गाय-भैंस क्यों हैं पर्यावरण के लिए ख़तरनाक

  • 9 सितंबर 2018
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जलवायु परिवर्तन से चिंतित वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के लिए लंबे वक़्त से गाय की गैस और डकार चिंता के विषय बने हुए हैं.

वायुमंडल में हानिकारक मीथेन की अधिक मात्रा के लिए गाय-भैंसों की डकार और उनके पेट से निकलने वाली गैस को भी ज़िम्मेदार माना जाता है.

वैज्ञानिक मीथेन का उत्सर्जन रोकने के लिए गायों के खाने में सुधार करने की कोशिश करते रहे हैं. उन्हें लहसुन, ओरेगैनो, जाफ़रान या अन्य सब्ज़ियां खिलाकर उसका असर देखने की कई कोशिश की गई है.

गायों की गैस को कैसे कम हानिकारक बनाया जाए- कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने हाल में शोध के ज़रिए इसका रास्ता निकाल लिया है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि गाय को समुद्री शैवाल खिलाने से उनकी गैस में मीथेन की मात्रा कम हो सकती है और इससे पर्यावरण की रक्षा हो सकती है.

इस शोध के तहत वैज्ञानिकों ने क़रीब एक दर्जन दुधारू गायों को खाने में समुद्री शैवाल खिलाया. इसके बाद उनकी डकार और गैस से उत्पन्न होने वाली मीथेन में 30 फ़ीसदी की कमी पाई गई.

शोध में शामिल विश्वविद्यालय के पशु वैज्ञानिक अरमियास केब्रियाब के अनुसार, "शोध के नतीजे देख कर मुझे आश्चर्य हुआ. मुझे अंदाज़ा नहीं था कि थोड़ी मात्रा में समुद्री शैवाल खिलाने से चमत्कार भी हो सकता है."

उनका कहना है कि शोध के नतीजों से सीख लेते हुए उनकी टीम अब छह महीने तक भैसों को समुद्री शैवाल खिला कर उसका असर देखना चाहती है. ये शोध इसी साल अक्टूबर में शुरू किया जाएगा.

इलिनॉय विश्वविद्यालय में पशु वैज्ञानिक माइकल हुचेन्स कहते हैं, "अगर हम खाने में ज़रा सा बदलाव कर के वायुमंडल में मीथेन की मात्रा कम कर सकें तो इससे कार्बन उत्सर्जन पर सकारात्मक असर पड़ेगा."

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गाय पर्यावरण के लिए ख़तरा?

संयुक्त राष्ट्र की फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन की 2014 की रिपोर्ट के अनुसार गाय, बकरी और भेड़ जैसे चार पेट वाले जानवर दिन भर खाना चबाते यानी जुगाली करते रहते हैं और डकार मारते हैं.

पहले पेट रूमेन में लाखों की संख्या में जीवाणु रहते हैं जो घास और पत्तियों जैसे फाइबर युक्त खाने को छोटे टुकड़ों में तोड़ कर उन्हें हज़म करना आसान बनाते हैं. इस प्रक्रिया में गाय के पेट से मीथेन गैस निकलती है.

नवंबर 2006 में आई संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार कार्बन डाईऑक्साइड का जितना उत्सर्जन गाड़ियों या कारखाने के धुंए से होता है उससे कहीं अधिक गाय के पेट से होता है. इस रिपोर्ट के अनुसार वायुमंडल को सबसे अधिक ख़तरा गाय और भैसों से है.

कारों से कार्बन डाईऑक्साईड का उत्सर्जन होता है जबकि गाय से मीथेन का. और कार्बन डाईऑक्साईड के मुक़ाबले मीथेन हमारे वायुमंडल के लिए कई गुना हानिकारक है. ये ग्रीनहाऊस गैसों को अधिक मात्रा में बांध कर रखती है और यह ग्लोबल वार्मिंग का बड़ा कारण है.

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न्यूज़ीलैंड ने तो गाय-भैसों की गैस पर टैक्स लगाने का भी प्रस्ताव दे दिया था. किसानों ने इसका जमकर विरोध किया, लेकिन इस प्रस्ताव ने जलवायु परिवर्तन और गाय-भैंसों के योगदान को ज़रूर स्पष्ट कर दिया.

मीथेन का उत्सर्जन कम करने की कोशिशों को इसी बात से जाना जा सकता है 2016 में कैलिफ़ोर्निया में गायों से निकलने वाली मीथेन को गाड़ियों में इस्तेमाल करने की कोशिशों की बातें होने लगीं थी.

साथ ही दूध के स्वाद को बरकरार रखते हुए उनके खाने को भी रेग्युलेट करने के शोध पर भी चर्चाएं हुईं.

एशियन ऑस्ट्रेलियन जर्नल ऑफ़ एनिमल साइंसेज में 2014 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार 2010 तक गायों के कारण मीथेन उत्पादन की मात्रा लगातार बढ़ी है और दुनिया के अन्य हिस्सों में पाई जाने वाली गायों की तुलना में भारतीय गाय इसमें आगे हैं.

2012 में हुई 19वें पशुधन गणना के अनुसार भारत में क़रीब 51 करोड़ गाय, भैंसे, बकरी, भेड़ें और घोड़े हैं.

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