दो बांधों के लिए यूं पाई-पाई जोड़ रहा है पाकिस्तान

  • 1 अक्तूबर 2018
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संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और पाकिस्तान काउंसिल ऑफ़ रिसर्च इन वाटर रिसोर्सेज (पीसीआरडब्ल्यूआर) के अनुसार पाकिस्तान 2025 से पूरी तरह सूखे की चपेट में आ जाएगा.

पाकिस्तान में 1990 में ही जल संकट ने दस्तक दे दी थी और 2005 तक आते-आते ये संकट ख़तरे की तरफ़ बढ़ गया और लगातार बढ़ रहा है. यानी पाकिस्तान जल संकट की समस्या से जूझ रहा है. कहा जा रहा है कि पाकिस्तान ने इस समस्या को लेकर निर्णायक क़दम नहीं उठाया तो 2025 में वो जल संकट के भयावह दुष्चक्र में फँस जाएगा.

पाकिस्तान के पास अब संकट दूर करने के लिए ज़्यादा वक़्त भी नहीं बचा है. पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति पानी की कम होती खपत संकट के आगमन का संदेश है. कहा जा रहा है कि पिछली सरकारों ने पानी की समस्या को बिल्कुल किनारे रखा और अब यह समस्या विकराल बन गई है.

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Image caption पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मियाँ साक़िब निसार

अब इस समस्या से निपटने के लिए पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश मियाँ साक़िब निसार ने बांधों के निर्माण के लिए फंड जुटाने की पहल की है. दरअसल, पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने पीसीआरडब्ल्यूआर की पाकिस्तान में पानी की किल्लत वाली रिपोर्ट पर स्वतः संज्ञान लिया था. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट में कालाबाग बांध को लेकर एक याचिका भी दाख़िल की गई थी.

इन दोनों पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पाकिस्तान में पिछले 48 सालों में एक भी नया बांध नहीं बना है. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा कि सरकार तत्काल नए बांधों का निर्माण करे. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि दिअमेर-भाशा और मोहमंड बांध का निर्माण जितनी जल्दी हो सके किया जाए ताकि जल संकट से लड़ने में मदद मिले.

दिअमेर-भाशा बांध का निर्माण ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा और गिलगित-बल्टिस्तान में और मोहमंड बांध का निर्माण मांडा इलाक़े की स्वात नदी पर होना है.

पाकिस्तान चीन का भले ही सदाबहार दोस्त रहा है, लेकिन सिल्क रोड को लेकर दोनों देशों की दोस्ती जटिल दौर से गुजर रही है. औपनिवेशिक काल की अरब सागर से हिन्दुकुश तलहटी के बीच की रेलवे लाइन के पुनर्निर्माण के लिए 8 अरब 20 करोड़ डॉलर की परियोजना में लगातार देरी हो रही है.

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार इस देरी के कारण पाकिस्तान एक बार फिर से चीन की सिल्क रोड परियोजना को लेकर आशंकित है. रॉयटर्स का कहना है कि पाकिस्तान को लग रहा है कि वो क़र्ज़ के दुष्चक्र में फंस सकता है.

इस रेल परियोजना से कराची और पेशावर को जोड़ना है और यह चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का अहम हिस्सा है. रॉयटर्स का कहना है कि इस प्रोजेक्ट की शर्तों को लेकर पाकिस्तान बहुत सहज नहीं है. प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान ख़ान ने विदेशी क़र्ज़ों को लेकर चिंता जताई है.

कहा जा रहा है कि इसी को देखते हुए पाकिस्तान ने दोनों बांधों के लिए विदेशी क़र्ज़ के बदले अपने देश के नागरिकों से चंदा लेना बेहतर समझा.

दि-अमेर भाशा और मोहमंड बांध के लिए फंड

जस्टिस निसार ने चार जुलाई को पाकिस्तान के वित्त मंत्रालय को आदेश दिया कि वो 'दि-अमेर-भाशा और मोहमंड डैम फंड-2018' नाम से एक बैंक अकाउंट खोले ताकि लोगों के चंदे से बांध बनाने के लिए पैसा जुटाया जा सके. वित्त मंत्रालय ने 6 जुलाई 2018 को यह अकाउंट खोल दिया.

निसार ने लोगों से पैसे दान करने का आग्रह किया. इसकी शुरुआत ख़ुद जस्टिस निसार ने की और उन्होंने अपने निजी खाते से दस लाख पाकिस्तानी रुपए दिए. जस्टिस निसार की तरह और जजों ने भी इस अकाउंट में पैसे डाले. इसके अलावा पाकिस्तानी सेना के अधिकारी, नौकरशाह, मीडिया घराने और सरकारी और निजी संगठनों ने भी बांध बनाने के लिए इस अकाउंट में पैसे डाले.

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एक अक्टूबर तक इस अकाउंट में पाकिस्तानियों ने 420 करोड़ रुपए जमा कर दिए हैं. इस अकाउंट में कितने पैसे जमा हो रहे हैं यह पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर सार्वजनिक है. स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान, नेशनल बैंक ऑफ़ पाकिस्तान और बाक़ी के सभी सरकारी बैंकों की सभी शाखाओं में ये पैसे जमा करने की सुविधा है.

ज़्यादातर बैंकों ने प्रवेश द्वार पर एक बैनर लगा दिया है कि बांध के चंदे के पैसे यहां जमा किए जाते हैं. बैंक पैसे जमा करने वाले ग्राहकों को एसएमएस के ज़रिए अलर्ट भी भेजता है कि कितने पैसे अब तक जमा हो चुके हैं.

पाकिस्तान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेग्युलेटरी अथॉरिटी (पीईएमआरए) ने आठ अगस्त को सभी निजी चैनलों के लिए एक अधिसूचना जारी की थी और इसमें कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार दैनिक मॉर्निंग शो और प्राइम टाइम में एक मिनट का वक़्त लोगों से अपील करने में देना है कि बांध के निर्माण में चंदा दें.

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पाकिस्तान की सत्ता जब इमरान ख़ान के हाथों में आई तो उन्होंने राष्ट्र संबोधन के अपने दूसरे भाषण में बांध के लिए सुप्रीम कोर्ट की पहल पर जुटाए जा रहे फंड का भी ज़िक्र किया. उन्होंने जस्टिस निसार की तारीफ़ करते हुए कहा कि जो काम सरकार का था उसे सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ रहा है.

इमरान ख़ान ने कहा कि पूर्ववर्ती सरकारों की उपेक्षा के कारण सुप्रीम कोर्ट को सक्रिय होना पड़ा है. इमरान ख़ान ने विदेशों में बसे पाकिस्तानियों से इस बांध के निर्माण में आर्थिक मदद देने की अपील की. इमरान ख़ान ने कहा, ''अगर विदेशों में बसे हर पाकिस्तानी ने एक-एक हज़ार डॉलर चंदे के तौर पर दे दिए तो यह बांध निर्माण के लिए पर्याप्त होगा."

हालांकि बाद में इमरान ख़ान ने इस पर सफ़ाई देते हुए कहा कि एक हज़ार डॉलर का चंदा देना विदेशों में काम कर रहे सभी पाकिस्तानियों के लिए आसान नहीं है. ख़ान ने कहा कि ख़ास कर जो पाकिस्तानी मध्य-पूर्व में रह रहे हैं उनके लिए यह मुश्किल काम है.

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पाकिस्तानी पीएम ने कहा कि यह काम यूरोप और अमरीका में बसे पाकिस्तानी आराम से कर सकते हैं. हालांकि इसमें विदेशों में बसे पाकिस्तानियों की तरफ़ से बहुत कम मदद आ रही है. 24 सितंबर तक कुल चंदे में विदेशों में बसे पाकिस्तानियों का योगदान महज 7.8 फ़ीसदी था.

24 सितबंर को सुप्रीम कोर्ट ने इस अकाउंट का नाम बदल दिया. अब इस अकाउंट का नाम है- सुप्रीम कोर्ट एंड प्राइम मिनिस्टर फंड फोर दिअमेर-भाशा एंड मोहमंड डैम्स.

लोगों के चंदे के पैसे से बांध बनाने की कोशिश की अलग-अलग स्तरों पर आलोचना भी हो रही है. सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट का निर्माण इस तरह के चंदे से नहीं किया जा सकता है. ऐसी आलोचनाओं को जस्टिस निसार ने सिरे से ख़ारिज कर दिया है. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि जो भी इस कोशिश का विरोध कर रहा है वो देशद्रोही है.

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जस्टिस निसार ने यहां तक कहा कि वो संविधान के अनुच्छेद 6 को देख रहे हैं कि क्या ऐसे लोगों पर राजद्रोह का मुक़दमा चलाया जा सकता है. बाद में पीईएमआरए ने निजी चैनलों के लिए एक अघिसूचना भी जारी की और कहा कि वो अपने कार्यक्रम में इसकी आलोचना प्रसारित नहीं करें. कहा गया कि अगर किसी किस्म की टिप्पणी की जाती है तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी.

पहले भी चले हैं अभियान

पाकिस्तान में किसी सरकारी प्रोजेक्ट का फंड लोगों के चंदे से जुटाने का अभियान कोई पहली बार नहीं चलाया जा रहा है. पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने विकास की नई परियोजनाओं के लिए इसी तरह का अभियान देश भर में चलाया था. इसमें टीवी चैनलों का इस्तेमाल किया जाता था और लोगों से हर दिन एक रुपए दान करने के लिए कहा जाता था.

पाकिस्तान के तीन बार प्रधानमंत्री रहे नवाज़ शरीफ़ ने 'क़र्ज़ उतारो, मुल्क संवारो' कैंपेन 1998 में शुरू किया था. उन्हें लगा था कि वो सत्ता संभालते ही वो पाकिस्तान के विदेशी क़र्ज़ का भुगतान कर देंगे. हालांकि अब तक साफ़ नहीं हो पाया है कि उन पैसों का इस्तेमाल कहां किया गया.

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2005 में भूकंप आने के बाद राहत-बचाव कार्य के लिए पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी राष्ट्रपति राहत कोष शुरू किया था. शुरुआत में लोगों ने दान करने को लेकर उत्साह भी दिखाया था, लेकिन जल्द ही लोग ठंडे पड़ गए थे.

ज़ाहिर है पाकिस्तान में और नए बांधों की ज़रूरत है. इमरान ख़ान ने पिछले हफ़्ते कहा था कि पाकिस्तान के पास 30 दिनों के ही पानी स्टोर करने की क्षमता है. हालांकि कई विश्लेषकों का कहना है कि केवल बांध बनाने से ही पाकिस्तान का जल संकट दूर नहीं हो जाएगा. पाकिस्तान की बढ़ती आबादी पर लगाम को एक उपाय के तौर पर देखा जा रहा है. पाकिस्तान की आबादी प्रतिवर्ष 2.4 फ़ीसदी की दर से बढ़ रही है जबकि भारत की यह दर 1.9 फ़ीसदी है.

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