वुसत का ब्लॉग: ट्रंप ने मोदी को दी लाल झंडी!

  • 29 अक्तूबर 2018
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अगर दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र का राष्ट्रपति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रिपब्लिक डे का मुख्य अतिथि बनने को तैयार नहीं, तो शर्मिंदा होना मेहमान का बनता है या मेज़बान का?

क्योंकि बात ये है कि हमारी तहज़ीब में मेहमान अवतार के समान है. आता है तो हमारा सौभाग्य और न आये तो उसका दुर्भाग्य. इसमें दिल छोटा करने की क्या बात है.

परेशान तो वो हों जिन्होंने अमरीकी चुनाव से पहले ही भगवान ट्रंप की मूर्ति मंदिर में रख ली थी. अब इस मूर्ति का क्या करें! दूध पिलाए कि कुछ और? ऐसों के साथ रहोगे तो फिर ऐसा ही होगा.

मैं रिपब्लिक डे की परेड पर पिछले 68 वर्ष में बुलाए जाने वाले मेहमानों की सूची देख रहा था. इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्णो पहले रिपब्लिक डे के मेहमान थे. तब से अब तक इंडोनेशिया के तीन राष्ट्रपति मेहमान बन चुके हैं.

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कैसे-कैसे लोग 26 जनवरी को सलामी लेने राजपथ आये. 1959 एडिनबरा के ड्यूक, 1961 में ब्रिटेन की महारानी, 1964 में लॉर्ड माउंटबेटन, फिर मार्शेल टिटो, अफ़गान बादशाह ज़हीर शाह, नेल्सन मंडेला, सऊदी किंग अब्दुल्लाह, व्लादिमीर पुतिन, जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे, बराक ओबामा, भूटान के दो राजा चार बार, नेपाल के दो राजा, श्रीलंका के दो प्रधानमंत्री और मालद्वीप के एक राष्ट्रपति भी रिपब्लिक डे के मेहमान बन चुके हैं.

बांग्लादेश से अब तक कोई मेहमान नहीं बुलाया गया. फ्रांस के चार राष्ट्रपति और एक प्रधानमंत्री जॉक शिराक जो बाद में राष्ट्रपति की हैसियत से भी रिपब्लिक डे में मेहमान बने.

लेकिन आजकल रफ़ाल विमान का रायता फैलने के कारण राष्ट्पति भवन के फर्श पर फिसलन बढ़ गई है. वरना हम मोदी जी को मशवरा देते कि इस बार फ्रांस के पांचवे राष्ट्रपति मैक्रोन को बुला लेते तो वो खुशी खुशी आते.

ये अलग बात कि रफ़ाल स्कैंडल भूतपूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा औलांद ने ही फोड़ा, जो 2016 के रिपब्लिक डे के मोदी जी के ख़ास मेहमान थे.

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शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तान के जनरल गवर्नर गुलाम मोहम्मद नेहरू जी की दावत पर 1955 के रिपब्लिक डे ख़ास मेहमान थे.

जनवरी 1965 के रिपब्लिक डे के मेहमान पाकिस्तान के एग्री-कल्चर मंत्री राणा अब्दुल हमीद थे, वो अलग बात की इसके सिर्फ़ नौ महीने बाद ही भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई छिड़ गई.

अब जब ट्रंप साहब ने लाल झंड़ी दिखा दी है तो मेरा सुझाव तो यही होगा कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को 26 जनवरी 2019 के लिए न्योता श्रीमती सुष्मा स्वराज के हाथों भेज दिया जाए, इंशा-अल्लाह फ़ायदा होगा.

वैसे भी कुछ फ़ैसले बहुत ज़्यादा सोचे बगैर कर लेने चाहिए.

अल्लामा इक़बाल कह गए हैं

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल

लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

ट्रंप को बुलाने का निर्णय बहुत ही सोच विचारने के बाद लिया गया था न, देखो क्या हो रहा है!

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