अफ़्रीका का एकमात्र देश जो नहीं चाहता चीन से करोड़ों की मदद

  • 7 सितंबर 2018
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इस हफ़्ते चीन में अफ़्रीका सहयोग मंच के सम्मेलन में 50 से अधिक अफ़्रीकी देश जुटे लेकिन इनमें प्रायद्वीप का एक देश स्वाज़ीलैंड मौजूद नहीं था.

इसकी वजह थी कि चीन ने उसे चार सितंबर को ख़त्म हुए इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए नहीं बुलाया था.

इस देश ने हाल ही में अपना नया नाम रखा है- 'द किंगडम ऑफ़ इस्वातिनी'

चीन ने उसे क्यों नहीं बुलाया इसकी एकमात्र वजह यह है कि स्वाज़ीलैंड ताइवान के साथ अपने राजनयिक संबंध रखता है, जिसे चीन विद्रोही प्रायद्वीप मानता रहा है.

ताइवान के साथ स्वाजीलैंड के संबंध उसे चीन के पास आने से रोकते हैं. चीन उन सभी देशों से राजनयिक संबंध नहीं रखना चाहता है जो ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देते हैं.

यही वजह है कि ताइवान के सहयोगियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है. ताइवान ने इसी साल अगस्त में चीन के दबाव में अपना एक और सहयोगी गंवा दिया. यह सहयोगी अल साल्वाडोर है जिसने ताइवान से अपने सभी कूटनीतिक संबंध तोड़ लिए.

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चीन दिखा रहा पैसे की ताक़त

चीन लंबे समय से अल सल्वाडोर पर ताइवान के साथ उसके कूटनीतिक रिश्ते ख़त्म करने का दबाव बना रहा था.

पूरी दुनिया में चीन के बढ़ते आर्थिक दबदबे के चलते ताइवान के पास अब केवल 17 देशों से कूटनीतिक रिश्ते शेष रह गए हैं.

ताइवान के मित्र राष्ट्र

  • दक्षिणी अमरीकी और कैरीबियन देशः बेलिज़, हैती, निकारागुआ, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट विंसेंट एंड ग्रेनेडाइंस, द डोमिनिकन रिपब्लिक, ग्वाटेमाला, पराग्वे, होंडुरास और सेंट लुसिया.
  • अफ़्रीकी देशः स्वाज़ीलैंड.
  • यूरोपः द होली सी.
  • प्रशांत क्षेत्र: किरिबाती, नाउरू, द सोलोमोन आइलैंड्स, तुवालू, द मार्शल आईलैंड और पलाउ.

सत्ता में आने के बाद से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अफ़्रीकी देशों को लाखों डॉलर के कर्ज़ की पेशकश की और इसी हफ़्ते उन्होंने इस रकम को और बढ़ा दिया.

चीन-अफ़्रीका सहयोग मंच सम्मेलन के अपने उद्घाटन भाषण में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अफ़्रीकी उपमहाद्वीप के लिए कर्ज़ को 6000 करोड़ डॉलर और बढ़ाने का वादा किया.

चीन ने तीन साल पहले जोहान्सबर्ग में आयोजित पिछले शिखर सम्मेलन में अफ़्रीकी महाद्वीप के लिए 6000 करोड़ डॉलर का वादा किया था जिसे बाद में जिनपिंग ने मूर्त रूप भी दिया.

पिछले दो दशकों के दौरान अफ़्रीकी देशों में चीन का निवेश लगातार बढ़ता जा रहा है और अब तो वो वहां के देशों का मुख्य आर्थिक सहयोगी बन गया है.

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Image caption चीन की मांगों के आगे नहीं झुके स्वाज़ीलैंड के राजा मस्वाती तृतीय

कर्ज़ों के राजनीतिक मायने नहीं!

ग्लोबल मैनेजमेंट कंसल्टिंग फ़र्म मैकेंजी ऐंड कंपनी के आंकड़ों और अमरीकी जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के सहयोग से की गई चीन-अफ़्रीका रिसर्च के मुताबिक चीन और अफ़्रीका के बीच द्विपक्षीय व्यापार में 20 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है और साल 2000 से बीजिंग ने 136 बिलियन डॉलर कर्ज़ के रूप में दिए हैं.

हालांकि, चीन के इस रवैये पर विवाद भी कम नहीं हैं. अन्य देश जैसे अमरीका यह मानता है कि बीजिंग उस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए ये पैसे खर्च कर रहा है. लेकिन साथ ही उसने चेतावनी भी दी है कि कुछ अफ़्रीकी देश कर्ज़ को नहीं चुका सकते.

दूसरी ओर चीन इसका बचाव यह कह करता है कि उसका उद्देश्य अफ़्रीकी देशों का विकास करना है और उसके दिए कर्जों के राजनीतिक मायने नहीं हैं.

हालांकि, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने खुद ही स्वीकार भी किया कि कुछ परियोजनाओं की व्यावहारिकता का और अच्छे से अध्ययन किया जाना चाहिए था.

साथ ही उन्होंने यह वादा भी किया कि सबसे ग़रीब देशों को दिए कर्ज़ पर वो ब्याज़ माफ़ कर देंगे. हालांकि उन्होंने इस बारे में किसी देश का नाम नहीं लिया.

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Image caption स्वाज़ीलैंड के राजा मस्वाती तृतीय और ताइवान की राष्ट्रपति साइ इंग वेन

50 साल पुराना साथ छोड़ेगा स्वाज़ीलैंड?

अपनी 13 लाख आबादी के साथ अफ़्रीका का अंतिम साम्राज्य स्वाज़ीलैंड ताइवान के पक्ष में अपने समर्थन को लेकर दृढ़ है.

यहां की सत्ता में पिछले 32 सालों से बैठे राजा मस्वाती तृतीय कहते हैं कि वो चीन के दबाव के बावजूद ताइवान का साथ नहीं छोड़ेंगे.

जब चीन के एक अधिकारी ने कहा कि उन्हें यह उम्मीद है कि स्वाज़ीलैंड जल्द ही अपना पक्ष बदलेगा तो स्वाज़ीलैंड के विदेश मंत्री गोमेज़ ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा, "उन्हें मानसिक खेल नहीं खेलना चाहिए क्योंकि ताइवान से हमारे रिश्ते अब 50 साल से भी पुराने हो चुके हैं और हम उन्हें नहीं छोड़ सकते."

वो कहते हैं, "पाला बदलने का हमारा कोई इरादा नहीं है क्योंकि ताइवान हमारे साथ बहुत अच्छा रहा है."

उधर ताइवान की सरकार ने चेकबुक के बल पर सहयोगी बनाने के लिए चीन की आलोचना की है, जिसे चीन ने सरासर नकार दिया है.

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बुर्किना फासो भी था स्वाज़ीलैंड का दोस्त

ब्लूमबर्ग के मुताबिक स्वाज़ीलैंड में ताइवान ने बुनियादी परियोजनाओं में निवेश किया है जैसे, छात्रवृत्तियां देना, डॉक्टरों को भेजना और कृषि से जुड़े अनुभवों को साझा करना.

अब तक इन सभी प्रतिबद्धताओं की वजह से स्वाज़ीलैंड ताइवान के साथ आज भी जुड़ा हुआ है लेकिन ये सब कारण बुर्किना फासो को साथ बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे.

जनवरी 2017 में बुर्किना फासो के विदेश मंत्री ने ताइवान को 'दोस्त और सहयोगी' बताया, और ब्लूमबर्ग के एक इंटरव्यू में चीनी शासन के 50 हज़ार मिलियन डॉलर से अधिक के प्रस्ताव की आलोचना की.

तब उन्होंने कहा था कि, "हम खुश हैं और अपने रिश्ते पर पुनर्विचार करने के लिए हमारे पास कोई कारण नहीं है."

लेकिन 16 महीने बाद ही वो अपने मित्र ताइवान के साथ रिश्ते को तोड़ने और चीन के साथ एक नए रिश्ते की शुरुआत करते हुए फ़ोटो खिंचा रहे थे.

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