इस्लाम से पहले मूर्ति पूजा होती थी काबा में

  • 20 अगस्त 2018
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दुनिया भर के लाखों मुसलमान हज के लिए हर साल सऊदी अरब पहुंचते है. पांच दिनों तक चलने वाली यह हज यात्रा इस साल रविवार से शुरू हुई है.

सऊदी अरब के मक्का शहर में काबा को इस्लाम में सबसे पवित्र स्थल माना जाता है. इस्लाम का यह प्राचीन धार्मिक अनुष्ठान दुनिया के मुसलमानों के लिए काफ़ी अहम है. इस साल उम्मीद है कि हज पर 20 लाख से ज़्यादा मुसलमान सऊदी अरब पहुंचेंगे. जानिए हज से जुड़ी कुछ ख़ास बातें-

हज पर जाने का मक़सद क्या होता है?

इस्लाम के कुल पाँच स्तंभों में से हज पांचवां स्तंभ है. सभी स्वस्थ और आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमानों से अपेक्षा होती है कि वो जीवन में एक बार हज पर ज़रूर जाएं.

हज को अतीत के पापों को मिटाने के अवसर के तौर पर देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि हज के बाद उसके तमाम पिछले गुनाह माफ़ कर दिए गए हैं और वो अपनी ज़िंदगी को फिर से शुरू कर सकता है. ज़्यादातर मुसलमानों के मन में जीवन में एक बार हज पर जाने की इच्छा होती है.

जो हज का ख़र्च नहीं उठा पाते हैं उनकी धार्मिक नेता और संगठन आर्थिक मदद करते हैं. कुछ मुसलमान तो ऐसे भी होते हैं जो अपनी ज़िंदगी भर की कमाई हज पर जाने के लिए बचाकर रखते हैं. दुनिया के कुछ हिस्सों से ऐसे हाजी भी पहुंचते हैं जो हज़ारों मील की दूरी महीनों पैदल चलकर तय करते हैं और मक्का पहुंचते हैं.

मुसलमानों के लिए इस्लाम के पाँच स्तंभ काफ़ी मायने रखते हैं. ये स्तंभ पाँच संकल्प की तरह हैं. इस्लाम के मुताबिक़ जीवन जीने के लिए ये काफ़ी अहम हैं.

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ये हैं इस्लाम के पांच स्तंभ

  • तौहीद- यानी एक अल्लाह और मोहम्मद उनके भेजे हुए दूत हैं इसमें हर मुसलमान का विश्वास होना.
  • नमाज़- दिन में पाँच बार नियम से नमाज़ अदा करना.
  • रोज़ा- रमज़ान के दौरान उपवास रखना.
  • ज़कात- ग़रीबों और ज़रूरतमंद लोगों को दान करना.
  • हज- मक्का जाना.

हज का इतिहास क्या है?

लगभग चार हज़ार साल पहले मक्का का मैदान पूरी तरह से निर्जन था. मुसलमानों का ऐसा मानना है कि अल्लाह ने पैग़ंबर अब्राहम (जिसे मुसलमान इब्राहीम कहते हैं) को आदेश दिया कि वो अपनी पत्नी हाजरा और बेटे इस्माइल को फ़लस्तीन से अरब ले आएं ताकि उनकी पहली पत्नी सारा की ईर्ष्या से उन्हें (हाजरा और इस्माइल) बचाया जा सके.

मुसलमानों का ये भी मानना है कि अल्लाह ने पैग़ंबर अब्राहम से उन्हें अपनी क़िस्मत पर छोड़ देने के लिए कहा. उन्हें खाने की कुछ चीज़ें और थोड़ा पानी दिया गया. कुछ दिनों में ही ये सामान ख़त्म हो गया. हाजरा और इस्माइल भूख और प्यास से बेहाल हो गए.

मुसलमानों का मानना है कि मायूस हाजरा मक्का में स्थित सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों से मदद की चाहत में नीचे उतरीं. भूख और थकान से टूट चुकी हाजरा गिर गईं और उन्होंने संकट से मुक्ति के लिए अल्लाह से गुहार लगाई.

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मुसलमानों का विश्वास है कि इस्माइल ने ज़मीन पर पैर पटका तो धरती के भीतर से पानी का एक सोता फूट पड़ा और दोनों की जान बच गई.

हाजरा ने पानी को सुरक्षित किया और खाने के सामान के बदले पानी का व्यापार भी शुरू कर दिया. इसी पानी को आब-ए-ज़मज़म यानी ज़मज़म कुआं का पानी कहा जाता है. मुसलमान इसे सबसे पवित्र पानी मानते हैं और हज के बाद सारे हाजी कोशिश करते हैं कि वो इस पवित्र पानी को लेकर अपने घर लौटें.

जब पैग़ंबर अब्राहम फ़लस्तीन से लौटे तो उन्होंने देखा कि उनका परिवार एक अच्छा जीवन जी रहा है और वो पूरी तरह से हैरान रह गए.

मुसलमान मानते हैं कि इसी दौरान पैगंबर अब्राहम को अल्लाह ने एक तीर्थस्थान बनाकर समर्पित करने को कहा. अब्राहम और इस्माइल ने पत्थर का एक छोटा-सा घनाकार इमारत निर्माण किया. इसी को काबा कहा जाता है.

अल्लाह के प्रति अपने भरोसे को मज़बूत करने को हर साल यहां मुसलमान आते हैं. सदियों बाद मक्का एक फलता-फूलता शहर बन गया और इसकी एकमात्र वजह पानी के मुकम्मल स्रोत का मिलना था.

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धीरे-धीरे लोगों ने यहां अलग-अलग ईश्वर की पूजा शुरू कर दी. पैगंबर अब्राहम के ज़रिए बनाए गए इस पवित्र इमारत में मूर्तियां रखी जाने लगीं.

मुसलमानों का ऐसा मानना है कि इस्लाम के आख़िरी पैगंबर हज़रत मोहम्मद (570-632) को अल्लाह ने कहा कि वो काबा को पहले जैसी स्थिति में लाएं और वहां केवल अल्लाह की इबादत होने दें.

साल 628 में पैग़ंबर मोहम्मद ने अपने 1400 अनुयायियों के साथ एक यात्रा शुरू की. यह इस्लाम की पहली तीर्थयात्रा बनी और इसी यात्रा में पैग़ंबर अब्राहम की धार्मिक परंपरा को फिर से स्थापित किया गया. इसी को हज कहा जाता है.

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हाजी वहां जाकर करते क्या हैं?

हज यात्री पहले सऊदी अरब के जिद्दा शहर पहुंचते हैं. वहां से वो बस के ज़रिए मक्का शहर जाते हैं. लेकिन मक्का से ठीक पहले एक ख़ास जगह है जहां से हज की आधिकारिक प्रक्रिया शुरू होती है. मक्का शहर के आठ किलोमीटर के दायरे से इस विशेष जगह की शुरुआत होती है. इस विशेष जगह को मीक़ात कहते हैं. हज पर जाने वाले सभी यात्री यहां से एक ख़ास तरह का कपड़ा पहनते हैं जिसे अहराम कहा जाता है. हालांकि कुछ लोग बहुत पहले से ही अहराम पहन लेते हैं. यहां तक की कुछ लोग अहराम पहन कर ही हवाई जहाज़ में बैठते हैं.

अहराम सिला हुआ नहीं होता है. महिलाओं को अहराम पहनने की ज़रुरत नहीं होती, वो अपनी पसंद का कोई भी कपड़ा पहन सकती हैं. इसके अलावा हाजियों को और भी बहुत सी बातों का ध्यान रखना पड़ता है.

हज यात्री-

-इस दौरान पति-पत्नि शारीरिक संबंध नहीं बना सकते

-अपने बाल और नाख़ून नहीं काट सकते

-परफ़्यूम या किसी भी ख़ुशबूदार चीज़ लगाने से बचें

-किसी से लड़ाई झगड़े से परहेज़ करें. यहां तक कि किसी भी जीव की हत्या से बचें.

मक्का पहुंचकर मुसलमान सबसे पहले उमरा करते हैं. उमरा एक छोटी धार्मिक प्रक्रिया है. हज एक विशेष महीने में किया जाता है लेकिन उमरा साल में कभी भी किया जा सकता है.

लेकिन जो लोग भी हज पर जाते हैं वो आमतौर पर उमरा भी करते हैं, हालाकि ये अनिवार्य नहीं है.

उमरा के दौरान हज में किए जाने वाले कई धार्मिक कर्म-कांड किए जाते हैं.

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आधिकारिक तौर पर हज की शुरुआत इस्लामिक महीने ज़िल-हिज की आठ तारीख़ से होती है. आठ तारीख़ को हाजी मक्का से क़रीब 12 किलोमीटर दूर मीना शहर जाते हैं. आठ की रात हाजी मीना में गुज़ारते हैं और अगली सुबह यानी नौ तारीख़ को अराफ़ात के मैदान पहुंचते हैं. हज यात्री अराफ़ात के मैदान में खड़े होकर अल्लाह को याद करते हैं और उनसे अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं. शाम को हाजी मुज़दलफ़ा शहर जाते हैं और नौ तारीख़ की रात में वहीं रहते हैं. दस तारीख़ की सुबह यात्री फिर मीना शहर लौटते हैं.

उसके बाद वो एक ख़ास जगह पर जाकर सांकेतिक तौर पर शैतान को पत्थर मारते हैं. उसे जमाारत कहा जाता है. अक्सर इसी दौरान भगदड़ मचती है और कई लोग मारे जाते हैं.

शैतान को पत्थर मारने के बाद हाजी एक बकरे या भेड़ की कुर्बानी देते हैं. उसके बाद मर्द अपना सर मुड़वाते हैं और महिलाएं अपना थोड़ा सा बाल काटती हैं.

उसके बाद यात्री मक्का वापस लौटते हैं और काबा के सात चक्कर लगाते हैं जिसे धार्मिक तौर पर तवाफ़ कहा जाता है. इसी दिन यानी ज़िल-हिज की दस तारीख़ को पूरी दुनिया के मुसलमान ईद-उल-अज़हा या बक़रीद का त्यौहार मनाते हैं.

बक़रीद दर असल पैगंबर अब्राहम और उनके बेटे पैगंबर इस्माइल की याद में मनाया जाता है. मुसलमानों का विश्वास है कि पैगंबर अब्राहम को एक बार ये सपना आया कि अल्लाह ने उनसे उनके बेटे इस्माइल की क़ुर्बानी मांगी है. अल्लाह के आदेशानुसार हज़रत अब्राहम अपने बेटे को क़ुर्बान करने के लिए तैयार हो गए लेकिन जैसे ही वो अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने वाले थे उन्हें बताया गया कि अल्लाह सिर्फ़ उनकी परीक्षा ले रहा था और बेटे की जगह एक दुम्बे (लैम्ब) को क़ुर्बान करने का आदेश दिया गया था.

हर साल मुसलमान अब्राहम और इस्माइल की इसी क़ुर्बानी को याद करते हैं और बक़रीद के दिन एक बकरे को क़ुर्बान करते हैं.

तवाफ़ के बाद हज यात्री फिर मीना लौट जाते हैं और वहां दो दिन और रहते हैं. महीने की 12 तारीख़ को आख़िरी बार हज यात्री काबा का तवाफ़ करते हैं और दुआ करते हैं. इस तरह हज की पूरी प्रक्रिया पूरी होती है.

हज यात्री मक्का से लगभग 450 किलोमीटर दूर मदीना शहर जाते हैं और वहां मौजूद मस्जिद-ए-नबवी में नमाज़ पढ़ते हैं. इसका हज की धार्मिक प्रक्रिया से कोई सीधा संबंध नहीं है लेकिन चूंकि इस मस्जिद को ख़ुद पैग़ंबर मोहम्मद ने बनवाया था, इसीलिए हर मुसलमान इसे काबा के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल मानता है. यहींहज़रत मोहम्मद की मज़ार भी है. हज यात्री उसका भी दर्शन करते हैं.

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