पाकिस्तान में ISI प्रमुख की कितनी अहमियत?

  • 13 अक्तूबर 2018
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Image caption लेफ़्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर

पाकिस्तानी सेना के सूचना विभाग के मुताबिक़ लेफ़्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर को देश की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई (इंटरसर्विसेज इंटेलिजेंस एजेंसी) का नया प्रमुख नियुक्त किया गया है.

लेफ़्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर पाकिस्तानी सैन्य अकादमी के स्नातक नहीं हैं बल्कि उन्होंने ऑफ़िसर्स ट्रेनिंग स्कूल से फ़ौज की फ्रंटियर फ़ोर्स रेजीमेंट में कमीशन हासिल किया था.

वो लेफ़्टिनेंट कर्नल की हैसियत में सऊदी अरब में भी तैनात रह चुके हैं जबकि कमांड एंड स्टाफ़ कॉलेज में पढ़ने-पढ़ाने से भी जुड़े रहे हैं.

भारत की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक के दावे से कुछ दिन पहले ही लेफ़्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर पाकिस्तान के सेना मुख्यालय में तैनात हुए थे.

आसिम मुनीर ख़ुफ़िया एजेंसी के प्रमुख जनरल नवीद मुख़्तार की जगह लेंगे जिन्होंने 2016 में आईएसआई की कमान संभाली थी.

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Image caption जनरल नवीद मुख़्तार

लेफ़्टिनेंट जनरल आसिम मुनीर इसी साल जुलाई में हुए आम चुनावों के दौरान सेना के एक और ख़ुफ़िया विभाग मिलिट्री इटेंलिजेंस यानी एमआई के प्रमुख थे. वो सेना में एक सख़्त अफ़सर के तौर पर जाने जाते हैं.

अहम ओहदों, ख़ास तौर पर डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस (डीजीएमआई) रहने की बदौलत उनके बारे में विश्लेषकों का मानना है कि आईएसआई में भी सेना की पहले से जारी नीतियों और क़दमों को और ज़्यादा अहमियत मिलेगी.

आईएसआई को पाकिस्तानी सेना का सबसे अहम अंग माना जाता है लेकिन अब तक सिर्फ़ जनरल अशफ़ाक परवेज़ कयानी ऐसे अकेले सैन्य प्रमुख थे जो पाकिस्तानी सेना के प्रमुख बनने से पहले आईएसआई के प्रमुख भी थे.

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क्या प्रमुख बदलने से आईएसआई की नीतियों पर फ़र्क़ पड़ता है?

इस सवाल का जवाब देते हुए पाकिस्तान के पूर्व सैन्य सचिव लेफ़्टिनेंट जनरल आसिफ़ यासीन का कहना था कि सेना की नीतियां प्रमुखों के बदलने से नहीं बदलती हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा कि पाकिस्तान में बहुत कम ही संस्थान ऐसे हैं जो अपनी निजी नीतियों का अनुसरण करते हैं. ऐसा नहीं होता कि नया सेना प्रमुख, नया चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी या नया आईएसआई प्रमुख आए और वो कोई नया रास्ता अपना करके उस पर चलना शुरू कर दें.

"यहां राष्ट्रीय रणनीति के तहत रास्ता अख़्तियार किया जाता है और सेना और आईएसआई उसी का हिस्सा होती हैं. इसलिए नीति में कोई बड़ा बदलाव न तो नया प्रमुख ला सकता है और न ही वो लाता है."

उन्होंने कहा कि देश के अंदर सुरक्षा के मामलों में भी आईएसआई की अहम भूमिका होती है. पाकिस्तान में उसके क़िरदार में बीते दो दशकों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है और नीतियां बनाने में दूसरे संस्थानों की तरह ही सेना का ये हिस्सा भी अपनी राय देता है.

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आसिफ़ यासीन कहते हैं "ये एंजेंसी नीतियां बनाती नहीं है बल्कि नीतियों को लागू कराती है. इसी एजेंसी के इनपुट पर सरकार अपनी नीतियां निर्धारित करती है."

क्या आईएसआई सरकार में भी दख़ल देती है?

इस सवाल पर आसिफ़ यासीन ने कहा कि, "राजनीति में दख़ल तो दुनियाभर में होता है, कहीं कम तो कहीं ज़्यादा. लेकिन समय बीतने के साथ-साथ पाकिस्तान समेत दुनिया भर में राजनीति में सेना के किरदार में कमी आ रही है. जिसका कारण लोकतंत्र का मज़बूत होना है."

सेना में आमतौर पर ये माना जाता है कि डायरेक्टर जनरल मिलिट्री ऑपरेशंस यानी डीजीएमओ और डायरेक्टर जनरल मिलिट्री इंटेलिजेंस सेना प्रमुख के सबसे क़रीब होते हैं.

विश्लेषक कहते हैं कि इससे ये संकेत भी मिलते हैं कि प्रधानमंत्री ने सेना प्रमुख के क़रीबी अफ़सरों में से एक को इस पद पर तैनात किया है.

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प्रधानमंत्री के अधीन है आईएसआई

डीजीआईएसआई की नियुक्ति प्रधानमंत्री का विवेकाधिकार है और ये एजेंसी क़ानून के तहत प्रधानमंत्री के ही मातहत है. इस तरह आईएसआई प्रमुख प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख दोनों के प्रति ही जवाबदेह होते हैं.

प्रधानमंत्री इमरान ख़ान अपने कार्यकाल में दो बार सेना प्रमुख की नियुक्ति भी करेंगे.

मौजूदा सेना प्रमुख 2019 में रिटायर होंगे जबकि उनकी जगह आने वाले सेना प्रमुख 2022 में रिटायर होंगे.

मिलिट्री इंटेलिजेंस यानी एमआई का संबंध दुश्मन फ़ौजों और उनकी गतिविधियों के साथ है लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक आईएसआई राजनीतिक और सैन्य दोनों स्तर पर काम करती है और अपना इनपुट देती है.

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Image caption पाकिस्तान सेना और इंटेलिजेंस एजेंसी को पाकिस्तान आवामी पार्टी की एक कार्यकर्ता प्रदर्शन के दौरान समर्थन देते हुए

लेफ़्टिनेंट जनरल जावेद अशरफ़ क़ाज़ी के मुताबिक़ आईएसआई प्रमुख अपने संस्थान की हद तक बहुत ताक़तवर होते हैं. डीजीआईएसआई अपने संस्थान के अंदर लोगों को रख सकते हैं, निकाल सकते हैं, वापस फ़ौज में भेज सकते हैं या फिर पोस्ट आउट कर सकते हैं.

लेकिन जहां तक संस्थान से बाहर का संबंध है तो आईएसआई के प्रमुख की ताक़त का आधार उनके प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के साथ संबंधों पर है. प्रधानमंत्री उन्हें पद से हटा सकते हैं, और उनके मातहत तमाम अधिकारी सेना प्रमुख की ओर से मिलते हैं और सेना के अंदर ताक़तवर तो सेना प्रमुख ही होता है.

लेफ़्टिनेंट जनरल जावेद अशरफ़ क़ाज़ी पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो के दूसरे कार्यकाल में आईएसआई के प्रमुख थे.

उनका कहना है कि सीधे टकराव के बजाए बेनजीर भुट्टो डीजीआईएसआई के ज़रिए भी बात करती थीं. इस तरह आईएसआई प्रमुख सरकार और सेना के बीच का अहम लिंक भी होते हैं.

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