क़ुरान की क़सम खा भुट्टो को छलने वाले जनरल ज़िया

  • रेहान फ़ज़ल
  • बीबीसी संवाददाता
बीबीसी
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ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो (बाएं) और मोहम्मद ज़िया उल-हक़

बात साल 1976 की है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो मुल्तान की यात्रा पर थे.

जनरल ज़िया ने अपने मातहत पूरे डिविजन को भुट्टो का स्वागत करने और उनकी कार पर फूल फेंकने के लिए सड़कों पर उतार दिया था.

मुल्तान में देर रात भुट्टो अपने कमरे में कुछ काम कर रहे थे. उन्होंने देखा कि शीशे के बाहर एक परछाई सी दिखाई दे रही है. भुट्टो ने अपने एडीसी को ये देखने के लिए बाहर भेजा कि वहाँ देखो कौन खड़ा हुआ है?

एडीसी ने उन्हें बताया कि बाहर डिवीज़नल कमांडर मोहम्मद ज़िया उल-हक़ खड़े हुए हैं.

भुट्टो नें उन्हें अंदर बुला कर उनके आने का कारण पूछा. ज़िया का जवाब था, "मैंने सुन रखा है कि किस तरह हमारे राष्ट्रपति देश सेवा में लगे हुए हैं. मैं इस भवन के सामने से गुज़र रहा था कि मैंने इस कमरे में इतनी रात रोशनी जली देखी. मैं ये देखकर दंग रह गया कि हमारा राष्ट्रपति इतनी देर रात तक काम कर रहा है."

ज़िया का तीर निशाने पर लगा. उनकी चापलूसी ने भुट्टो जैसे चतुर व्यक्ति को भी धराशायी कर दिया. उस रात ही ज़िया उल-हक़ भावी सेना प्रमुख के रूप में भुट्टो की याददाश्त में क़ैद हो गए.

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शरीफ़ और चालाक

पाकिस्तान के पहले तानाशाह अयूब ख़ाँ की तरह जनरल ज़िया के पास सत्ता पर काबिज़ होने का कोई 'ब्लू प्रिंट' नहीं था.

दरअसल, ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो के कुछ ग़लत फ़ैसलों और पाकिस्तान नेशनल अलायंस के नेताओं के बढ़ावा देने की वजह से सत्ता उन्हें एक तरह से तश्तरी पर रख कर दे दी गई थी.

लेकिन एक बार सत्ता का स्वाद चख लेने के बाद जनरल ज़िया ने अपने प्रतिद्वंदियों को मात देने की जो क्षमता दिखाई, उसके उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.

शायद यही वजह है कि उन्होंने पाकिस्तान पर सबसे लंबे समय तक राज किया. पाकिस्तान के शासकों पर बहुचर्चित किताब 'पाकिस्तान एट द हेल्म' लिखने वाले तिलक देवेशर बताते हैं, "वो बहुत ही चालाक किस्म के आदमी थे और सबसे इस तरह पेश आते थे जैसे उनसे शरीफ़ कोई शख़्स ही न हो. वो ना किसी को नहीं कहते थे. जो कोई भी उनके सामने सुझाव ले कर आता था, उससे वो यही कहते थे कि ये बहुत अच्छा 'आइडिया' है. लेकिन वो करते वही थे जो वो करना चाहते थे."

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"उनके घर अगर कोई मेहमान आता था तो वो बाहर तक उन्हें छोड़ने जाते थे और उनकी कार का दरवाज़ा खोलते थे. वो नीचे झुक कर उन्हें बाय-बाय कहते थे. लोग इसी से मुत्तासिर हो जाते थे, लेकिन उनके दिमाग़ में क्या चल रहा है, किसी को पता नहीं चल पाता था. बहुत ही चालाकी से वो अपनी भावनाओं को लोगों से छिपाते थे. भुट्टो तक उनको पहचान नहीं पाए."

"भुट्टो कई बार उन्हें सबके सामने 'बंदर जनरल' कह कर पुकारते थे. ज़िया कुछ भी नहीं कहते थे, हांलाकि वो उस समय पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष थे. भुट्टो ने उनकी जो तौहीन की, उसे उन्होंने अपने दिल में रखा और बाद में जब मौक़ा आया तो उन्होंने उसका बदला ले लिया."

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आगाह करने के बावजूद भुट्टो ने ज़िया को ही चुना

भुट्टो ने कई जनरलों को 'सुपरसीड' करते हुए जनरल ज़िया उल-हक़ को इस उम्मीद से सेना अध्यक्ष बनाया था कि वो उनकी हर बात मानेंगे. लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा ही.

जैसे ही मौक़ा आया, उन्होंने भुट्टो के पैरों के नीचे से क़ालीन खींच ली.

एक ज़माने में भुट्टो के बहुत नज़दीकी रहे ग़ुलाम मुस्तफ़ा खार ने मुझे बताया था, "मैंने भुट्टो का आगाह किया था कि वो ज़िया को सेनाध्यक्ष बना कर अपनी ज़िदगी की सबसे बड़ी ग़लती कर रहे हैं. भुट्टो ने मुझसे कहा, मैं तुमसे तीन सवाल पूछता हूँ. उनका जवाब दो. क्या ज़िया बहुत प्रभावशाली शख़्स है? मैंने कहा नहीं. फिर उन्होंने पूछा, क्या वो ज़मीन से जुड़ा शख़्स है? मैंने कहा बिल्कुल नहीं. फिर वो बोले, क्या वो अच्छी अंग्रेज़ी बोलता है? मैंने कहा वो भी नहीं."

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ग़ुलाम मुस्तफ़ा खार

"तब भुट्टो ने मुझसे कहा, ''मुस्तफ़ा एक बात याद रखना. पाकिस्तानी सेना उसी को स्वीकार करती है जो अच्छी अंग्रेज़ी बोलने वाला हो या जो सैंडहर्स्ट में पढ़ा हो या उसकी अच्छी शख़्सियत हो या वो ज़मीन से जुड़ा हो. ज़िया तो बाहर से आया हुआ शख़्स है और बहुत ही बदरोब है. इससे ज़्यादा मुझे और कौन सूट करेगा? मैंने उनसे कहा कि अगर आपकी यही सोच है तो ख़ुदा आपको सही साबित करे और मुझे ग़लत ठहराए. लेकिन मैं समझता हूँ कि आप अपनी ज़िंदगी का सबसे ग़लत फ़ैसला ले रहे हैं."

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ज़िया की चापलूसी

आख़िर क्या वजह थी कि राजनीतिक रूप से काफ़ी चतुर कहे जाने वाले भुट्टो ने ज़िया को ही सेनाध्यक्ष के महत्वपूर्ण पद के लिए चुना.

तिलक देवेशर बताते हैं, "उन्होंने भुट्टो को आर्म्ड कोर का कर्नल इन चीफ़ घोषित कर दिया. वो ये भी चाहते थे कि भुट्टो आर्म्ड कोर की वर्दी पहनें. भुट्टो ने वर्दी तो नहीं पहनी लेकिन, उनको ये ओहदा देने के लिए ज़िया ने एक बहुत बड़ा समारोह आयोजित किया. भुट्टो को अच्छा महसूस कराने के लिए उन्होंने लक्ष्य पर टैंक की एक गन पहले से ही निशाना लगा कर रख दी थी. भुट्टो को सिर्फ़ ट्रिगर दबाना था. लेकिन इस संभावना को नकारने के लिए कि भुट्टो का निशाना अगर चूक भी जाए, उन्होंने चारों तरफ़ चार्ज दबाने के लिए सैनिक बैठाए हुए थे. ताकि एक धमाका हो और भुट्टो को लगे कि उन्होंने ही सही निशाना लगाया है."

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बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ तिलक देवेशर

"एक बार ज़िया भुट्टो से मिलने गए. उनके पास ज़िया से मिलने के लिए वक़्त नहीं था. लेकिन ज़िया वहीं बैठे रहे. क़रीब चार घंटे के बाद भुट्टो ने उन्हें बुला कर पूछा कि क्या बात है? उन्होंने कहा कि मैं आपको एक क़ुरान शरीफ़ भेंट करने आया हूँ और इस क़ुरान पर हाथ रख कर मैं कहना चाहता हूँ कि मैं आपके लिए हमेशा वफ़ादार रहूँगा. भुट्टो को लगा कि ये अगर मेरे सामने इस तरह अपनी नाक रगड़ रहा है, मुझे इससे कोई ख़तरा नहीं हो सकता."

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भुट्टो की गिरफ़्तारी

चार जुलाई, 1977 की रात को जनरल ज़िया ने 'ऑपरेशन फ़ेयरप्ले' की शुरुआत करते हुए भुट्टो समेत पाकिस्तान पीपल्स पार्टी के सभी चोटी के नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया.

जनरल ज़िया के निकट सहयोगी रहे के एम आरिफ़ अपनी किताब 'वर्किंग विद ज़िया' में लिखते हैं, "जनरल ज़िया ने भुट्टो से टेलिफ़ोन पर ख़ुद बात की. उन्होंने उन्हें 'सर' संबोधित करते हुए कहा कि सरकार और पीएनए के बीच राजनीतिक गतिरोध के कारण देश की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा ख़तरा पैदा हो गया है."

"इसलिए मैंने बहुत झिझकते हुए सैनिक विकल्प इस्तेमाल करते हुए देश के प्रशासन पर नियंत्रण करने का फ़ैसला लिया है. मौजूदा तनाव को कम करने के लिए मैं आप और पीपीपी के कुछ नेताओं को कुछ समय के लिए हिरासत में ले रहा हूँ. आप को शायद इतना आराम नहीं मिले, जो आपको अपने घर में मिल रहा है. आज रात ही आपको मरी के गवर्नमेंट हाउज़ में 'शिफ़्ट' कर दिया जाएगा, जहाँ आपको वो सभी प्रशासनिक सुविधाएं मिलेंगी, जो आपको अपने निवास पर मिल रही हैं."

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फ़ाइल वर्क में कमज़ोर

एक सैनिक अधिकारी के तौर पर ज़िया में कई ऐब थे.

समय की पाबंदी न कर पाना उनमें से एक था. वो लोगों को कई दिन पहले दिए गए 'अपॉइंटमेंट' भूल जाते थे.

उनको अपने मातहतों की 'वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट' लिखने से भी बहुत नफ़रत थी.

तिलक देवेशर बताते हैं, "ज़िया को सामान्य फ़ाइल का काम करना भी नहीं पसंद था. उनके कमरे में फ़ाइलों का अंबार लगा रहता था. दो बार उन्होंने अपने कार्यालय का विस्तार कराया ताकि उन्हें फ़ाइलें रखने के लिए और जगह मिल जाए. उनका दफ़्तर एक तरह का कबाड़ ख़ाना था जहाँ ज़मीन से लेकर छत तक फ़ाइलें ही फ़ाइलें रखी रहती थीं."

"एसीआर लिखने का कायदा होता है कि आप मार्च के बाद दो महीनों के अंदर सारी प्रविष्टियाँ कर दें ताकि अधिकारियों की पदोन्नति न रुके. ज़िया कहा करते थे कि मैं ख़ुद बोर्ड का सदस्य होऊंगा, इसलिए मैं उनके हितों को नुक़सान नहीं होने दूंगा. नतीजा ये हुआ कि जब अचानक ज़िया का देहांत हो गया तो बहुत से सैनिक अधिकारियों का करियर बर्बाद हो गया, क्योंकि ज़िया ने उनकी सीआर ही नहीं लिखी थी."

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के एम आरिफ़

'किंग ऑफ़ ट्रिविया'

ज़िया में ग़ज़ब का 'स्टेमिना' था. वो पूरी रात काम करते हुए भी थकते नहीं थे.

के एम आरिफ़ अपनी क़िताब 'वर्किंग विद ज़िया' में लिखते है, "वो अक्सर आधी रात के बाद सोया करते थे. सुबह नमाज़ पढ़ने के बाद वो दोबारा सो जाते थे. उनका दिन सुबह साढ़े दस बजे शुरू होता था. बड़े-बड़े नीतिगत फ़ैसले लेने के दौरान उन्हें अक्सर कोई बहुत मामूली सी बात याद आ जाती थी. मसलन आज रात के खाने में क्या बनने वाला है? मेहमान को तोहफ़े में क्या दिया जाना है? या सड़क पर खड़े पुलिस जवान की वर्दी इतनी गंदी क्यों है? उन्हें ट्रिविया या नगण्य चीज़ों का बादशाह कहा जाता था."

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बेनज़ीर से खाई मात

कई सालों के बाद ज़िया पाकिस्तान में चुनाव करवाने के लिए तैयार हुए.

उन्होंने नवंबर, 1988 की तारीख़ इसलिए चुनी क्योंकि उनके ख़ुफ़िया सूत्रों ने उन्हें ख़बर दी थी कि बेनज़ीर भुट्टो गर्भवती हैं, इसलिए चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं ले पाएंगी.

तिलक देवेशर बताते हैं, "बेनज़ीर को इस बात का पता चल गया था कि ज़िया इस बात की जानकारी लेने के फ़िराक में हैं कि उनके बच्चा कब होने वाला है तभी वो चुनाव की तारीख़ की घोषणा करेंगे. बेनज़ीर ने अपने मेडिकल रिकॉर्ड बदलवा दिए. उनका बच्चा सितंबर में ही पैदा हो गया जिसकी वजह से बेनज़ीर ने बाकायदा चुनाव प्रचार में भाग लिया."

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दिल्ली का सेंट स्टीफ़ेंस कालेज

सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज के छात्रों की मेहमाननवाज़ी

ज़िया ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के मशहूर सेंट स्टीफ़ेंस कालेज में की थी.

इसलिए 1981 में जब सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों का प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान गया तो ज़िया ने उन्हें न सिर्फ़ अपने यहाँ भोज पर बुलाया, बल्कि उन्हें अपने निजी विमान से पाकिस्तान की सैर भी करवाई.

उस समय पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त नटवर सिंह थे. बाद में नटवर सिंह भारत के विदेश मंत्री भी बने.

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ज़िया उल-हक़ के साथ नटवर सिंह (सफ़ेद जोधपुरी में)

वो बताते हैं, "जब स्टीफ़ेंस की टीम पाकिस्तान पहुंची तो मैंने जनरल ज़िया से अनुरोध किया कि वो उनसे मिलने के लिए कुछ मिनटों का समय दे दें. उन्होंने पूरे दल को भोज पर न्योता दिया. जब मैं उन सबके साथ जनरल ज़िया के निवास पर पहुंचा तो वहाँ जनरल ज़िया के अलावा उनके तीन कैबिनेट मंत्री और चार विश्वविद्यालयों के कुलपति मौजूद थे."

"प्रधानाचार्य राजपाल अपने साथ 1944 में ज़िया का खींचा गया एक फ़ोटो ले गए थे, जिसमें ज़िया सबसे पीछे वाली पंक्ति में खड़े थे. ज़िया ने उस तस्वीर को अपने माथे से लगाते हुए कहा कि ये तस्वीर मेरे पास इसलिए नहीं है क्योंकि उन दिनों इसे ख़रीदने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे."

"भोज के दौरान उन्होंने छात्रों से पूछा कि आपका कहाँ-कहाँ जाने का इरादा है? उन्होंने कहा कि हम मोहनजोदड़ो और कराची जाना चाहते हैं. ज़िया ने फिर पूछा आप कैसे जाएंगे? छात्रों ने जवाब दिया रेलगाड़ी से. ज़िया ने तुरंत अपने एडीसी को बुलाया और कहा इन सबको मेरे निजी विमान से इन जगहों पर ले जाया जाए और वहाँ निर्देश भेज दिए जाएं कि इनका पूरा ध्यान रखा जाए."

"18-19 साल के लड़कों के लिए ये बहुत बड़ी बात थी. उस दिन जब वो अपने होटल में लौटे तो हर एक के कमरे में कुछ उपहार रखे हुए थे. उनके साथ गए अध्यापकों को ज़िया की तरफ़ से एक एक कार्पेट दी गई थी."

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नटवर सिंह, रेहान फ़ज़ल के साथ

सुखिया का उधार

साल 1983 में जब ज़िया गुट-निरपेक्ष सम्मेलन में भाग लेने भारत आए तो सेंट स्टीफ़ेंस कॉलेज भी गए जहाँ उन्होंने 1944 में पढ़ाई की थी.

मलय नीरव उन दिनों कालेज में इतिहास की पढ़ाई कर रहे थे. उनको वो दिन अभी तक याद है. वो कहते हैं, "उस दिन उन्होंने सिलेटी रंग की शेरवानी और पायजामा पहन रखा था. वो धीरे-धीरे क़दम बढ़ाते हुए प्रिंसिपल के कमरे में आए जहाँ 'विज़ीटर बुक' रखी हुई थी. घुसते ही उन्होंने कहा कि ये वो कमरा है, जहाँ मैं अपने जीवन में सिर्फ़ एक बार आया था. मैं क्यों आया ये मैं आपको बताना नहीं चाहता. शायद उस समय उन्होंने कोई ग़लती की थी."

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"फिर उन्होंने इच्छा प्रकट की कि वो ऑलनट कोर्ट के उस कमरे में जाना चाहेंगे जहाँ वो रहा करते थे. उनके कमरे में उस वक्त जो लड़का रहता था, वो उस समय सो रहा था. उन्होंने दरवाज़े पर 'नॉक' किया. अंदर से बहुत ही ख़राब स्वर में आवाज़ आई हू इज़ देयर. ज़िया ने मुस्करा कर कहा कुछ भी नहीं बदला. ये कमरा वैसा ही है जैसा 1944 में हुआ करता था."

"फिर वो पुलिस कॉर्डन को तोड़ते हुए छात्रों के बीच पहुंच गए. फिर उन्होंने याद किया उस व्यक्ति को जो सेंट स्टीफेंस कॉलेज का अभिन्न अंग था. उसका नाम था सुखिया. उसका एक छोटा सा ढ़ाबा था जहाँ वो बर्फ़ी, समोसे, गुलाब जामुन और नीबू पानी बेचा करते थे. ज़िया ने सुखिया को पहचाना. वो उनके लिए अपने साथ एक उपहार लाए थे. सुखिया ने अपना बहीखाता खोला और उनके सामने रखकर बोले तुमने मुझसे जो उधार लिया था उसे तुमने अभी तक वापस नहीं किया है. ज़िया ने खाता देखा और कहा कि आज मैं तुम्हारा उधार सूद समेत चुकाऊंगा."

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ज्ञानी ज़ैल सिंह की उलाहना

उसी यात्रा के दौरान ज़िया ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह से मुलाकात की थी.

तिलक देवेशर बताते हैं, "उस बैठक में ज़िया ने ज़ैल सिंह से कहा कि पाकिस्तान भारत के साथ शांति चाहता है, हांलाकि उस समय वो ख़ालिस्तान आंदोलन का समर्थन कर रहे थे. पाँच-सात मिनट तक उन्हें सुनने के बाद ज्ञानी जी ने उनसे ठेठ पंजाबी में कहा 'ए नहीं हो सगदा कि जनानी अख वी मारे, ते घंड वी कड्डे' यानी एक महिला आँख मारने के साथ-साथ घूंघट नहीं काढ़ सकती."

"ये सुन कर सब लोग हंसने लगे. लेकिन ज्ञानी जी ने अपने अंदाज़ में ज़िया को संदेश दे दिया था कि ये नहीं हो सकता कि आप ख़ालिस्तान का समर्थन भी करें और हमसे आ कर कहें कि हम शांति चाहते हैं."

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भुट्टो को माफ़ी नहीं दी ज़िया ने

कहा जाता है कि ज़िया ने भुट्टो की दया याचिका को बिना पढ़े ही ख़ारिज कर दिया था.

लेकिन के एम आसिफ़ का कहना है कि उन्होंने उसे बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा था और फ़ाइल पर लाल स्याही से लिखा था, 'द पिटीशन इज़ रिजेक्टेड'.

तिलक देवेशर कहते हैं, "जब भुट्टो को हत्या के केस में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी पाया तो ख़ान अब्दल वली ख़ाँ ने ज़िया से कहा था कि एक क़ब्र है और दो आदमी हैं. अगर भुट्टो उसमें पहले नहीं जाएगा तो तुम उसमें जाओगे. ज़िया सोच रहे थे कि अगर मैंने इन्हें छोड़ दिया तो ये मुझे नहीं छोड़ेगा. जब भुट्टो की दया याचिका उनके पास आई तो उन्होंने उसे एक मिनट में 'रिजेक्ट' कर दिया."

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पूरी दुनिया ने भुट्टो की जान बख़्शने की अपील की लेकिन ज़िया ने उनकी बात नहीं मानी, क्योंकि उन्हें भुट्टो से ख़ुद अपनी जान का ख़तरा था.

उन्हें मालूम था कि अगर भुट्टो सत्ता में आते हैं तो वो उन्हें छोड़ेंगे नहीं. पाकिस्तान के संविधान में धारा-6 भुट्टो ने ही डलवाई थी जिसके अनुसार जो भी सत्ता को ग़ैरकानूनी ढ़ंग से बदलेगा उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाएगा और सज़ा मौत होगी.

तिलक देवेशर कहते हैं, "ज़िया इस बारे में निश्चित थे कि भुट्टो इसका इस्तेमाल उनके ख़िलाफ़ करेंगे."

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रहस्यमय परिस्थितियों में मौत

ज़िया उल-हक़ कई सालों तक पाकिस्तान पर राज करते, लेकिन 17 अगस्त, 1988 को बहावलपुर के पास एक हवाई दुर्घटना में उनका रहस्यमय परिस्थितियों में निधन हो गया.

इस विमान दुर्घटना में ज़िया के साथ पाकिस्तान में अमरीका के राजदूत आर्नल्ड राफ़ेल, दो जनरल, एक लेफ़्टिनेंट जनरल, तीन मेजर जनरल और पाँच ब्रिगेडियर मारे गए थे.

तीन दिन बाद ज़िया के नमाज़-ए-जनाज़ा में भारत के राष्ट्रपति आर वैंकटरमन, पी वी नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी और नटवर सिंह इस्लामाबाद पहुँचे.

हजारों लोगों ने उनकी अंतिम यात्रा में शिरकत की. लेकिन उनका ताबूत लगभग खाली था. जनरल ज़िया के शरीर का बहुत कम हिस्सा उस विमान दुर्घटना में बच पाया था.

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