क्या भूटान की नई हुकूमत को अपने पाले में कर लेगा चीन?

  • 26 अक्तूबर 2018
भूटान इमेज कॉपीरइट REUTERS/CATHAL MCNAUGHTON

भारत और चीन जैसे दो बड़े और शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच हिमालय की गोद में बसे छोटे-से देश भूटान में हाल ही में संसदीय चुनाव संपन्न हुए हैं.

आठ लाख की आबादी वाले भूटान में अब तक तीन संसदीय चुनाव हो चुके हैं और तीनों बार अलग-अलग पार्टियां सत्ता में आई हैं.

पिछले दो संसदीय चुनावों की तरह इस बार भी नई पार्टी को सत्ता में आने का मौक़ा मिला है. इसमें नई पार्टी डीएनटी ने 47 में से 30 सीटें जीती हैं.

सेंटर लेफ़्ट पार्टी डीएनटी पिछले चुनावों में पहले दौर में ही बाहर हो गई थी लेकिन इस बार उसने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है.

इस पार्टी की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि सत्ताधारी पीपल्स डेमोक्रैटिक पार्टी पहले चरण में तीसरे नंबर रही और दूसरे दौर में प्रवेश करने से चूक गई.

इस सत्ता परिवर्तन का भूटान की आंतरिक राजनीति और इसके पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है, पेश है इसकी पड़ताल.

इमेज कॉपीरइट ROBERTO SCHMIDT/AFP/GETTY IMAGES

भूटान की चुनाव प्रणाली

स्थानीय भाषा में भूटान का नाम है द्रुक युल यानी उड़ने और आग उगलने वाले ड्रैगन का देश. ख़ास बात ये है कि कई सदियों तक भूटान बाक़ी दुनिया से कटा रहा. ये कभी किसी का उपनिवेश भी नहीं बना. बाहरी दुनिया की बहुत कम चीज़ों और बातों को इसने अपनाया और यह अपनी संस्कृति और परंपराओं की रक्षा करता रहा.

19वीं सदी की शुरुआत में ही गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा होने के बाद साल 1907 में यहां वांगचुक वंश सत्ता में आया था. इसी राजवंश ने भूटान को एकजुट किया और ब्रितानी राज से रिश्ते बनाए.

उसके बाद से लेकर भूटान में लगभग 99 सालों तक पूर्ण राजशाही रही और भारत के साथ भी उसका क़रीबी रिश्ता बना रहा. साल 2006 में जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक ने भूटान की राजगद्दी संभाली और 2008 में अपने यहां दो पार्टियों वाले संसदीय लोकतंत्र की स्थापना की.

इमेज कॉपीरइट AFP

हर बार अलग पार्टी क्यों जीती?

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के भूतपूर्व सदस्य और सिक्किम यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलपति प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा बताते हैं कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणालियों से भूटान में बहुत कुछ मिलता-जुलता है, मगर कुछ बातें हैं जो अलग हैं.

प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा बताते हैं, "2008 में भूटान में पहली बार संविधान बनाया गया और संसद जैसे चुनाव करवाए गए. वहां चुनाव आयोग भी है मगर उन्होंने नियम बनाया कि वहां दो चरणों में चुनाव होंगे. जो भी पार्टियां चुनाव लड़ना चाहती हैं, वे पहले दौर में लड़ेंगी और सबसे ज़्यादा वोट हासिल करने वाली शीर्ष दो पार्टियों को ही उम्मीदवार उतारने की इजाज़त मिलेगी. दूसरे दौर में इन्हीं दो पार्टियों के उम्मीदवारों के बीच मुक़ाबला होगा."

भूटान में पहले संसदीय चुनाव 2008, दूसरे 2013 और तीसरे अभी संपन्न हुए हैं. इसमें डीएनटी पार्टी ने 47 में से 30 सीटें जीती हैं. ये वही पार्टी है जो 2013 में हुए पिछले चुनावों में पहले ही दौर से बाहर हो गई थी.

इमेज कॉपीरइट DIPTENDU DUTTA/AFP/Getty Images
Image caption डीपीटी के नेता लोते त्शेरिंग जो भूटान के नए प्रधानमंत्री होंगे

रोचक बात ये है कि पिछली बार सत्ता में आई पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी यानी पीडीपी इस बार पहले दौर में बाहर हो गई थी. इसी तरह से पहले चुनावों (2008) में पीडीटी सत्ता में आई थी मगर अगले ही चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ा था.

आख़िर क्या वजह है जो अलग-अलग चुनावों में जनता ने नई पार्टियों को मौक़ा दिया है? साथ ही सत्ता में रहने वाली पार्टियों को बुरी तरह हार का सामना क्यों करना पड़ता है? दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर एसडी मुनि बताते हैं कि इसमें जनता का असंतोष भी रहता है और कहीं न कहीं राजा की भूमिका भी होती है.

प्रोफ़ेसर एसडी मुनि बताते हैं, "पहली बात तो ये है कि वहां का जनतंत्र राजा ने दिया है, लोगों ने मांगा नहीं था. लोग इससे पूरी तरह ख़ुश भी नहीं हैं. इसलिए वे बदल-बदलकर देखते हैं कि कौन सी सरकार ठीक रहेगी, कौन सी नहीं. मेरे विचार से राजतंत्र भी देखना चाहता है कि कौन से लोग भूटान को स्थायित्व दे सकेंगे और प्रगति कर सकेंगे. इसलिए दोनों बातें मिलकर इस तरह के नतीजे दे रही हैं. लोगों को एक तो पूरा संतोष नहीं मिलता जिस कारण वे हर बार सरकार बदल देते हैं और उसमें कहीं न कहीं राजा की सहमति भी रहती है."

इमेज कॉपीरइट PRAKASH SINGH/AFP/Getty Images

इंटरनेट ने लाया बदलाव

भूटान में 1999 तक टीवी नहीं आया था. कई सालों तक देश ने खुद को इससे अलग रखा. इसे लगता था कि बाहरी दुनिया यहां की राजशाही और संस्कृति को कहीं तबाह न कर दे.

टीवी के साथ ही इंटरनेट भी 1999 में ही आया था. प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा बताते हैं कि इसके बाद लोगों को समझ आया कि विकास होता क्या है और इससे लोगों की अपेक्षाएं भी राजनीतिक दलों से बढ़ रही हैं.

वह बताते हैं, "यहां विकास ज़्यादा नहीं हुआ है. रास्ते नहीं थे, पीने का पानी नहीं था, अस्पताल नहीं थे, स्कूल नहीं थे. लोग इसी में संतुष्ट रहते थे. वे अपने समुदाय के साथ मिल बांटकर खुश रहते थे. इच्छाएं नहीं थी उनकी. देश की पूरी राजनीति और अर्थव्यवस्था राजा की संभालते थे. मंत्री परिषद भी नाम की थी. लेकिन जब पहली बार चुनाव हुए तो लोगों को लगा कि अच्छी पार्टी को वोट दिया तो तरक्की हो सकती है."

इमेज कॉपीरइट REUTERS/CATHAL MCNAUGHTON

डीएनटी की जीत के कारण

2013 में बनाई गई डीएनटी के नेता लोते त्शेरिंग सर्जन रहे हैं. पिछले चुनावों में ख़राब प्रदर्शन के बाद इस बात जीत का श्रेय उनके चुनाव अभियान को दिया जा रहा है, जिसका नामा था- 'नैरोइँग द गैप' यानी वे समाज के विभिन्न वर्गों के बीच की दूरी को पाटने की कोशिश करेंगे.

प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा के मुताबिक, इंटरनेट आने के बाद जब लोगों ने देखा कि विकास क्या है, स्कूल-कॉलेज और अस्पताल कैसे होने चाहिए तो उनकी चाहतें प्रभावित हुईं. उनके मुताबिक़ राजनीतिक दलों, ख़ासकर जीतने वाली पार्टी डीएनटी का प्रचार इसी बात पर आधारित था.

वह बताते हैं, "डीएनटी के घोषणापत्र में न्यूनतम समर्थन मूल्य, 10वीं में फ़ेल होने वाले ग़रीब बच्चों को 12वीं तक पढ़ने देने, छात्राओं को सैनिटरी पैड देने जैसी बातें थी. ऐसा लग रहा था कि दिल्ली या राजस्थान में निकाय चुनाव हो रहे हों. इसका मतलब है कि सुदूर इलाक़ों में संसाधनों और आधारभूत ढांचे की बहुत कमी है."

इमेज कॉपीरइट ROBERTO SCHMIDT/AFP/GETTY IMAGES

सत्ता में आने वाली डीएनटी का रुख़ क्या होगा?

डीएनटी ने चुनाव प्रचार के दौरान यह भी कहा था कि वह भूटान को विदेशी कर्ज़ से मुक्त कराने की दिशा में काम करेगी.

भूटान के विदेशी कर्ज़ का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हाइड्रोपावर प्रॉजेक्ट्स में हुए निवेश से है और इसमें भी ज़्यादातर भारत का कर्ज़ है. हाल ही में भारत ने यहां के पांच नए पावर प्रॉजेक्ट्स में चार की फाइनैंसिंग की है. तो क्या डीएनटी के सत्ता में आने के बाद भारत के साथ संबंधों में प्रभाव पड़ सकता है?

प्रोफ़ेसर एसडी मुनि मानते हैं कि अगर वह अपने इकोनॉमिक एजेंडे को आगे बढ़ाता है तो असर देखने को मिल सकता है. वह कहते हैं, "अगर वे हाइड्रो प्रॉजेक्ट्स में निवेश कम करके दूसरे उद्योग खोलना चाहेंगे तो थोड़ा बहुत असर पड़ेगा. लेकिन हाइड्रो पावर महंगी हो रही है. भारत ख़ुद इस मामले में आत्मनिर्भर हो रहा है. वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत भी आ रहे हैं. तो भारत की हाइड्रो पावर के लिए रुचि कम हो रही है. इससे भूटान भी चिंतित है कि अगर ऐसा हुआ तो उसकी इकोनॉमी का आधार क्या होगा. इसीलिए वो अपनी इकोनॉमी में विविधता लाना चाहता है. अगर वो इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तो ऐसा नहीं है कि अन्य उद्योगों में भारत शामिल नहीं हो पाएगा. लेकिन आज दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों का जो ढांचा है, उसपर असर ज़रूर पड़ेगा."

भारत से भूटान को शिकायत क्या है?

भारत पहले ग्रांट के तौर पर भूटान में प्रॉजेक्ट्स लगाता था और पंचवर्षीय योजनाएं तक भारत में बना करती थीं. मगर अब वह निवेश करता है तो वह एक तरह कर्ज़ होता है, जिसे भूटान पावर प्रॉजेक्ट्स से पैदा होने वाली बिजली को निर्यात करके चुकाता है. लेकिन इसकी दरें कम होने के कारण भूटान में असंतोष है.

प्रोफ़ेसर महेंद्र पी. लामा बताते हैं, "भूटान का कहना है कि हम जो भारत को जो बिजली देते हैं, अभी वह गुडविल प्राइस पर दे रहे हैं. भारत उसे दो रुपये में ले रहा है और दिल्ली में वही बिजली सात रुपये प्रति यूनिट बिकती है. उनका कहना है कि साढ़े तीन या चार रुपये कर दीजिए ताकि हम आपका लोन चुका सकें. लेकिन भारत सहमत नहीं है. इससे भूटान में डर हैं कि कहीं वो कर्ज़ में डूबा देश तो नहीं बन जाएंगे. वैसे भारत को सोचना चाहिए, क्योंकि यह मांग जायज़ है."

Image caption भूटान में जल विद्युत की बहुत संभावनाए हैं और भारत ने कई प्रॉजेक्ट्स भी लगाए हैं

भूटान की दूसरी मांग यह है कि आप हमें इस बिजली को किसी अन्य देश, जैसे कि बांग्लादेश आदि को बेचने की इजाज़त दीजिए ताकि इसकी ज़्यादा कीमत मिल सके. प्रोफ़ेसर लामा बताते हैं कि भूटान की ये दोनों मांगें जायज़ प्रतीत होती हैं.

क्या नई सरकार को प्रभावित कर सकता है चीन?

मान लिया जाए कि सत्ताधारी डीएनटी की सरकार अगर इस मुद्दे पर कुछ क़दम उठाना चाहती है तो क्या उसके पास अधिकार होंगे? क्या भूटान की संसद को अर्थव्यवस्था और विदेश नीति से जुड़े अहम फ़ैसले करने का अधिकार है?

इस संबंध में प्रोफ़ेसर एसडी मुनि बताते हैं, "संवैधानिक दृष्टि से संसद ताक़तवर है मगर वास्तविक शक्ति राजा के पास है. विदेश नीति में संसद का दख़ल होता है मगर इस बार चुनाव आयोग ने कह दिया था कि भारत-चीन और अन्य संवेदनशील मसलों पर पार्टियां बात नहीं करेंगी."

वह बताते हैं, "भूटान के लोग बहुत अधिक भारत पर निर्भर महसूस करते हैं और वे इसे कम करना चाहते हैं. बिल्कुल हटाना नहीं चाहते क्योंकि वे जानते हैं कि ऐसा संभव नहीं है. भारत के साथ तीन तरफ़ से उनकी सीमाएं लगती हैं. दूसरी बात ये है कि भूटान चाहे न चाहे, चीन दक्षिण एशिया में और भूटान में भी ख़ुद को लाना चाहता है. वह चाहेगा कि भूटान उसे डोकलाम दे दे लेकिन भूटान ऐसा नहीं चाहेगा. तो भारत की इसमें भूमिका रहेगी, जैसा कि देखने को भी मिला. तो भूटान भारत से पूरी तरह से दूर नहीं होना चाहता."

'भारत पर है भूटान को समझने की ज़िम्मेदारी'

प्रोफ़ेसर मुनि यह बताते हैं कि डीएनटी की सरकार भारत के विरोध में कुछ कर नहीं कर पाएगी क्योंकि उसे पहले दौर में बाहर हो चुकी पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के भी वोट मिले हैं, जिसे भारतमुखी समझा जाता है. यानी उन्हें जो नया वोट बैंक मिला है, उनमें भारतमुखी लोगों का समर्थन ज़्यादा है."

रणनीतिक रूप से बेहद अहमियत रखने वाले भौगोलिक क्षेत्र में होने के कारण भूटान कई बार भारत और चीन की रस्साकशी के बीच फंसता रहा है. दक्षिण एशिया में भारत और चीन की आपसी होड़ किसी से छिपी नहीं है. यहां जो भारत के करीबी समझे जाते थे, उनपर चीन का प्रभाव बढ़ता नजर आ रहा है. नेपाल से लेकर मालदीव तक यह साफ़ देखा जा रहा है.

पिछले साल डोकलाम में भारत-चीन के बीच विवाद हुआ था. ऐसे में नई सरकार का रुख़ भारत और चीन को लेकर क्या रहेगा. इस बारे में प्रोफ़ेसर महेंद्र पी लामा बताते हैं कि भूटान में अब काफ़ी बदलाव आ चुका है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

"भारत के अब भूटान से संबंध परंपरागत ढंग से नहीं चलेंगे. युवाओं, नए ब्यूरोक्रैट्स और राजनेताओं के विचार 80 के दशक से बहुत अलग हैं. अगर भारत ने इन भावनाओं को ठीक से नहीं संभाला तो रिश्तों में तनाव भी आ सकता है. चीन भूटान में आने की बहुत कोशिश कर रहा है. देखने को मिला है कि मालदीव में चीन गया तो कितना तनाव आ गया वहां. इसिलए भूटान में अगर चीन का दूतावास बन गया तो बहुत परिवर्तन हो जाएगा. इसलिए कूटनीतिक हिसाब से भारत सरकार को वहां के लोगों से संबंध बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और उदार होकर नई दिशा अपनानी चाहिए. भारत भूटान के लोगों की अपेक्षाओं को समझना चाहिए."

Image caption भूटान खूबसूरत पहाड़ियों और बौद्ध विहारों का देश है

जानकारों का कहना है कि भूटान की नई सरकार की प्राथमिकता अपनी अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास को बढ़ाने के साथ-साथ सुरक्षा और संप्रभुता और मज़बूत करने पर रहेगी.

उनका ये भी कहना है कि लोकतंत्र आने के बाद आज के भूटान में 90 के दशक के मुकाबले बहुत फर्क आ गया है.

लोग विकास को प्राथमिकता देने लगे हैं और विकास होता नज़र भी आ रहा है. लेकिन अभी यहां लोकतंत्र शुरुआती दौर में है और इसे जड़ें गहरी करने और परिपक्व होने में थोड़ा वक्त लगेगा.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे