एक दूसरे को कब तक बर्दाश्त करेंगे सऊदी और अमरीका

  • 18 अक्तूबर 2018
क्राउन प्रिंस सलमान और अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप इमेज कॉपीरइट Getty Images

इन दिनों पूरी दुनिया में 'द वॉशिंगटन पोस्ट' के लिए काम कर रहे सऊदी अरब के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी के लापता होने की ख़बर चर्चा में है.

आख़िरी बार ख़ाशोज्जी को तुर्की में सऊदी अरब के वाणिज्य दूतावास में दाख़िल होते देखा गया था मगर वह बाहर नहीं आए. उनके अपहरण से लेकर हत्या तक की ख़बरें आ चुकी हैं और आरोप सऊदी अरब पर लग रहे हैं.

दरअसल ख़ाशोज्जी सऊदी अरब की राजशाही और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों के आलोचक थे. उनके इस तरह लापता होने के बाद पूरी दुनिया न सिर्फ़ सऊदी अरब बल्कि उसके सबसे क़रीबी देश अमरीका पर दबाव बना रही है.

इस दबाव का असर दोनों देशों के रिश्तों पर भी पड़ता नज़र आ रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप को भी इस मामले पर बैकफ़ुट पर आना पड़ा है और सऊदी अरब को लेकर सख़्त बयान देने पड़े हैं.

लेकिन जानकारों का कहना है कि ख़ाशोज्जी प्रकरण के सामने आने से पहले से ही इन दोनों देशों के रिश्तों में आई दरार नज़र आने लगी थी.

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दोनों की दोस्ती में दरार क्यों?

तुर्की की अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं कि पूरी दुनिया से ट्रंप पर दबाव बना है.

वो बताते हैं, "यह बात तो हर कोई जानता है कि सऊदी अरब की राजशाही में विरोधी रुख़ वाले परिजनों के साथ मोहम्मद बिन सलमान का रवैया क्या रहा है. जब ख़ाशोज्जी की ख़बर आई तो तहलका मच गया. दो हफ़्ते होने को हैं और पता नहीं है कि वो कहां हैं. ट्रंप सऊदी अरब के समर्थक माने जाते हैं. उन पर दबाव है कि ख़ाशोज्जी वॉशिंगटन में काम कर रहे थे और उन्हें इस तरह से ग़ायब कर दिया गया."

"पत्रकार बिरादरी जो मुहिम चला रही है, मोहम्मद बिन सलमान उसके निशाने पर हैं. मांग की जा रही है कि उनके ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय अदालत में मुक़दमा दर्ज किया जाए. ऐसे में ट्रंप ने धमकी भरे अंदाज़ में कहा कि अगर सऊदी अरब ने इस मामले पर संतोषजनक जवाब नहीं दिया तो प्रतिबंध तक लग सकते हैं."

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लेकिन ख़ाशोज्जी का मामला सामने आने के पहले ही इस महीने की शुरुआत में ट्रंप ने मिसीसिपी में एक रैली के दौरान ट्रंप ने सऊदी अरब और वहां के शासक किंग सलमान पर तीखी टिप्पणियां की थीं.

ट्रंप के आक्रामक तेवर

अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार और अमरीका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि ख़ाशोज्जी के मामले के सामने आने से पहले ही ट्रंप आक्रामक हो गए थे.

"जब से अमरीका ने ईरान से हुए परमाणु समझौते से अलग होने का फ़ैसला किया है, तेल की क़ीमतें बढ़ती जा रही हैं. अमरीका ने सऊदी अरब को पिछले कुछ हफ़्तों में तेल का उत्पादन बढ़ाने को कहा है. मगर सऊदी अरब के पास इतनी क्षमता नहीं कि वह ईरान के उत्पादन के कोटे को भर सके. इसी कारण तेल की क़ीमतें बढ़ रही हैं."

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"दूसरी बात यह है कि मोहम्मद बिन सलमान ने यमन में जो जंग शुरू की थी, वो ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही. मानवाधिकार उल्लंघन हो रहा है, युद्धापराध हो रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यह हिंसा अमरीकी हथियारों से हो रही है, अमरीका सहयोग कर रहा है. इस कारण अमरीका की बदनामी हो रही है और वह तंग भी आ गया है क्योंकि इसमें उसके किसी हित की पूर्ति भी नहीं हो रही. इसीलिए ट्रंप ने रैली में कहा था कि अमरीका के सहयोग के बिना सऊदी शासक कुछ नहीं कर सकते."

सऊदी अरब भी बना रहा है दूरी?

ऐसा नहीं है कि अमरीका ही सऊदी अरब नीतियों या क़दमों के कारण उससे दूरी बनाने की कोशिश कर रहा है. जानकारों का कहना है कि सऊदी अरब भी खाड़ी देशों के बीच अपना अलग और अमरीका से स्वतंत्र वर्चस्व बनाने की कोशिश कर रहा है.

अंकारा यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर ओमेर अनस कहते हैं इसकी शुरुआत अरब स्प्रिंग से हुई थी. वो बताते हैं, "2011 में अरब देशों में अरब स्प्रिंग नाम से क्रांतियों की शुरुआत हुई थीं, तब सऊदी अरब चाहता था कि मिस्र में होस्नी मुबारक़ सत्ता में बने रहें. मगर बराक ओबामा ने मुबारक़ से समर्थन वापस ले लिया था और उन्हें सत्ता से हटना पड़ा था."

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"इसके बाद सऊदी अरब समझ गया कि बहुत दिनों तक अमरीका की नीतियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. इसलिए उसकी नीति ख़ुद को अपने बूते पर खड़ा करने की ज़रूरत है. 2011 के बाद से ही वह ऐसी नीतियां अपना रहा है."

कब से साथ हैं अमरीका और सऊदी अरब

सऊदी अरब में जहां इस्लामिक राजशाही है वहीं अमरीका धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक गणतंत्र है. प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान बताते हैं कि दोनों देशों के रिश्ते 1935 से शुरू होते हैं.

वो कहते हैं, "सऊदी अरब और अमरीका के ताल्लुकात 1935 से शुरू हुए जब अमरीकी कंपनियों ने वहां तेल खोजना शुरू किया. उससे पहले सऊदी अरब के रिश्ते इंग्लैंड के साथ थे. 1940-50 से यहां तेल की खोज से लेकर विकास में अमरीका का साथ रहा है. फिर बाद में भले ही सऊदी अरब के तेल से अमरीका का नियंत्रण हट गया मगर सुरक्षा को लेकर वह अमरीका पर ही निर्भर रहा. इसराइल के साथ खाड़ी देशों की जंग में सऊदी अरब ने हिस्सा नहीं लिया था. ऐसे में ओबामा के पहले कार्यकाल तक सऊदी अरब की विदेश नीति पर अमरीका का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिला है."

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मगर दोनों देशों के रिश्ते हमेशा अच्छे नहीं रहे. बीच-बीच में कई मौके़ ऐसे आए जब सऊदी अरब ने अमरीका को भी आंखें दिखाईं. मध्य पूर्व मामलों के जानकार ओमेर अनस बताते हैं, "सऊदी अरब को लगता था कि इसराइल को खड़ा करने में और यहूदियों को यहां लाकर बसाने में ब्रिटेन का हाथ था. इसलिए उन्हें लगता था कि अमरीका इस मामले में निष्पक्ष रहेगा. ब्रिटेन जब मिडल ईस्ट से हटा तो अमरीका का यहां प्रभाव बनना शुरू हुआ."

"1973 में इसराइल और अरब देशों के युद्ध में सऊदी अरब को लगा कि अमरीका निष्पक्ष रहेगा मगर उसने इसराइल का साथ दिया. इसके बाद किंग फ़ैसल ने पश्चिमी जगत के ख़िलाफ़ और इसराइल का साथ देने वालों के ख़िलाफ़ तेल की पाबंदी लगाने का एलान किया. इस तेल की पाबंदी से सारे पश्चिमी जगत में हाहाकार मच गया. ये पहला मौक़ा था जब सऊदी और अमरीका के बीच मतभेद बड़े स्तर पर उबरकर सामने आए."

"किंग फै़सल ने उस तेल कंपनी को अपने नियंत्रण में ले लिया जिसे अमरीका ने बनाया था और उसका नाम भी बदल लिया. इस तरह सऊदी अरब ने ख़ुद को अमरीकी छाते से बाहर लाने की कोशिश की थी. लेकिन शीत युद्ध ख़त्म होते-होते सऊदी अरब को भी अपनी नीतियों में बदलाव लाने की की ज़रूरत महसूस हुई."

कैसा रिश्ता है अमरीका-सऊदी अरब का

प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान बताते हैं कि पिछले 50-60 सालों में अमरीका के तीन देशों के साथ बेहद ख़ास रिश्ते रहे हैं.

"ब्रिटेन एक तरह से अमरीका की मदर कंट्री है और एंग्लो सेक्शन मुल्क है. दूसरा क़रीबी रिश्ता उसका इसराइल के साथ रहा है और तीसरा क़रीबी देश है सऊदी अरब. यह साफ़ अवधारणा है कि अमरीका प्रो सऊदी है और वह अमरीका के लिए अहमियत रखता है. लेकिन जैसा पीपल टू पीपल संपर्क अमरीका और इसराइल या अमरीका और ब्रिटेन के बीच है, वैसा अमरीका और सऊदी अरब के बीच नहीं है."

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"सऊदी लोग अमरीका आकर बिज़नस करके पैसा कमाकर जाते हैं मगर अमरीकी वहां जाकर न पढ़ाई करते हैं न टूरिज़म के लिए जाते हैं और न ही निवेश करते हैं. अमरीका के रिश्ते सऊदी अरब देश के साथ या यहां की संस्कृति के साथ नहीं, यहां के शाही परिवार से रहे हैं."

इस रिश्ते के ख़राब होने की वजह प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान यह भी बताते हैं कि 9/11 हमले के अधिकतर आरोपी सऊदी अरब से थे और ओसामा बिन लादेन भी सऊदी नागरिक रहे थे. इस कारण भी सऊदी अरब की छवि अमरीका में ख़राब हुई थी.

ताज़ा विवाद की ज़िम्मेदारी किसकी?

ख़ाशोज्जी की गुमशुदगी को लेकर उठे हंगामे में सबसे ज़्यादा सवाल सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पर उठ रहे हैं. उनके कुछ फ़ैसलों को अपरिपक्वता के तौर पर देखा जा रहा है.

ओमेर अनस बताते हैं, "ट्रंप औ र सऊदी अरब के बीच सहयोग तो हाल में बढ़ा है मगर किंग सलमान के बुजुर्ग होने के कारण तख़्त अब उनके बेटे मोहम्मद बिन सलमान को मिलना है. वह 33 साल के हैं और महत्वाकांक्षी हैं. कहा जाता है कि वह परिवर्तन लाना चाहते हैं मगर वह ऐसा जल्दबाज़ी के रास्ते करना चाहते हैं."

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"वह पुराने तौर-तरीक़ों को भूलकर जल्दबाज़ी वाले रास्ते में जाना चाहते हैं. प्रिंस की जल्दबाजी कहें या अनुभव की कमी कहें, उन्होंने प्रिंस बनते ही क़तर, तुर्की और अन्य देशों के ख़िलाफ़ सख़्त विदेश नीति अपना ली. हालांकि उनका अंदर ही अंदर विरोध भी हो रहा है. वह लंबे समय तक किंग रह सकते हैं. कुछ साज़िशें भी चल रही हैं, यही कारण है शाही परिवार के सदस्यों के ख़िलाफ़ उन्होंने सख़्ती की."

लेकिन क्या वजह है कि ख़ाशोज्जी की गुमशुदगही को लेकर उंगलियां सऊदी शासकों पर ही उठ रही है?

प्रोफेसर मुक्तदर ख़ान बताते हैं, "क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब की इमेज बदलने के लिए बहुत पैसे खर्च किए थे मगर ख़ाशोज्जी के स्तंभों से उनकी इमेज प्रभावित हो रही थी. सऊदी सरकार को लग रहा था कि हमारा काम ख़ाशोज्जी एक-दो स्तंभों से शून्य कर दे रहे हैं. मेरे विचार से सऊदी अरब मेसेज भेजना चाहता था कि हमारे ख़िलाफ़ कुछ भी करोगे तो हम कहीं भी पकड़ लेंगे, हमारे हाथ बहुत लंबे हैं."

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क्या प्रतिक्रिया होगी सऊदी अरब की?

ख़ाशोज्जी की गुमशुदगी को लेकर पश्चिमी देशों का दबाव सऊदी अरब पर बढ़ रहा है. इस बीच यहां के अख़बारों में इस तरह के लेख छप रहे हैं कि अगर यह दबाव और बढ़ाया गया तो पूरी दुनिया को इसका नुकसान झेलना पड़ सकता है.

तेल के दाम बढ़ने की आशंका जताई गई है. यहां तक कहा जा रहा है कि अमरीका अगर सऊदी अरब पर दबाव बनाता है तो हथियारों की ख़रीद आदि के लिए वह रूस और चीन के क़रीब जा सकता है. प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं कि इस तरह की धमकियों में अब दम नज़र नहीं आता.

"अमरीका के पास एक साल का स्ट्रैटिजिक रिज़र्व है. यानी तेल अगर मार्केट में न रहे तो एक साल तक उसे फ़र्क नहीं पड़ेगा. वे देश प्रभावित हो सकते हैं जिनके पास इतना बड़ा रिज़र्व नहीं है क्योंकि कोई भी देश एक या दो हफ़्तों से ज़्यादा का रिज़र्व तेल नहीं रखता. इस बात को समझते हुए भी यूरोपीय देश दबाव बना रहे हैं."

"ट्रंप के सत्ता में आने के बाद अमरीका ने सऊदी अरब के साथ 110 बिलियन डॉलर्स का हथियार सौदा किया है. अब अमरीका से दूर होकर रूस और चीन के पास जाने की धमकियां बाक़ी देश भी देते रहे हैं. जैसे कि तुर्की कहता था कि हम अमरीकी पादरी ब्रनसन को नहीं छोड़ेंगे और दबाव बढ़ा तो रूस के पास जाएंगे. लेकिन वे डेढ़ महीने की सख़्ती नहीं झेल सके और लीरा की क़ीमत घटकर आधी रह गई. भारत पर भी इसका असर देखने को मिलेगा. अब ख़ाशोज्जी का मामला उठा है तो ध्यान नहीं गया कि ब्रनसन को तुर्की ने रिहा कर दिया है. ऐसे में ये धमकियां मायने नहीं रखतीं"

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Image caption अर्दोआन ने अमरीका के प्रतिबंधों के आगे झुकने से इनकार कर दिया था

"चीन और रूस व्यावहारिक विकल्प नहीं"

प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान बताते हैं कि रूस और चीन भरोसेमंद साथी नहीं माने जाते. इसका उदाहरण देते हुए वह कहते हैं, "पाकिस्तान ने चीन को लेकर ऐसा ही कहा था कि वह अमरीका से बेहतर है. मगर CPEC उसके लिए जंजाल बन गया है. अमरीका ने अब तक जितनी भी मदद पाकिस्तान को दी है, वह पाकिस्तान को लौटानी नहीं है. मगर चीन जो कुछ पाकिस्तान में बना रहा है, उसका क़र्ज़ अगर पाकिस्तान नहीं चुकाता तो उस पैसे से बनने वाला इन्फ्रास्ट्रक्चर चीन की परिसंपत्ति बन जाएगा."

"पाकिस्तान की हालत देखकर यह समझ आ गया है कि रूस और चीन बोलने के लिए अच्छे हैं, अमरीका पर दबाव बनाने के लिए ठीक हैं मगर ये सदाबहार या दूर के दोस्त नहीं हैं. और वैसे भी सऊदी अरब की सेना टेक्नॉलजी को लेकर अमरीका पर निर्भर है. भारत और पाकिस्तान की सेना हथियार ख़रीदने के बाद उन्हें ऑपरेट करना जानते हैं मगर सऊदी अरब की सेना इसके लिए अमरीका के पूर्व फ़ौजियों को हायर करती है कि वह इन्हें मॉनिटर करे और सेना को इनकी ट्रेनिंग दे. इसलिए उनकी निर्भरता अमरीका पर बनी रहेगी."

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मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "यह घटना सऊदी अरब और अमरीका के संबंधों के लिए टर्निंग पॉइंट है और अगर इस मामले पर सऊदी अरब ने अमरीका को कड़ी प्रतिक्रिया दी तो संभव है कि डोनल्ड ट्रंप ईरान से संबंध बेहतर करके सऊदी अरब को अलग-थलग कर दे. इसमें अमरीका को तुर्की की भी मदद मिल सकती है, जिसने हाल ही में अमरीकी पादरी ब्रनसन को रिहा करके अमरीका से अपने संबंध सुधारे हैं. और ख़ाशोज्जी की गुमशुदगी को लेकर रोज नई जानकारियां, तुर्की की सामने ला रहा है जिससे सऊदी अरब की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं.'""

अब क्या है हल?

मध्व पूर्व मामलों के जानकार ओमेर अनस बताते हैं कि ख़ाशोज्जी मामले को लेकर उठे विवाद में अब और टकराव होने की उम्मीद नहीं है. वो बताते हैं, "अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो ने किंग सलमान से मुलाक़ात की है. यह दौरा पिछले दिनों हुई बयानबाज़ी को ख़त्म करने के लिए हुआ है."

ओमेर का कहना है कि इस विवाद को हल करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी सऊदी अरब की बनती है. वह कहते हैं, "यह बात क्लियर है कि ख़ाशोज्जी सऊदी दूतावास में गए हैं और बाहर नहीं निकले हैं. लोग समझ रहे हैं कि उनकी हत्या हुई है. इस दबाव को ख़त्म करने के लिए सऊदी अरब कोशिश करेगा कि यमन के साथ झगड़े को निपटाए और बातचीत करे. वह सीरिया की जंग को भी ख़त्म करने की कोशिश करेगा. वह क़तर और मुस्लिम ब्रदरहुड के ख़िलाफ़ खोले मोर्चे में भी नरमी बरतेगा."

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लेकिन जानकारों का कहना है कि अगर ख़ाशोज्जी मामले में सभी देशों के बीच समझौता हो भी जाता है और इसे दबाने की कोशिश की जाती है, तब भी मीडिया बिरादरी ख़ाशोज्जी के ग़ायब होने की बात को भुलाएगी नहीं. मीडिया की ओर से दबाव बना रहेगा और सऊदी अरब को दबाव का सामना करना होगा.

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