुमैनी ईरान की सत्ता पर क़ाबिज हुए. राष्ट्रीय जनमत संग्रह में उन्हें शानदार जीत हासिल हुई.

उन्होंने इस्लामी गणराज्य की घोषणा की और वो ईरान के राजनीतिक और धार्मिक नेता चुने गए. पूरे देश में इस्लामी क़ानून लागू कर दिया गया.

सितंबर 1980 में शट अल-अरब जलमार्ग पर हुए विवाद के बाद इराक़ ने ईरान पर आक्रमण कर दिया, जिसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी.

युद्ध आठ सालों तक चला और इसमें क़रीब 10 लाख लोग मारे गए. इसमें दोनों पक्ष अपना लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रहे.

युद्ध ने ईरान में इस्लामी क्रांति के उत्साह को ठंडा कर दिया और वहां के कुछ लोग अपने नेता की क्षमता पर सवाल उठाने लगे.

फ़रवरी 1989 में अयातुल्लाह ख़ुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ फतवा जारी किया, जिसमें उन्होंने मुसलमानों को उनकी हत्या करने का आदेश दिया था.

इस पर अंतरराष्ट्रीय विवाद छिड़ गया. रुश्दी के ख़िलाफ़ फतवा उनके उपन्यास 'द सैटेनिक वर्सेज' की वजह जारी किया गया था.

चार जून, 1989 को अयातुल्लाह ख़ुमैनी की मौत हो गई.

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