क्या श्रीलंका में भारत के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा

  • 31 अक्तूबर 2018
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग

श्रीलंका में जारी राजनीतिक संकट चर्चा में है. विदेशी मीडिया चीन को इस संकट से जोड़ कर देख रहा है. लेकिन चीनी मीडिया ने इस तरह की रिपोर्ट्स की आलोचना की है.

चीनी मीडिया का कहना है कि चीन और भारत के लिए श्रीलंका में सहयोग बढ़ाने की "अपार संभावनाएं" हैं.

चीन के विदेश मंत्रालय ने 29 अक्टूबर को कहा था कि चीन श्रीलंका में मौजूद सभी पक्षों से मैत्रीपूर्ण संबंध रखता है. साथ ही उन्होंने कहा कि चीन "दूसरे देशों के अंदरूनी मसलों में हस्तक्षेप ना करने के सिद्धांत का पालन करता है".

मंत्रालय ने उम्मीद जताई है कि सभी संबंधित पक्ष बातचीत के ज़रिए मतभेद सुलझा लेंगे.

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'सहयोग करें, प्रतिस्पर्धा नहीं'

शंघाई से चलने वाली गुआंचा न्यूज़ वेबसाइट में साउथ एशिया के रिसर्चर लोंग ज़िंगचुन ने एक आर्टिकल लिखा है. इस आर्टिकल में उन्होंने श्रीलंका में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के इतिहास के बारे में विस्तार से लिखा है. लेख के आख़िर में उन्होंने चीन की भूमिका पर बात की है.

लोंग ने लिखा, "अंतरराष्ट्रीय मीडिया, श्रीलंका के अंदरूनी हालात को चीन समर्थक और भारत समर्थक ताक़तों के बीच के संघर्ष के तौर पर दिखा रहा है. लेकिन ये सच्चाई नहीं है."

"श्रीलंका की सत्ता में चाहे महिंदा राजपक्षे हों या रनिल विक्रमासिंघे, चीन और श्रीलंका के बीच संबंध अच्छे बने रहेंगे."

इस बीच चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने भी विश्लेषकों के हवाले से लिखा है, "दक्षिण एशिया का ये छोटा-सा देश राजनीतिक बदलाव के दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में भारत और चीन को श्रीलंका में सहयोग बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए, ना कि वहां प्रभाव बढ़ाने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए. इससे तीनों देशों का फायदा होगा."

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Image caption मैत्रीपाला सिरीसेना, नरेंद्र मोदी और विक्रमासिंघे

अख़बार लिखता है कि पिछले कुछ महीनों में चीन और भारत के रिश्ते बेहतर हुए हैं.

अख़बार ने सियोन फोंग का बयान भी छापा है. फोंग बीजिंग की सिंघुआ यूनिवर्सिटी के नेशनल स्ट्रेटिजी इंस्टिट्यूट में रिसर्च कर रहे हैं. इस मामले वो कहते हैं, "विदेशी मीडिया में जो ख़बरें दिखाई जा ही हैं, सच्चाई उससे उलट है. चीन श्रीलंका से भारत को बाहर धकेलने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि श्रीलंका में तो भारत और चीन के लिए सहयोग बढ़ाने की अपार संभावनाएं हैं."

चाइनीज अकादमी ऑफ सोशल साइंस के असोसिएट रिसर्च फेलो लेओ शिआशुए कहते हैं, "ऐसा समझा जा रहा है कि राजपक्षे के प्रधानमंत्री बनने से श्रीलंका भारत से दूर हो जाएगा और चीन के नज़दीक आ जाएगा. ये सोच एकदम बेबुनियाद है."

हालांकि ग्लोबल टाइम्स ने लाओ के हवाले से लिखा है, "राजपक्षे वही करेंगे जो श्रीलंका के लोगों के लिए सही होगा. चीन और भारत के साथ रिश्तों में तालमेल बनाकर रखना श्रीलंका के लिए भी फ़ायदेमंद है."

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'भारत की चिंता जायज़'

एक दूसरे लेख में ग्लोबल टाइम्स लिखता है कि राजपक्षे के लौटने को लेकर भारत की चिंता को "समझा जा सकता" है, क्योंकि राजपक्षे के समय चीन ने श्रीलंका के आधारभूत ढांचे के विकास में काफ़ी निवेश किया था. राजपक्षे के लौटने से इस तरह की योजनाओं में दोबारा चीन का निवेश बढ़ सकता है.

लेख में ये भी लिखा गया है कि श्रीलंका पर भारत का थोड़ा-बहुत प्रभाव तो है. हालांकि भारत श्रीलंका पर ये दबाव नहीं बना सकता कि वो चीन के निवेश से इनकार कर दे.

अख़बार ने लिखा है, "अगर भारत श्रीलंका में अपनी मौजूदगी को बनाए रखना चाहता है तो उसे वहां चीन के साथ मिलकर काम करना चाहिए."

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