चीन ने एशिया को सबसे बड़ी आर्थिक मंदी से कैसे बचाया

  • 19 सितंबर 2018
चीन

एशियाई देशों के युवाओं के लिए पश्चिमी देशों में शिक्षा या रोज़गार के लिए जाना किसी सपने से कम नहीं होता है.

लेकिन डीक्लेन ई के लिए यह खुशी एक बुरे ख़्वाब में बदल गई जब आज से दस साल पहले वह आर्थिक मंदी के शिकार बने.

डीक्लेन ई अमरीकी बैंक लेहमैन ब्रदर्स के लंदन स्थित दफ़्तर में काम किया करते थे.

उन्हें लग रहा था कि वह अपने करियर में सफलता की ओर बढ़ रहे हैं और ठीक तभी उनका सब कुछ छिन गया.

अपने उस दौर को याद करते हुए ई कहते हैं, ''मैं आर्थिक संकट के बाद कभी सुरक्षित महसूस नहीं कर सका.''

जब अमरीका पर छाया आर्थिक संकट

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आपको बता दें कि साल 2008 में अमरीका की टॉप बैंकिंग कंपनी लेहमैन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया था.

इसके बाद अमरीका आर्थिक संकट से घिर गया.

अमरीका जैसी महाशक्ति पर आर्थिक संकट के बादल छाते ही पूरी दुनिया पर मंदी का असर दिखने लगा.

रातों-रात कई नौकरियां चली गईं, बैंकों ने अरबों का नुकसान झेला. डीक्लेन ई उन हज़ारों लोगों में से एक हैं जिन्होंने इस मंदी में अपनी नौकरी खोयी.

लेहमैन ब्रदर्स संकट के बाद अमरीका, यूके और जापान आर्थिक मंदी से ऐसे घिरे कि इससे बाहर निकलने में उन्हें एक दशक लग गया.

कई अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अब तक ये देश मंदी से पूरी तरह उबर नहीं सके हैं.

एशिया पर क्या रहा असर?

आर्थिक संकट के साथ ही साथ ये साख का संकट भी रहा कि क्या बैंक ऐसी स्थिति का सामना करके खुद को बचाए रख सकेंगे.

एशियाई वित्तीय क्षेत्र भी इस मंदी से बच नहीं सके लेकिन इस समस्या ने एशिया का बड़ा नुकसान नहीं कराया.

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10 साल पहले एशियाई देशों के बैंकों में भी नौकरी की समस्या आई, कर्मचारियों की तनख्वाह घटा दी गई और कई बार तो रोक भी दी गई.

दक्षिणपूर्वी एशिया के सबसे बड़े बैंक डीबीएस पर भी मंदी का असर पड़ा. बैंक के लाखों डॉलर के लोन और इनवेस्टमेंट पर इसका असर पड़ा.

उस दौरान टेरेंस यॉन्ग यूटी एक बैंक के उच्च पद पर आसीन थे. उन्होंने माना कि डीबीएस पर इसका असर तो पड़ा लेकिन इस क्षेत्र के अन्य कई बिजनेस की तरह ही इसका दीर्घकालिक असर नहीं पड़ा.

उस दौर को याद करते हुए वो बताते हैं, ''सामान्य तौर पर एशिया में ग्रोथ हो रही थी. गाड़ियों के उद्योग में, एयरलाइन्स और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे क्षेत्रों में एशिया आगे बढ़ रहा था. इसकी सबसे बड़ी वजह थी एशिया और ख़ासकर चीन में मध्यम वर्ग की आय में होने वाली बढ़ोत्तरी.''

कंपनियों ने बदला मॉडल

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एशियाई कंपनियों को इस संकट से बाहर आने के लिए अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा.

सिंगापुर में प्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली एक कंपनी सनिंगडेल टेक को अमरीका से ऑर्डर मिलने कम हो गए.

कंपनी के प्रमुख प्रबंधक खो बो होर उस वक्त को याद करते हुए कहते हैं, ''हमें तनख्वाह में कटौती करनी पड़ी, कर्मचारियों के काम करने के समय को घटाया गया ताकि हम बाज़ार में बने रह सकें.''

वह बताते हैं, ''हमें ये समझना होगा कि अगर एक क्षेत्र किसी संकट से गुज़र रहा है तो अन्य क्षेत्रों पर भी इसका असर पड़ सकता है. अब हमने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिससे हम किसी देश, क्षेत्र, प्रोडक्ट या क्लाइंट पर निर्भर ना रहें."

चीन ने एशिया को बचाया

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चीन ने एशिया को आर्थिक मंदी के असर से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि वह इस वैश्विक संकट से बिलकुल भी प्रभावित नहीं रहा.

पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना के तत्कालीन मॉनेटरी पॉलिसी के सदस्य यू यॉन्गडिंग ने बताया कि चीन की वृद्धि में साल 2008 टर्निंग प्वाइंट रहा.

साल 2007 में चीन की जीडीपी 13% रही, साल 2008 में लेहमैन ब्रदर्स संकट के बाद ये आंकड़ा गिर गया और तीसरी तिमाही में जीडीपी 9% रह गई.

साल 2009 की पहली तिमाही में चीन की विकास दर 6.1% पर पहुंच गई.

इसके बाद चीन की सरकार ने प्रभावी कदम उठाए और कई पैकेज उतारे गए.

यू यॉन्गडिंग कहते हैं कि चीनी सरकार ने तेज़ी से कई कदम उठाए जिससे ना सिर्फ़ चीनी अर्थव्यवस्था स्थिर हुई बल्कि ये एशिया की भी लाइफ़लाइन बन गई.

लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था इन दिनों कर्ज़ के जाल में फंस गई है.

अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली संस्था अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक चीन का अपारदर्शी फाइनेंशियल सिस्टम वैश्विक अस्थिरता को संकट में डाल सकता है.

हालांकि कोई भी यह निश्चित तौर पर नहीं कह सकता कि ये कब शुरू होगा और इस बार लोग इससे कितनी बुरी तरह प्रभावित होंगे.

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