वुसअत का ब्लॉग: किन लोगों में रहना चाहता था, पाकिस्तान में किन लोगों में रहना पड़ रहा है

  • 10 सितंबर 2018
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Image caption पाकिस्तान के पहले नोबेल विजेता अब्दुस्सलाम अहमदिया समुदाय से थे

जब लाहौर हाई कोर्ट के वकीलों के एक गुट ने छह वर्ष पहले अदालत के आसपास की कैंटीनों में शीज़ान कोल्ड ड्रिंक कंपनी का बहिष्कार किया तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिन वकीलों की रोज़ी-रोटी ही क़ानून से जुड़ी हुई है वो ऐसी बचकाना हरकत कैसे कर सकते हैं?

माना शीज़ान कंपनी का मालिक अहमदी समुदाय से है मगर कारोबार करना तो हर नागरिक का हक़ है. इस पर कोई कैसे रोक लगा सकता है और वह भी वकील बिरादरी की ओर से.

जब लाहौर की सबसे बड़ी आईटी मार्केट हफ़ीज़ सेंटर के मेन गेट पर कई दिन नोटिस लगा हुआ कि हम अहमदियों से व्यापार नहीं करते, अहमदी लोग इस मार्किट में दाख़िल न हों, तो मैंने दिल को तसल्ली दी कि मार्केट वाले तो कारोबारी लोग होते हैं उन्हें इससे क्या कि किसका धर्म-नज़रिया क्या है.

ज़रूर ये कि किसी शरारती मौलवी की हरकत है. तभी तो कुछ दिन बात पुलिस ने ये नोटिस उतरवा दिया.

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Image caption आतिफ़ मियां को इमरान की आर्थिक सलाहकार परिषद से हटना पड़ा

जब पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी के नौजवान प्रोफ़ेसर आतिफ़ मियां को पहले तो आर्थिक मामलों में सलाह देने वाली काउंसिल में रखा और फिर सोशल मी़डिया के प्रेशर में आकर इसलिए निकाल दिया क्योंकि आतिफ़ मियां का ताल्लुक अहमदी समुदाय से है तो मुझे आतिफ़ मियां के बजाय इमरान ख़ान पर ज़्यादा ग़ुस्सा आया कि जब उन्हें अच्छे से मालूम है कि पाकिस्तान में आजकल बर्दाश्त की सामाजिक हद क्या है तो फिर ख़ामख़ां आतिफ़ मियां को लेने और यूं निकालने की क्या ज़रूरत थी?

पाकिस्तान में पिछले कई वर्षों से छह सितंबर को रक्षा दिवस मनाया जाता है. पाकिस्तानी इतिहास में बताया जाता है कि 6 सितंबर 1965 को भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया और पाकिस्तानी फौज ने जान पर खेलकर ये हमला नाकाम कर दिया.

इस युद्ध के कई हीरो भी हैं. छह सितंबर को पाकिस्तान के सभी अख़बार ख़ास संस्करण भी निकालते हैं जिनमें बीसियों इश्तिहार भी छपते हैं.

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Image caption अहमदी समुदाय के प्रवक्ता सलीम-उद-दीन

इस बार ऐसा हुआ कि अहमदी समुदाय की ओर से उर्दू के एक बड़े जाने-माने पुराने अख़बार नवाए वक़्त में 65 के युद्ध से अब तक वतन पर जवान क़ुर्बान करने वाले 14 अहमदी फ़ौजी अफ़सरों की तस्वीरों वाला विज्ञापन छापा गया. इनमें से कई अफ़सर ऐसे भी थे जिनकी तस्वीरें एक ज़माने तक स्कूली क़िताबों में हीरो के तौर पर शामिल थीं.

बस फिर क्या था, नवाए वक़्त को इतनी गालियां पड़ीं कि उसे माफ़ी छापनी पड़ी कि हमने ग़लती से ये इश्तिहार छाप दिया, अल्लाह मुसलमानों का दिल दुखाने पर हमें माफ़ करे.

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मैं तबसे सोच रहा हूं कि इस इश्तिहार में देश पर जान देने वाले जिन-जिन पाकिस्तानी सैनिकों की तस्वीरें हैं उनको अब क्या लिखूं. ये कि ये वो सिपाही हैं जो वतन की हिफ़ाज़त करते हुए स्वर्गवासी हो गए या फिर वतन की हिफ़ाज़त करते हुए नरकवासी हो गए?

मैं किन लोगों में रहना चाहता था, ये किन लोगों में रहना पड़ रहा है.

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