मेक्सिको क्यों खोज रहा है इन भारतीय 'बच्चों' को

  • 21 अगस्त 2018
उस समय का अख़बार इमेज कॉपीरइट EMBASSY OF MEXICO
Image caption उस समय के अख़बार में छपी ख़बर

मेक्सिको की सरकार को आठ भारतीय बच्चों की तलाश है और वहां के अधिकारियों का मानना है कि उनमें से तीन बच्चों ने संभव है कि मेक्सिको की यात्रा भी की थी.

लेकिन उसके बाद से उनका कोई सुराग़ नहीं है. सरकार को सिर्फ़ उनके नाम और उम्र की जानकारी है और अब वो अपने तलाश का दायरा बढ़ा रही है. लेकिन ये काम इतना आसान नहीं है क्योंकि बहुत वक़्त गुज़र चुका है.

50 साल पहले

दिल्ली स्थित मेक्सिको के दूतावास का कहना है कि 50 साल पहले 1968 में मेक्सिको में जब ओलंपिक खेल हुए थे, तो उस दौरान हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में पेंटिंग्स की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी. उसमें दुनिया भर से लगभग 1800 बच्चों ने हिस्सा लिया था. उनमें ये आठ भारतीय बच्चे भी शामिल थे.

इमेज कॉपीरइट EMBASSY OF MEXICO
Image caption इरा सचदेव की पेंटिंग

ऐसा पहली बार हुआ था कि ओलंपिक खेलों का आयोजन हिस्पैनिक भाषा बोलने वाले किसी शहर में कराया जा रहा था.

बच्चों ने जो पेंटिंग्स बनाई थी, उन्हें मेक्सिको शहर के सबसे प्रसिद्ध स्थानों पर लगाया गया था. पेंटिंग प्रदर्शनी का शीर्षक था 'वर्ल्ड ऑफ़ फ़्रेंडशिप' यानी दोस्ती की दुनिया.

लियानार्डो की पेंटिंग, क़ीमत ₹2900 करोड़, पता यूएई

इमेज कॉपीरइट EMBASSY OF MEXICO

अब उनमें से कुछ ही पेंटिंग्स बची हैं और मेक्सिको सरकार उनका दोबारा प्रदर्शनी करना चाहती है. इस परियोजना को ''दोस्ती की दुनिया, पचास साल बाद'' नाम दिया गया है और उन पेंटरों को तलाश करने की ज़िम्मेदारी दुनिया भर में मेक्सिको के दूतावासों को दी गई है.

दूतावास का मानना है कि उन भारतीय बच्चों ने 'शंकर इंटरनेशनल चिल्ड्रेन आर्ट कॉम्पीटिशन' के बैनर तले हिस्सा लिया होगा. ये मुक़ाबला केशव शंकर पिल्लई ने शुरू कराया था.

वो एक कार्टूनिस्ट थे जिन्होंने दिल्ली का मशहूर शंकर डॉल म्यूज़ियम (बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग पर स्थित) स्थापित किया था.

उनका कहना है कि तीन बच्चे शायद भारतीय दस्ते के साथ मेक्सिको भी गए थे जहां उन्होंने शहर की मशहूर सड़कों के किनारे दीवारों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया था.

पेंटिंग में हिटलर के डेथ कैंप का ख़ौफ़

पेंटरों की तलाश

दूतावास का कहना है कि उनमें से एक पेंटर का पता लगाने में सफलता मिली है, लेकिन अब वो इस दुनिया में नहीं हैं.

इमेज कॉपीरइट EMBASSY OF MEXICO
Image caption जितेंद्र नवनीत लाल पारिख

जितेंद्र नवनीत लाल पारिख की पेंटिंग 'मार्केट' को भी 1968 में बनी पेंटिंग में शामिल किया गया था. उस वक़्त जितेंद्र नवनीत लाल पारिख की उम्र 15 साल थी. बाक़ी बच्चों के नाम सुजाता शर्मा (14 साल), ईरा सचदेव (12 साल), संत कुंडो (13 साल), विवेक कछभाटला (9 साल), ईला एम्स (8 साल), और लीला सुधाकरण बताए गए हैं.

अगर मेक्सिको सरकार उन बच्चों को तलाशने में सफल हो जाती है तो सरकार उन्हें अपनी पेंटिंग्स की एक फ़्रेम्ड कॉपी और सर्टिफ़िकेट देगी.

ये भी पढ़ें:

15 करोड़ की पेंटिंग असली या नकली

सऊदी अरब में महिलाओं की पेंटिंग बनाना 'पाप' है

5 लाख डॉलर में नीलाम टिनटिन की पेंटिंग

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे