चीन से यारी श्रीलंका के लिए क्यों बन रही दुश्वारी

  • 2 सितंबर 2018
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Image caption श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में चीन के साथ सबसे ज़्यादा क़रीबी बढ़ी

2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे महिंदा राजपक्षे को देश में 30 साल से जारी गृह युद्ध को ख़त्म करने का श्रेय तो दिया ही जाता है, लेकिन श्रीलंका क़र्ज़ के बोझ तले जिस क़दर दबा है उसका श्रेय भी राजपक्षे को ही दिया जाता है.

राजपक्षे के बारे में कहा जाता है कि चीन के लिए उनका ज़्यादातर मामलों में एक ही जवाब होता था- हां.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट का कहना है, ''चीनी क़र्ज़ और महत्वाकांक्षी पोर्ट प्रोजेक्ट के लिए महिंदा राजपक्षे का जवाब हमेशा 'हां' रहा. हम्बनटोटा पोर्ट पर हुई स्टडी का कहना था कि यह बनने के बाद भी काम नहीं कर पाएगा, लेकिन राजपक्षे का जवाब चीन के लिए 'हां' रहा. भारत से श्रीलंका हमेशा क़र्ज़ लेता रहा है और जब भारत ने इस प्रोजेक्ट पर काम करने से इनकार कर दिया तब भी राजपक्षे ने चीन के लिए 'हां' कहा. राजपक्षे के कार्यकाल में चीनी क़र्ज़ बेशुमार बढ़ा है.''

एनवाईटी की रिपोर्ट के अनुसार, ''हम्बनटोटा पोर्ट का निर्माण चीन की सबसे बड़ी सरकारी कंपनी हार्बर इंजीनियरिंग ने किया है. यह पोर्ट पूर्वानुमान के मुताबिक़ फ़ेल ही रहा है. इस पोर्ट के बगल का समुद्री मार्ग दुनिया का सबसे व्यस्ततम मार्ग है और यहां से दसियों हज़ार जहाज़ गुजरते हैं, जबकि 2012 में हम्बनटोटा से महज़ 34 जहाज़ गुज़रे और आख़िरकार पोर्ट भी चीन का ही हुआ.''

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Image caption महिंदा राजपक्षे को चीन समर्थक राष्ट्रपति माना जाता है

कर्ज़ के बोझ तले दबा श्रीलंका

2015 में तो राजपक्षे श्रीलंका की सत्ता से विदा हो गए, लेकिन नई सरकार उनके लिए कर्ज़ को चुकाने की मुश्किलों से जूझ रही है. क़र्ज़ नहीं चुकाने के कारण ही चीन से महीनों बातचीत के बाद श्रीलंका को पोर्ट के साथ 15000 एकड़ ज़मीन भी उसे सौंपनी पड़ी थी.

श्रीलंका ने चीन को जो इलाक़ा सौंपा है वो भारत से महज़ 100 मील की दूरी पर है. भारत के लिए इसे सामरिक रूप से ख़तरा बताया जा रहा है.

श्रीलंका एक बार फिर चीन से कर्ज़ लेने जा रहा है. यह क़र्ज़ 2018 की आख़िरी तिमाही में श्रीलंका को मिलेगा. 2019 की शुरुआत से ही श्रीलंका को क़र्ज़ का भुगतान करना है और ये उसी की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है.

बिज़नेस टाइम्स के अनुसार 2019 से 2022 तक हर साल श्रीलंका को चार अरब डॉलर विदेशी क़र्ज़ चुकाने हैं. संडे टाइम्स के अनुसार श्रीलंका पर 2017 में कुल विदेशी क़र्ज़ 55 अरब डॉलर हो गया है.

निक्केई एशियन रिव्यू की रिपोर्ट के अनुसार श्रीलंका चीन से 1.25 अरब डॉलर का नया क़र्ज़ लेकर ख़ुद को उसके हवाले ही कर रहा है. दक्षिण एशियाई देशों में चीन पहले से ही सबसे बड़ा क़र्ज़दाता है.

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Image caption श्रीलंका का कहना है कि उसने हम्बनटोटा बंदरगाह को पहले भारत को विकसित करने के लिए दिया था, लेकिन भारत ने इनकार कर दिया था

राजपक्षे के बाद की सरकार ने भी क़र्ज़ लेना जारी रखा

श्रीलंका गार्डियन के अनुसार श्रीलंका का केंद्रीय बैंक चीन के समकक्ष पीपल्स बैंक ऑफ़ चाइना से 25 करोड़ डॉलर की क़ीमत का पांडा बॉण्ड (ऐसा बॉण्ड जो सीधे तौर पर चीन का केंद्रीय बैंक जारी नहीं करता, परन्तु निगरानी रखता है) जारी करवाने में लगा है.

इसके अलावा श्रीलंका पहले ही चीन के व्यावसायिक बैंकों से एक अरब डॉलर का क़र्ज़ ले चुका है. श्रीलंका के केंद्रीय बैंक का कहना है कि पश्चिम के अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़दाताओं की तुलना में चीनी लोन ज़्यादा सुलभ है. निक्केई एशियन रिव्यू के अनुसार इसकी पहली किस्त 50 करोड़ डॉलर इस हफ़्ते के आख़िर तक आ जाएगी.

श्रीलंका को अंतरराष्ट्रीय सॉवरन बॉण्ड, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य विकल्पों की तुलना में चीन से क़र्ज़ लेना ज़्यादा रास आ रहा है. दूसरी तरफ़ दुनिया भर के विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भंडार में अभी 8.5 अरब डॉलर की रक़म ही बची है और उसे सोच-समझकर क़दम उठाना चाहिए. ज़ाहिर है श्रीलंका के लिए विदेशी मुद्रा भंडार में जो रक़म बची है वो उसकी ज़रूरतों (आयात भुगतान और अन्य ज़रूरतें ) पूरी तरह से अपर्याप्त है.

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2019 से चुकाने हैं क़र्ज़

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार 2019 से 2023 के बीच श्रीलंका के 17 अरब डॉलर के विदेशी क़र्ज़ की अवधि पूरी हो जाएगी और उसे किसी भी सूरत में इसे चुकाना होगा. ये क़र्ज़ चीन, जापान, भारत और विश्व बैंक समेत एशियन डिवेलपमेंट बैंक के हैं.

श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के चेयरमैन इंद्रजीत कुमारस्वामी का कहना है कि उन्होंने डॉलर के प्रभुत्व वाले अंतरराष्ट्रीय बॉण्डों के सहारे पैसे जुटाने की पारंपरिक राह को नहीं चुना है. इंद्रजीत का कहना है कि यह फ़ैसला विदेशी क़र्ज़ को संचालित करने का अच्छा तरीक़ा है.

कुमारस्वामी ने निक्केई एशियन रिव्यू से कहा, ''श्रीलंका को अगले साल से चार अरब डॉलर से कुछ ज़्यादा का क़र्ज़ चुकाना है. हमारा क़र्ज़ चुनौतीपूर्ण है पर हम मैनेज कर लेंगे.''

श्रीलंका की अर्थव्यवस्था 87 अरब डॉलर की है और चालू खाते का घाटा जीडीपी का 2.2 फ़ीसदी है. कुमारस्वामी का कहना है कि श्रीलंका पर क़र्ज़ उसकी जीडीपी का 77 फ़ीसदी है.

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55 अरब डॉलर का क़र्ज़

श्रीलंका का यह अनुपात पड़ोसी देश भारत, पाकिस्तान, मलेशिया और थाईलैंड से ज़्यादा है. श्रीलंका पर कुल 55 अरब डॉलर के विदेशी क़र्ज़ में चीन का 10 फ़ीसदी, जापान का 12 फ़ीसदी, एशियन डिवेलपमेंट बैंक का 14 फ़ीसदी और विश्व बैंक का 11 फ़ीसदी है.

श्रीलंका पर बढ़ते क़र्ज़ को लेकर कहा जा रहा है वो अपने सिर पर बदनामी ले रहा है. कई विश्लेषकों का मानना है कि श्रीलंका चीनी डिज़ाइन के क़र्ज़ के जाल में फँसता जा रहा है.

इस बात की आशंका तब और बढ़ गई जब श्रीलंका क़र्ज़ चुकाने में नाकाम हो गया और उसे अपना हम्बनटोटा पोर्ट चीन को सौ साल के पट्टे पर सौंपना पड़ा.

महिंदा राजपक्षे को ही चीन के लिए दरवाज़ा खोलने का ज़िम्मेदार माना जाता है. राजपक्षे 2005 से 2015 तक श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे थे.

उनके कार्यकाल के आख़िरी साल में चीन ने हम्बनटोटा पोर्ट, एक नया एयरपोर्ट, एक कोल पावर प्लांट और सड़क के निर्माण में 4.8 अरब डॉलर का निवेश किया था. 2016 के आते-आते यह क़र्ज़ 6 अरब डॉलर का हो गया.

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Image caption हम्बनटोटा को लेकर श्रीलंका में चीन के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी हुए

विदेशी निवेश न के बराबर

राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना की गठबंधन सरकार में श्रीलंका पर क़र्ज़ का बोझ और बढ़ा है. सिरीसेना चार सालों से सत्ता में हैं और विदेशी निवेश न के बराबर आया है. 2017 में श्रीलंका में केवल 1.7 अरब डॉलर का ही विदेश निवेश आया.

इसकी एक वजह यह है कि यहां की सरकार व्यापार की सुगमता में अपनी रैंकिंग सुधारने में नाकाम रही है. श्रीलंका सुलभ व्यापार के दृष्टिकोण से दुनिया भर में 111वें नंबर पर है.

न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट का कहना है कि चीन क़र्ज़ को रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है. रिपोर्ट के अनुसार वो उन देशों में अपने आर्थिक हितों को क़र्ज़ देकर साध रहा है.

इस रिपोर्ट में कहा गया है, ''चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर आरोप लग रहे हैं कि वो अपनी महत्वाकांक्षी योजना 'वन बेल्ट वन रोड' में आसपास के देशों को क़र्ज़ का लालच देकर शामिल कर रहे हैं.''

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दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंध

चीन और श्रीलंका के बीच संबंध हमेशा से मधुर रहे हैं. चीनी क्रांति के बाद माओ की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने में श्रीलंका अगली पंक्ति के देशों में रहा है.

श्रीलंका में राजपक्षे सरकार ने तमिल विद्रोहियों के ख़िलाफ़ निर्णायक जंग छेड़ी तो चीन उसके लिए और ज़रूरी देश के तौर पर उभरा.

इस जंग में श्रीलंका जब मानवाधिकारों को लेकर विश्व में अलग-थलग पड़ा तो चीन ने कुछ अलग ही रुख़ अपनाया.

चीन ने श्रीलंका को ख़ूब आर्थिक मदद की. चीन ने संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के असर को कम करने के लिए सैन्य, सियासी और आर्थिक मदद देना जारी रखा.

तमिल अलगाववादियों से 2009 में युद्ध ख़त्म होने के बाद श्रीलंका की सत्ता में राजपक्षे और उनके परिवार का वर्चस्व बढ़ता गया. राजपक्षे के तीन भाइयों का श्रीलंका के सभी मंत्रालयों में ख़ासा प्रभाव रहा. चीन की सरकार और राजपक्षे के बीच इसी दौरान और क़रीबी आई.

भारत के पूर्व विदेश सचिव शिव शंकर मेनन ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा है, ''हम्बनटोटा के लिए श्रीलंका ने पहले भारत और भारतीय कंपनियों से संपर्क किया था. हमने इस पर काम करने से इसलिए इनकार किया था क्योंकि यह आर्थिक रूप बिल्कुल बेकार था और बनने के बाद भी बेकार ही है.''

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