इन सात डर के साये में क्यों रहता है सऊदी अरब?

  • 9 अक्तूबर 2018
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Image caption किंग सलमान

सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खाशोज्जी सऊदी के शाही शासन की जमकर आलोचना करते थे. अरबी से उनके लेख और रिपोर्ट का अनुवाद वॉशिंगटन पोस्ट में छपता था. वो दो अक्टूबर को इस्तांबुल में सऊदी के वाणिज्य दूतावास में दिन में डेढ़ बजे गए. इसके बाद से वो अब तक दिखे नहीं हैं.

सऊदी में लोकतंत्र नहीं है इसलिए प्रेस की आज़ादी भी नहीं है. जमाल सऊदी में नहीं रहते थे इसलिए वो शाही शासन की आलोचना करते थे. सऊदी कथित तौर पर ऐसे पत्रकारों से सतर्क रहता है जो लोकतंत्र और आज़ाद प्रेस की बात करता है.

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा का कहना है कि किंग सलमान को तख़्तापलट का डर सताता रहता है इसलिए वो मज़बूत सेना और आज़ाद प्रेस से हमेशा सावधान रहते हैं. आग़ा कहते हैं कि सऊदी की सेना इसलिए भी बहुत कमज़ोर है क्योंकि इस परिवार के मन में डर बना रहता है कि कहीं सेना मुल्क की कमान अपने हाथों ना ले ले.

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Image caption किंग अब्दुल्लाह

सऊदी की गतिविधियां

सऊदी ने बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात के साथ मिलकर क़तर के ख़िलाफ़ नाकेबंदी की तो सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद सलमान ने इसे ख़त्म करने की पहली शर्त अल-जज़ीरा को बंद करने की रखी थी. अल-जज़ीरा क़तर का मीडिया घराना है और सऊदी को इसकी पत्रकारिता रास नहीं आती है.

पिछले हफ़्ते ही अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि सऊदी के किंग सत्ता में अमरीकी सेना की मदद के बिना दो हफ़्ते भी नहीं रह सकते हैं. ट्रंप ने यह भी कहा कि सऊदी को अपनी सुरक्षा के लिए और भुगतान करना चाहिए.

ट्रंप की टिप्पणी को दुनिया भर की मीडिया में सऊदी के अपमान के तौर पर पेश किया गया. ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जावेद ज़रीफ़ ने कहा कि ट्रंप सऊदी का लगातार अपमान कर रहे हैं इसलिए उसे पड़ोसियों के साथ सहयोग के बारे में सोचना चाहिए.

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इसके साथ ही कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या सऊदी का शाही परिवार डर के साये में रहता है? सऊदी की गिनती दुनिया के अमीर देशों में होती है, लेकिन क्या वो अपनी सुरक्षा भी ख़ुद करने में सक्षम नहीं है? वे और कौन से डर हैं जिनसे सऊदी चिंतित रहता है?

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि पिछले दो सालों में सऊदी ने कुछ ऐसे फ़ैसले किए हैं जिनसे वो समस्या से निकलने की बजाय फंसता ही गया. 2016 में जाने-माने शिया धर्म गुरु निम्र अल-निम्र समेत 47 लोगों को सऊदी ने फांसी दे दी थी.

यमन के साथ युद्धविराम को ख़त्म कर दिया. ईरान के साथ राजनयिक संबंधों को ख़त्म कर लिया और 2017 में क़तर के ख़िलाफ़ नाकेबंदी कर दी. इन फ़ैसलों से सऊदी को क्या फ़ायदा हुआ?

सऊदी 'ग़रीब' और छोटे मुल्क यमन से अब तक नहीं जीत पाया, क़तर इस नाकेबंदी से तबाह नहीं हुआ और ईरान से उसने और दुश्मनी मोल ले ली. कहा जाता है कि सऊदी डर के कारण फ़ैसले लेता है, लेकिन बाद में वे फ़ैसले उसी पर भारी पड़ने लगते हैं.

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सऊदी अरब की मुख्य समस्या क्या है

जानी-मानी पत्रकार और संपादक जेनिफ़र विलियम्स का मानना है कि सऊदी बाहरी ख़तरों और अपनी कमज़ोरियों के साथ अपने शासन के अंतर्विरोधों में जकड़ा हुआ है. वो कहती हैं कि सऊदी को जितना डर बाहर से है उतना ही भीतर से.

1932 में औपचारिक रूप से किंगडम ऑफ सऊदी के बनने के बाद से उसे कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. ये चुनौतियां बाहरी और भीतरी दोनों हैं.

सऊदी ने इराक़ और ईरान के साथ हमेशा आक्रामक तरीक़े से ख़ुद को पेश किया है. सऊदी की आक्रामकता अपने सभी पड़ोसियों के साथ रही है. 1979 के नंवबर महीने में हथियारबंद इस्लामिक चरमपंथियों के एक समूह ने मक्का की अल-हराम मस्जिद को अपने क़ब्जे में कर लिया था और हाऊस ऑफ़ सऊद को गिराने की घोषणा की थी.

इस घटना से सऊदी की प्रतिष्ठा पर काफ़ी चोट पहुंची थी. हालांकि इसके बावजूद वहां का शाही शासन चलता रहा. 2000 के दशक के मध्य में अल-क़ायदा का चरमपंथ मज़बूत हुआ तब भी सऊदी का शासन सलामत रहा.

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अरब में लोकतंत्र को लेकर कई देशों की जनता सड़क पर अड़ गई तब भी सऊदी किंगडम पर कोई असर नहीं हुआ. इन सभी घटनाओं को सऊदी के शाही परिवार के डर से जोड़ा जाता है. क़मर आगा कहते हैं कि शाही परिवार में असुरक्षा की भावना प्रबल है.

सऊदी शासन में डर की जड़ क्या है?

बाक़ी देशों की तुलना में आधुनिक सऊदी युवा है. जो सऊदी अरब अभी है वो एकीकृत नहीं था. सऊदी के नेतृत्व में असुरक्षा की भावना को समझने के लिए कुछ तथ्यों को जानना ज़रूरी है. इतिहासकार एलेक्सी वासिलिव ने वॉक्स को दिए एक इंटरव्यू में इसकी व्याख्या दी है जो सातवीं शताब्दी में इस्लाम के जन्म से 18वीं सदी तक जाती है.

उन्होंने कहा है, ''यहां सभी अरबियों के पास सत्ता नहीं थी. इस प्रायद्वीप में शांति और स्थिरता नहीं थी. सदियों तक अरब के लोग बँटे हुए थे. ज़्यादातर बेहद छोटे राज्यों में बँटे हुए थे. ये लोग ख़ानाबदोश थे और इनके अपने-अपने गुट थे. अरब में ख़ानाबदोशों के बीच एकीकृत राज्य की परिकल्पना बिल्कुल नई थी.''

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जब सऊदी का जन्म हुआ तो यहां के क़बीलों को एक करने की कोशिश की गई और आज भी यह कोशिश जारी है. सऊदी के शाही परिवार के बारे में कहा जाता है कि वो लोगों को साथ रखने के लिए धर्म, पैसा और ताक़त का इस्तेमाल करता है.

जब ईरान में 1979 में इस्लामिक क्रांति हुई तो सऊदी के लिए एक असुरक्षा की भावना बढ़ी. ईरानी क्रांति ने मुस्लिम वर्ल्ड में एक प्रतिस्पर्धी इस्लामिक शासन का विकल्प पेश किया. यह सऊदी की राजशाही को असुरक्षित करने वाला था.

ईरान की इस क्रांति ने राजशाही को ख़ारिज कर दिया. 1979 में अयातुल्लाह ख़ुमैनी ने खाड़ी के देशों में अमरीका समर्थित राजशाही को उखाड़ फेंकने की अपील की. इसमें इन्होंने सऊदी से भी राजतंत्र को उखाड़ फेंकने को कहा था. सऊदी में इस्लाम के दो पवित्र स्थल हैं पर ईरान ने कई स्तरों पर मुस्लिम दुनिया में सऊदी की सत्ता को चुनौती दी.

ईरान भले शिया मुस्लिम देश है, लेकिन उसकी शासन प्रणाली ने मुस्लिम दुनिया में राजशाही को लेकर टकराने का भाव पैदा किया. ईरान ने सऊदी की तुलना में ख़ुद को मुस्लिमों का हितैषी होने की तस्वीर को पेश करते हुए सऊदी को चुनौती दी.

सऊदी के शाही परिवार की प्रासंगिकता सऊदी की इस्लामिक साख से भी जुड़ी है. सऊदी इस्लाम की वहाबी धारा को प्रोत्साहित करता है.

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सऊदी के डर

  • सऊदी का शाही परिवार सत्ता पर अपनी पकड़ को लेकर हमेशा से सतर्क रहा है. आज की तारीख़ में जानकार कहते हैं कि शाही परिवार के भीतर भी मतभेद हैं. सऊदी को डर है कि इस्लामिक वर्ल्ड में ईरान कहीं उस पर हावी न हो जाए.
  • राजशाही के ख़िलाफ़ कहीं लोग विद्रोह ना कर दें, जैसा कि मिस्र और ट्यूनीशिया में लोगों ने शाही शासन को उखाड़ फेंका.
  • सुन्नी चरमपंथियों के उभार से भी सऊदी को डर लगा रहता है कि कहीं उसे भ्रष्ट और ग़ैर-इस्लामिक न घोषित कर दे. अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट का उभार भी सऊदी के शाही परिवार के लिए डराने वाला रहा है.
  • पूर्वी प्रांतों में शिया उभार भी सऊदी के लिए चिंताजनक है. सऊदी के पूर्वी प्रांतों में व्यापक तेल भंडार है जहां शिया अल्पसंख्यक रहते हैं.
  • सीमा पर ईरान का बढ़ता प्रभाव. ख़ास कर बहरीन और यमन के सीमाई इलाक़ों में ईरान के बढ़ते प्रभाव से सऊदी चिंतित है.
  • अगर अमरीका ने सऊदी के शाही परिवार से अपना समर्थन खींच लिया और पाला बदलते हुए ईरान के साथ चला गया को पूरा स्थिति बदल जाएगी.
  • मुस्लिमों के पवित्र स्थलों को लेकर शाही परिवार से भरोसे के उठने का डर.

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