'ब्राज़ील का ट्रंप' बोलसानरू बनने वाले हैं राष्ट्रपति

  • 8 अक्तूबर 2018
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Image caption ब्रााजील में राष्ट्रपति पद की ओर बढ़ते बोलसानरो

दक्षिण अमेरिकी देश ब्राज़ील में राष्ट्रपति पद के लिए वोट डाले जा रहे हैं. दुनिया का एक बड़ा लोकतंत्र अपने देश के नए नेता को चुनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

इस रेस में ज़ाइर बोलसानरू सबसे आगे चल रहे है. उनके ख़ाते में कुल 46.93 फ़ीसदी वोट शेयर अबतक आ चुके हैं जो कुल गिने गए वोटों का 94 फ़ीसदी हिस्सा है. वहीं दूसरे नंबर पर लेफ्ट वर्कर पार्टी के नेता फ़र्नांडो हद्दाद हैं.

ज़ाइर बोलसानरू की बात करें तो उनकी छवि एक अति दक्षिणपंथी नेता की है. उन्हें 'ब्राज़ील का ट्रंप' भी कहा जाता है.

बोलसानरो और विवाद

63 साल के ज़ाइर बोलसानरूअपने बयानों को लेकर विवादों में रहते हैं. वे गर्भपात, नस्ल, शरणार्थी और समलैंगिकता को लेकर भड़काऊ बयान दे चुके हैं.

बोलसानरू पूर्व सेना प्रमुख रह चुके हैं और वे ख़ुद की छवि ब्राजील के हितों के रक्षक के तौर पर पेश करते हैं. वे ब्राजील में सेना के शासन को सही ठहराते रहे हैं. वे मानते हैं कि देश की मजबूती के लिए ब्राज़ील को 1964-85 वाले सेना के तानाशाही के दौर में दोबारा जाना चाहिए.

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Image caption बोलसानरो और विपक्षी नेता फर्नांडो हद्दाद

महिला विरोधी बयान देने वाले बोलसानरो ने जब चुनाव के लिए अपनी दावेदारी पेश की तो उसके विरोध में कई रैलियां की गईं. कई ब्राज़ीली लोग उनकी विचारों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते.

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'हिटलर जैसा तानाशाह'

कुछ मीडिया के जानकार उन्हें 'ट्रंप ऑफ ट्रॉपिक्स' यानी ब्राज़ील का ट्रंप कह रहे हैं. उनके चुनाव और सोशल मीडिया प्रचार की तुलना ट्रंप के चुनावी प्रचारों से की जा रही है.

ज़ाइर बोलसानरू के प्रतिद्वंदी सिराओ गोमेज़ उन्हें 'ब्राज़ील का हिटलर' भी कह चुके हैं. चुनाव के पहले तमाम मीडिया के ओपिनियन पोल में बोलसानरू के पक्ष में नतीजे जाते नज़र आ रहे थे.

छह सितंबर को उनपर चाकू से हमला किया गया जिसके कारण वह अस्पताल में रहे और अपने चुनावी प्रचारों में ख़ुद हिस्सा ना ले सके. इसके बावजूद उन्हें ओपिनियन पोल में बढ़त मिलती दिखी.

अपने सातवें कांग्रेस के कार्यकाल में ज़ाइर बोलसानरू ने अपनी प्राथमिकताएं सुनिश्चित की. उन्होंने बताया कि उनका लक्ष्य सेना के हितों की रक्षा करना है और यही उनके चुनावी अभियानों का आधार रहा.

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महिला-विरोधी छवि

साल 2014 में रियो डी जेनेरियो से बतौर कांग्रेस उम्मीदवार उन्हें सबसे ज़्यादा वोट मिले थे. ख़ास बात ये है कि इस दौरान भी उन्होंने कई भड़काऊ बयानों से सुर्ख़ियां बटोरी थीं.

साल 2016 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ़ पर चल रहे महाअभियोग के दौरान कांग्रेस सदस्यों द्वारा मतदान किए जा रहे थे उस वक़्त बोलसानरो ने दिवंगत नेता कर्नल एलबर्टो उस्तरा को अपना वोट दिया था. एलबर्टो ब्राज़ील के बेहद विवादित नेता हैं. जिन पर देश में सेना की तानाशाही के दौरान कैदियों को प्रताड़ित करने का आरोप है.

इसी साल उन्होंने अपनी सहयोगी पर बेहद विवादित और अपमानजनक बयान दिया. उन्होंने कहा, ''वह महिला इस लायक नहीं है कि उसका बलात्कार किया जाए, वह बेहद बदसूरत और मेरे 'टाइप' की नहीं है.''

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सेना के हिमायती और समलैंगिकता के विरोधी

बीते कुछ सालों में उन्होंने अपने सीमा से जुड़े प्रस्तावों को और बढ़ाया है. इसके साथ ही वे आम लोगों की सुरक्षा और क़ानून-व्यवस्था की बात करते हैं. ब्राज़ील में बढ़ते अपराध के बीच उनकी ये बातें उन्हें आम मतदाताओं के बीच लोकप्रिय बनाने का एक बड़ा कारण मानी जाती रही हैं.

11 सितंबर को उन्होंने ट्वीट किया, ''सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है, ये बेहद ज़रूरी है. लोग रोज़गार चाहते हैं, शिक्षा चाहते हैं. लेकिन नौकरियों का कोई मतलब नहीं होगा यदि वो घरों को आएं और रास्ते में ही लूट लिए जाएं तो. यदि ड्रग्स की तस्करी स्कूलों में होगी तो शिक्षा का कोई मतलब नहीं होगा.''

साल 2011 में प्लेब्यॉय को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ''मैं अपने बेटे को एक समलैंगिक होने से बेहतर एक सड़क हादसे में मरते देखना चाहूंगा.''

इस साल जून में एक टीवी चैनल को दिए गए इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ''राजनीतिक रूप से सही होना वामपंथियों का काम है. मुझ पर हमेशा सबसे ज़्यादा हमले होते रहे हैं.''

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अपने चुनाव अभियान के दौरान ज़ाइर बोलसानरू ने कई नए मतदाताओं को आकर्षित किया. ख़ास कर मुक्त-बाज़ार की आर्थिक नीतियों का समर्थन करने के कारण उन्हें बिज़नेस जगत से ख़ासा समर्थन मिला है. ओपिनियन पोल के नतीजों से ही बाज़ार में तेजी देखी गई.

ब्राज़ील के कई नौजवानों को उनकी भाषाशैली रिझाती है तो कई को उनके सोशल मीडिया पर कही जाने वाली बातें लुभाती हैं. हालांकि कई ऐसे लोग भी हैं जो समलैंगिकता पर उनके विचारों पर असहमति दर्शाते हैं.

बोलसानरू के विपक्षी और वापमंथी नेता फ़र्नांनडो की पार्टी पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप से भी बोलसानरू को फ़ायदा पहुंचा है.

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दो वर्गों की लड़ाई

साउ पाउलो में पत्रकारिता कर रहे शोभन सक्सेना कहते हैं, ''अगर ब्राज़ील का इतिहास देखें तो यहां पर अफ़्रीका से बंधक बड़ी तादाद में लाए गए थे. ब्राजील दुनिया का आख़िरी देश था जहां गुलामी 1988 में खत्म हुई. ब्राज़ील में लगभग 54-60 फ़ीसदी लोग या तो अफ़्रीकी मूल के हैं या तो मिक्स रेस के हैं. ब्राजील में सत्ता वर्ग में ज़्यादातर गोरे लोग हैं.''

''लेकिन यहां का समाज काले और गोरों में बंटा हुआ है. काले लोगों के ज़्यादा होने के बावजूद यहां पर गोरे लोगों का हर क्षेत्र में दबदबा बना हुआ था. लेकिन साल 2002 में ब्राज़ील में दक्षिणपंथी पार्टी सत्ता में आई तो यहां मूलभूत परिवर्तन हुए. उन्होंने आरक्षण लाने का काम किया, ग़रीबों का भत्ता बढ़ाया. इससे ज़्यादातर लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर आए. इसे देखते हुए उच्च वर्ग में एक प्रतिक्रिया आई और उसके बदले की भी प्रतिक्रिया हमें देखने को मिली. आज जो ब्राज़ील के हालात है वो इसी का नतीजा हैं. वहां दो वर्गों में एक टकराव देखने को मिल रहा है. देश में एक सामाजिक लोकतंत्र का मॉडल है और एक दक्षिणपंथ का मॉडल है.''

''बोलसानरू पूर्व आर्मी चीफ़ थे. उनका राजनीतिक जीवन एक आर्मी यूनियन के नेता के तौर पर रहा. धीरे-धीरे ये मुख्यधारा की राजनीति में आए और रियो डी जेनेरियो से कांग्रेस सदस्य बन कर कांग्रेस गए.''

''इनकी राजनीति का आधार पुलिस और आर्मी ही रहा है. ज़ाइर बोलसानरू का पूरा राजनीतिक करियर सेना की तानाशाही को महान बनाने से शुरु हुआ और अबतक आधार वही चल रहा है. सबसे अहम बात है कि जब ये सत्ता में आएंगे तो इनका पूरा कैबिनेट सेना के लोगों से भरा होगा. वे ऐसा पहले ही साफ़ कर चुके हैं.''

1990 में पहलीबार पहुंचे कांग्रेस

जैर मेसियास ज़ाइर बोलसानरू का जन्म 21 मार्च,1955 को साउ पाउलो के कैंपिनास शहर में हुआ था. साल 1977 में उन्होंने अगलस नेग्रास मिलेट्री अकादमी से ग्रेजुएशन किया.

साल 1986 में उन्हें एक पत्रिका में लिखे लेख के लिए जेल जाना पड़ा था. इस लेख में उन्होंने सेना की कम तनख़्वाह की शिकायत की थी. साल 1990 में वे पहली बार कांग्रेस गए. बोलसोनारो के वैवाहिक जीवन की बात करें तो उन्होंने तीन शादियां की हैं.

बोलसानरू के आलोचक मानते हैं कि उनके चुनावी घोषणापत्र में कुछ ख़ास नहीं है लेकिन उनके समर्थक उनकी बढ़ती लोकप्रियता से खुश हैं.

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