ये कौन से इमरान ख़ान होंगे, खिलाड़ी या राजनेता?

  • 19 अगस्त 2018
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इमरान अहमद ख़ान खिलाड़ी ज़्यादा अच्छे हैं या राजनेता? खिलाड़ी तो सब मानते हैं और इसका बड़ा सबूत सन 1992 का क्रिकेट वर्ल्ड कप है.

उनके बारे में एक बात बड़ी स्पष्ट है कि अपनी धुन के पक्के हैं. जो कसम वह ले लेते हैं उसे पूरा किए बग़ैर आराम से नहीं बैठते हैं.

सन 1992 में टार्गेट अगर वर्ल्ड कप जीतना था तो उसके लिए किसे टीम में रखना है, किसे नहीं उसका फ़ैसला करके उस पर डट जाते थे. सारी दुनिया और वरिष्ठ चाहे विरोध करते रहें, जैसे कि मियांदाद के बारे में एक बार विवाद खड़ा हो गया था, लेकिन वह अपनी ही मनवाते थे.

इसे धुन का पक्का कहें या ज़िद्दीपन, वह जो कसम ले लेते थे उससे पीछे हटते नहीं थे.

अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि राजनीति के साथ-साथ प्रधानमंत्री बनना उनके लिए फ़ायदेमंद साबित होगा या नहीं?

22 साल पहले शुरुआत में न करने के बाद अचानक राजनीति के मैदान में उतरकर सरकार बनाना या प्रधानमंत्री बनना उनकी प्रतिज्ञा बन गया था और उन्होंने इसे पूरा कर लिया है.

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क्या जीत से आगे सोच पाएंगे

एक अच्छे खिलाड़ी के लिए सबसे बड़ी बात जीत होती है जिसके लिए वह जीतोड़ मेहनत करता है और तन-मन-धन की बाज़ी लगा देता है. जीत उसके लिए किसी भी खेल का अंजाम होता है उसकी शुरुआत नहीं.

केंद्र में सरकार बनाने की राह में उन्हें छोटी जीत सूबा ख़ैबर पख़्तूनख़्वां में साल 2013 के चुनाव में सत्ता मिलना भी था.

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ इस प्रांत में ज़बरदस्त तरक़्क़ी के गुण गाती है और 25 जुलाई की बड़ी कामयाबी के पीछे इसे कारण बताती है. लेकिन इमरान के आलोचकों के मुताबिक़ उन्होंने पेशावर में नेट प्रेक्टिस का मौक़ा गंवा दिया था.

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इमरान की पूर्व पत्नी रेहम ख़ान ने अपनी किताब में भी लिखा है कि उन्होंने इमरान ख़ान को पेशावर में रहकर प्रांत की तरक़्क़ी में अहम भूमिका निभाने की सलाह कई बार दी, लेकिन ख़ान साहब ने एक न सुनी.

निजी मुलाक़ात में इसकी एक वजह उन्होंने मुझे बताई थी कि 'फिर वह केंद्र पर ध्यान नहीं दे सकेंगे' यानी उनके नज़दीक बड़ा लक्ष्य हमेशा से था.

इमरान ख़ान ने अगर कुछ सीखा तो वो ये था कि किसी काम की जवाबदेही के बिना नए संस्थान नहीं चल पाएंगे. भ्रष्टाचार का इस प्रांत में ख़ात्मा तो नहीं हुआ, लेकिन तहरीक-ए-इंसाफ़ को समझ आ गया कि पुरानों को ही दोबारा उपयोगी बनाना बेहतर है.

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ये कौन से इमरान हैं

पाकिस्तान का 22वां प्रधानमंत्री बनने वाला इमरान ख़ान कौन-सा इमरान ख़ान होगा, खिलाड़ी या राजनेता? उम्मीद ही की जा सकती है कि वह खिलाड़ी नहीं होगा जो सिर्फ़ जीत के लिए खेलता है.

क्या वह पीएम बनने के बाद सरकारी गतिविधियों को गंभीरता से ले सकेंगे. उन्हें एक खिलाड़ी नहीं बल्कि प्रधानमंत्री की तरह लगातार बैठकों में भाग लेना होगा, घरेलू और विदेशी प्रतिनिधिमंडल के साथ मुलाक़ातें करनी होंगी. अब तक तो उन्हें दिन में एक पार्टी मीटिंग ही करते देखा गया है.

बीते दिनों एक ब्रिटिश अख़बार से इंटरव्यू में उनका कहना था कि वह सामाजिक जीवन के लिए अब बहुत बूढ़े हो चुके हैं.

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इमरान ख़ान की एक आदत उन्हें मुश्किल में डाल सकती है और वह आदत है किसी से 'डिक्टेशन' न लेने की. सुनते तो वह शायद सब की हैं, लेकिन हमेशा करते अपने मन की ही हैं. इस सूरत में वह दूसरी प्रांतीय सरकारों के लिए कितने स्वीकृत होंगे यह फ़िलहाल साफ़ नहीं है.

इमरान ख़ान के साथ जुड़ा एक सवाल ये भी है कि उन्हें आख़िर राजनीति के मैदान में मंज़िल तक पहुंचने में इतना वक़्त क्यों लगा.

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पाकिस्तान में तो कई बड़े राजनेता आनन-फ़ानन या तो दूसरे रास्तों से सत्ता के गलियारों की सैर करना शुरू कर देते हैं तो फिर उन्हें यहां पहुंचने में इतनी देर क्यों लगी?

कुछ समीक्षकों के अनुसार, 'वह अपनी राजनीति की शुरुआती नर्सरी में उच्च और शायद किताबी विचार के क़ैदी बने रहे. आदर्शवाद के साए में रहे. अपने विचार पर किसी क़िस्म की सौदेबाज़ी से दूर रहे, लेकिन सन 2013 के आम चुनावों में जीत को इतना क़रीब से देखने के बाद शायद उन्होंने इससे दोबारा दूर न जाने का निश्चय कर लिया था. फिर क्या था अपने ही बनाए हुए नियमों में धीरे-धीरे नरमी दिखाना शुरू की. यही समझौते शायद उन्हें प्रधानमंत्री हाउस की दहलीज़ पर ले आए हैं.'

वह कितना परिवर्तन ला पाते हैं इसके लिए हमें ज़्यादा इंतज़ार शायद न करना पड़े. उनके हनीमून पीरियड में ही इसके संकेत मिल जाएंगे. जीतना शायद आसान था, लेकिन जनता की उम्मीदों के पहाड़ पर चढ़ना अगला लक्ष्य होना चाहिए.

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