एक बिना बच्चे की मां की कहानी

  • 8 नवंबर 2018
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Image caption सांकेतिक तस्वीर

आप जिस वक़्त इस कहानी की अगली दो लाइनों को पूरा पढ़कर ख़त्म करेंगे, तब तक भारत में एक मां अपने पेट में नौ महीने तक पाले हुए बच्चे को पैदा होने के साथ ही हमेशा के लिए खो चुकी होगी.

भारत में हर 55 सेकेंड में एक औरत मरे हुए बच्चे को जन्म देती है.

मेडिकल जर्नल लेंसेट की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत में हर रोज़ 1622 बच्चे मरे हुए पैदा होते हैं. पूरी दुनिया में भारत 'स्टिलबर्थ' के मामले में सबसे आगे है. 'स्टिलबर्थ' का मतलब है, बच्चा गर्भ में नहीं बल्कि पैदा होने के बाद मर जाता है. प्रेग्नेंसी के 20 हफ़्ते तक अगर भ्रूण की मौत होती तो इसे मिसकैरेज कहते हैं. इसके बाद भ्रूण की मौत को 'स्टिलबर्थ' कहा जाता है.

2015 तक के आंकड़ों की मानें तो हर साल भारत में स्टिलबर्थ के पांच लाख 92 हज़ार मामले होते हैं. पूरी दुनिया में हर साल 26 लाख मरे हुए बच्चे पैदा होते हैं.

अपने बच्चे को खोने का दर्द दुनिया के किसी भी हिस्से की मां के लिए शायद एक जैसा ही होता है. ये कहानी एक ऐसी ही मां की है. बीबीसी पत्रकार फियोना क्रैक पिछले साल प्रेग्नेंट हुईं थीं. वो बिटिया को जन्म देने वाली थीं. लेकिन उनकी भ्रूण वाली थैली फट गई और उस पानी के साथ वो सारे सपने बह गए जो फियोना मे अपनी बेटी को लेकर देखे थे.

फियोना की ये कहानी एक साल के शोक और उससे उबरने की कहानी है.

Image caption बीबीसी पत्रकार फियोना क्रैक

मैं बिना बच्चे वाली मां हूं...

जब मैं आठ साल की थी, तब मेरी बहन को बच्चा हुआ था. मेरी मां जानती थी कि मुझे बच्चे अच्छे लगते हैं. उन्होंने मुझे कुछ दिनों के लिए बहन के घर भेज दिया ताकि मैं थोड़ी मदद कर सकूं.

मैंने शायद मदद वाला काम अच्छे से किया था. तभी जब मेरी दूसरी बहन मां बनी तो मुझे वहां भी भेजा गया.

मैं बच्चे को ऊपर-नीचे घुमाती. नासमझी में चिढ़ने वाले बड़े भाई-बहनों से नए मेहमान को बचाकर रखती.

मैंने अपनी पड़ोसन की भी मदद की. गांव के बच्चों को संभालने के लिए मैं खुद के 12 साल के होने का इंतज़ार नहीं कर सकती थी. 'मैं मां बनूंगी' ये इंतज़ार मुझसे हो नहीं पाता था.

जब मैं 29 साल की हुई तो मुझे सर्वाइकल कैंसर हो गया. मेरी ज़िंदगी बचाने के लिए जो ऑपरेशन किया गया, उसने मां बनने की मेरी संभावनाओं को ख़त्म कर दिया.

एक मेडिकल रिसर्च पेपर में मैंने पढ़ा कि एक दूसरा ऑपरेशन मेरी उम्मीदों को एक मौका दे सकता है.

मैंने एक डॉक्टर को खोजा, जो यह ऑपरेशन कर सकते थे. मैंने एक रेफरेंस भी खोजा. वह काम नहीं आया तो मैं खुद उनसे मिलने चली गई.

आईवीएफ (IVF) के बाद कई बार मेरा मिसकैरिज हुआ.

...और फिर एक सुबह मैं जिस बच्ची के ख़्वाब बुन रही थी, वह मेरे अंतिम अल्ट्रासाउंड स्कैन में दिख गई.

अस्पताल की नर्सों ने मुझे घेर लिया और होने वाले बच्चे के लिए बधाइयां दीं.

उस दोपहर मैं ऑफिस में थी. एक सहकर्मी के नौकरी छोड़ने के मौके पर मैं एक केक खा रही थी. मैंने महसूस किया कि कोई गर्म चीज़ मेरी ट्राउजर को गीली कर रही है. मेरे गर्भाशय से पानी (एम्नियॉटिक फ्लूड) दो महीने पहले ही बाहर आ रहा था.

अस्पताल ने मुझे भर्ती कर लिया. उन्होंने कहा कि वो लेबर में जितना संभव हो सके देर करेंगे, जिससे बच्चे का विकास हो सके.

10 दिन बाद डॉक्टरों ने कहा कि अब स्थिति ठीक है और मैं अगले दिन घर जा सकती हूं. लेकिन आधी रात के बाद बच्चे की एम्बिलिकल कॉर्ड अलग हो गई और उस तक ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचने बंद हो गए.

छह मिनट में ही मुझे ऑपरेशन थिएटर पहुंचाया गया. मुझे कॉरीडोर से ले जाते वक़्त नर्स बदहवाश थीं. मेरी बच्ची की मौत हो गई थी.

48 घंटे तक मैं सो नहीं पाई. मैं दर्द में थी. मैंने दवा भी लेने से मना कर दिया था. मेरी अनमोल बच्ची मेरी कोख में सिमटी हुई थी. वह खामोश हो गई थी.

बच्ची को मुझसे जोड़ने वाली एम्बिलिकल कॉर्ड मेरे शरीर से लटक रही थी. मेरे पैर दर्द से अकड़ने लगे तो मैंने अपने पार्टनर टिम को पकड़ लिया.

मुझे एक मां की कहानी याद आई जिसे बताया गया था कि उसका बच्चा मर गया है, लेकिन वह सेहतमंद पैदा हुआ था.

मेरी बेटी को जब मुझे दिया गया तो मेरे दिल में प्यार भर आया. वो ख़ूबसूरत थी. सिर से पैर तक क़रीब 30 सेंटीमीटर लंबी. उसे सफेद रंग की ड्रेस और हैट पहनाई गई थी और उसे हाथ से बुने हुए कंबल में लपेटा गया था.

उसके हाथ और पैरों की अंगुलियां बेहद साफ थी. सारे अंग लंबे थे, बिल्कुल हम दोनों की तरह. हमने उसका नाम विलो रखा.

मुझे याद है कि टिम ने जब उसका नाम पुकारा तो उसका दिल फटा हुआ था. मैंने बच्ची को हैरत से देखा. मैं समझ नहीं पाई कि वह क्यों मर गई.

मैंने नर्स को बुलाने के लिए घंटी दबाई. मैंने पूछा कि क्या डॉक्टरों से समझने में कुछ गलती हुई है. 20 मिनट बाद टिम ने भी वही घंटी बजाई, फिर वही सवाल पूछा.

सभी नर्स और डॉक्टर आए. उनके पास हमारे सवालों के जवाब नहीं थे. शायद हमारे सवाल ही सही नहीं थे.

अगली सुबह उन्होंने मेरा सिजेरियन ऑपरेशन किया. जब मुझे ऑक्सीजन मास्क पहना दिया गया और मेरी नसों में बेहोशी का इंजेक्शन दिया जा रहा था, तब मैं सोच रही थी कि अपने बच्चे का मुंह देखने के लिए मैंने 30 साल इंतज़ार किया, अब जब मैं उठूंगी तो उसका मुंह देखूंगी. मगर....

हम डिलीवरी विंग के एक छोर पर थे. वहां से महिलाओं के लेबरपेन और नवजात शिशुओं के रोने की आवाज़ मैं सुन रही थी.

मेरी बांहें अकड़ गईं. मुझे लगा कि वहां खून जम गया है, लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि यह सामान्य है. मेरी बच्ची ज़िंदा नहीं है, यह इस झटके का बायलॉजिकल रिस्पांस था.

मैं सुबकने लगी. मेरी छाती से दूध आ रहा था. मेरी टी-शर्ट पर उसका निशान बन रहा था. लेकिन मैं ऐसे सदमे में थी कि इस बात पर शर्मिंदा भी नहीं हो पाई.

अपने बच्चों को खो चुके दर्द से तड़पते मां-बाप के लिए बने कमरे में एक किचेन था, चाय वगैरह बनाने के लिए. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि ऐसे हालात में पैरेंट्स को भूख भी लगती होगी.

मैं उन परिवारों के बारे में सोचने लगी, जो इन जगहों में रहे होंगे. मैं उनको हुए नुकसान के बारे में सोचने लगी. उन्होंने खुद को कैसे संभाला होगा?

मरे हुए बच्चे का जन्म. इस बारे में लोग जितना सोचते हैं, यह उससे कहीं ज्यादा सामान्य बात है. फिर भी लोग इस बारे में बहुत कम बातें करते हैं, क्योंकि प्रेग्नेंसी खुशियों और उम्मीदों का समय होता है.

हम वहां चार दिन और रहे. हमारी बच्ची को एक रेफ्रिजेरेटेड पालने में रखा गया था. किसी ने मुझसे जाने के लिए नहीं कहा, लेकिन मैं जानती थी कि हमें कब चले जाना चाहिए.

मैं मदद करने वाली उन दाइयों को गुडबाय नहीं कह पाई, जो उस रात पूरे वक़्त हमारे साथ बैठी रही थीं और हमें दिलासा देती रहीं. उन्होंने हमारे बच्चे को ड्रेस पहनाई थी. शुक्रिया जैसे शब्द कई बार दिल की बात पूरी तरह बयां नहीं कर सकते.

वो भी रोईं. हम भी रोए और घर चले आए.

अस्पताल में हमारे पास दो प्यारे लैंब थे. एक के साथ मैं सोती थी, दूसरा विलो के पालने में रहता था.

घर के रास्ते में मैंने अपने लैंब को ज़ोर से पकड़ रखा था. वह मेरे आंसुओं से भीग रहा था. मैं धीरे-धीरे उसके कानों में कुछ कह रही थी. सोचा शायद मेरी बेटी ये बातें सुन रही हो.

वक़्त बीता तो शोक कुछ कम हुआ. अस्पताल की दाइयों ने हमें याद दिलाया कि हमें विलो के जन्म का रजिस्ट्रेशन कराना होगा. एक दिन हम रजिस्टर ऑफिस पहुंचे, जहां एक अधिकारी ने कुछ उदास-से सवाल पूछे.

हम विलो के होने का कागज़ाती सबूत लेकर वहां से निकले. जन्म और मृत्यु का सर्टिफिकेट एक ही पेपर में था. विलो कभी थी, उसका यही एक डॉक्यूमेंट था.

घर पर चिट्ठियों का अंबार लग रहा था और मैं उनकी तरफ देख भी नहीं रही थी. परिवार के लोग और दोस्त घर आए. मैंने अपनी मैटर्निटी जींस फिर पहन ली. उनके साथ कुछ बेमतलब बातें हुईं. किसी के पास कुछ ख़ास कहने को नहीं था. मैं सोने चली गई.

नामकरण की बजाय हमें बच्ची की अंत्येष्टि करनी पड़ी. सूखी आंखों से मैंने अंतिम क्रिया में आए लोगों का शुक्रिया अदा किया.

विलो के नन्हें से ताबूत के लिए फूल बहुत बड़े थे. जब मैं वहां से चलने लगी तो मैंने अपनी आत्मा का एक एक हिस्सा वहीं छोड़ दिया, अपनी पहली संतान के पास.

दो हफ्ते बाद टिम काम पर जाने लगे और मैं घर में अकेली रह गई. हमारे शोक ने अलग रास्ता चुना.

मेरा अकेलापन बढ़ गया. मैं बच्चे के निधन के बाद रिश्ते टूटने की कहानियां पढ़कर घबराने लगी. फिर मैंने तय किया कि मैं किसी सलाहकार से मिलूं.

मैंने देखा कि ऐसी मांओँ के लिए कई तरह की मदद उपलब्ध है, पिता के लिए बहुत कम. मैंने एक काउंसलर को खोजा जो हम दोनों की मदद कर सके.

मेरा पीरियड आ गया तो मुझे अपने शरीर के धोखे पर गुस्सा आ गया.

स्टिलबर्थ

मैंने फेसबुक पर अपने उन दोस्तों को अलग कर दिया जिनके बच्चे विलो की उम्र के थे. मैंने उन दोस्तों को भी हटा दिया जो दूसरी या तीसरी बार मां बनने जा रही थीं.

सोशल मीडिया मेरे लिए एक ख़ौफ़नाक जगह बन गई. मेरी वॉल पर बेबी फूड, प्रैम और बच्चों के कपड़े के विज्ञापन दिखने लगे. मेरा गुस्सा बढ़ने लगा. मैं चिड़चिड़ी हो गई और फिर मैं वहां से हट गई.

एक दिन मैं तीन ट्रेन बदलकर इंग्लैंड के उत्तर-पूर्वी हिस्से में रहने वाली अपनी 103 साल की दादी नैंसी के पास गई.

मैं उनके पैरों के पास बैठ गई और उनकी गोद में अपना सिर रख दिया. 60 साल पहले दादी ने भी एक मरे हुए बच्चे को जन्म दिया था. उन्होंने मेरे बाल सहलाए और बच्चे के लिए दुख जताया.

दादी को नहीं पता था कि अपने बच्चे के लिए हमने असल में उनका नाम ही सोचा था.

यह मेरे जीवन की सबसे कठिन यात्रा थी. लेकिन संभवतः यहीं से मेरे ज़ख़्म भरने की शुरुआत हुई.

मैं बहुत खोज-बीन कर रही थी. पिछले 10 साल में जिस भी अस्पताल में मेरा इलाज चला था, वहां से मैंने मेरे बारे में डॉक्टरों के नोट्स मांगे.

इलाज और प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टरों ने क्या किया, मैं यह समझने की कोशिश कर रही थी.

मेरे दिल में कहीं ना कहीं यह बात बैठ गई थी कि बच्ची की मौत के लिए मैं ही दोषी हूं. यह डर सही नहीं था, लेकिन मृत बच्चे को जन्म देने वाले दूसरे मां-बाप भी ऐसा ही महसूस करते थे.

मुझे नौ महीने की एक पपी मिली और उसे मैं अपने घर ले आई. वह दो किलो की थी, एक नवजात शिशु के बराबर. उसकी ज़रूरतों ने मुझे एहसास कराया कि मैं भी किसी काम की हूं.

रात में उसे टॉयलेट कराने के लिए ले जाते वक़्त हम अंधेरे में ठिठुरते रहते. वह बच्चे की तरह मुझ पर कूद जाती. जब मैं पार्क के दूसरे छोर से उसे बुलाती तो कई बार उसे विलो पुकारती.

स्टिलबर्थ

क्रिसमस आने वाला था. मैं उस बारे में सोचना भी नहीं चाहती थी. जैसे-तैसे मैंने भतीजे-भतीजियों के लिए कुछ कार्ड्स खरीदे.

बिटिया के साथ पहले क्रिसमस के लिए हमने सफ़ॉक में एक शेफर्ड हट किराये पर लेने का सपना देखा था. अब हम उससे जी चुरा रहे थे. हम हर रोज मीलों पैदल चलते. पपी को बारी-बारी से गोद में उठाते.

क्रिसमस की शाम मैं गांव के एक छोटे से चर्च में मिडनाइट मास में गई. पूरी सर्विस के दौरान मैं चुपचाप रोती रही. मेरी बगल में बैठी एक बूढ़ी औरत, जिसे मैं नहीं जानती थी, उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.

मरी पैदा हुई बच्ची भी अपनी मां के लिए वही अधिकार दिलाती है, जो नवजात शिशु दिलाते हैं. मैं मैटर्निटी लीव की हकदार थी. मैंने ये छुट्टियां ली और चार महीने बाद काम पर लौटी.

घर की तुलना में ऑफिस में रहना आसान था. मेरे कुछ सहकर्मी मुझसे पूछते- लड़का हुआ या लड़की?

मैं उनको बताती, "मेरी बेटी गर्भ में ही मर गई." फिर मैं ही उनकी बांहों पर थपकी देती और कहती, "ठीक है, दुखी मत हो."

घर पर शाम बिताने के लिए मैंने बहुत रेड वाइन पी. मैंने मॉडर्न फैमिली को कई बार देखा. पूरी सर्दियों में कुछ उम्मीद टिमटिमा रही थी, जैसे ओस की बूंदें अपना सिर ताने टिकी रहती हैं.

कुछ दिनों में मैं फिर से पॉज़िटिव महसूस करने लगी. मैं अपने दोस्तों से मिलती और हँसती. कई बार टिम जब दरवाजा खोलते तो मैं मुस्कुराती हुई मिलती. हम दोनों कोशिश कर रहे थे, अपने लिए नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए.

मैं व्यस्त रहती तो अच्छा महसूस करती. इसलिए मैंने तय किया कि अपने गार्डन का एक हिस्सा विलो को समर्पित कर दूं.

स्टिलबर्थ

मैंने ग्राफ पेपर खरीदे और गार्डन की डिजाइन की किताबें ले आई. फरवरी के ठंडे और भीगे सप्ताह में हमने लैंडस्केपिंग शुरू की.

हमने 1.5 टन की खुदाई मशीन किराए पर ली. दोस्त और परिवार के लोग मदद के लिए आए. बर्फ और बारिश के बीच हमने कीचड़ और पत्थरों के बीच की सारी घास हटाई.

हमारी छोटी पपी पिना कीचड़ में हमारे पैरों के पास खेलती रही और किचेन में आकर उसने अपने पैरों के निशान छोड़ दिए.

मैंने एक कलाकार को खोजा, जो एक मूर्ति बना सके. हम अपने पसंद के समुद्र तटों पर गए ताकि रास्ते में लगाने के लिए पत्थर जमा कर सकें. इस काम में हमने खुद को थका लिया.

मदर्स डे से पहले मैं कुछ बच्चों को गांव के स्थानीय स्कूल से निकलते हुए देख रही थी. उसी दिन पहली बार मैंने नर्सरी का दरवाजा खोला.

मैं बच्ची के कपड़े उलट-पलटकर देखती रही. आखिरी कपड़े को लेकर मैं ज़मीन पर लेट गई. उसे अपने सीने से चिपका लिया.

दोपहर के बाद की धूप के साथ कुछ धूल के कण उड़ रहे थे. मुझे उस ईमेल का ख़याल आया, जिसमें मुझसे कहा गया था कि नर्सरी के पर्दे तैयार हैं. मैंने उनको जवाब दिया था कि मुझे अब वो पर्दे नहीं चाहिए. उन्होंने जवाब दिया था, "हम इसे तब भिजवाएंगे जब आप तैयार होंगी."

मैं सोचने लगी कि क्या उस सेल्स वूमेन ने भी अपने बच्चे को खो दिया है.

मैं रोती रही और रोते-रोते ही मेरी आंख लग गई. जब नींद खुली तो अंधेरा हो रहा था.

मुझे दो मदर्स डे कार्ड मिले. एक मां ने भेजा था और दूसरा टिम ने. टिम ने लिखा था कि मैं विलो की उत्कृष्ट मां हूं और हमेशा रहूंगी.

उस दिन के बाद से मैंने नर्सरी का दरवाज़ा खुला ही रहने दिया. अब हमारे घर में हवा अच्छे से आ-जा रही थी.

हमने विलो के पहले जन्मदिन पर उसके गार्डन में एक पार्टी करने की सोची ताकि कुछ फंड इकट्ठा हो, जिससे स्टिलबॉर्न चैरिटी हो सके.

स्टिलबर्थ

हम जिस एक चैरिटी की सहायता करना चाहते थे, वह शोक से भरे मां-बाप को मेमोरी बॉक्स देती है.

विलो के लिए हमें भी ऐसा एक संदूक मिला था. मैंने हिम्मत करके उस बक्से को दोबारा देखा. उस बॉक्स के अंदर ये सब थे-

एक सफे़द बुना हुआ कंबल

विलो के अस्पताल का ब्रेसलेट

विलो के जन्म के समय की तस्वीर

विलो के पैरों के निशान

और नर्सरी की एक ड्रेस

...जो कभी पहनी नहीं जा सकी.

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