क्या चीन-पाकिस्तान की दोस्ती से केवल पंजाब को फ़ायदा

  • वसीम मुश्ताक़
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इमरान ख़ान

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान दो से पांच नवंबर तक चीन के दौरे पर होंगे. जुलाई में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह इमरान ख़ान का तीसरा विदेश दौरा होगा.

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रीमियर ली केकियांग से मुलाक़ात करने के अलावा वह शंघाई में एक आयात मेले में भी शिरकत करेंगे. यहां से वह पाकिस्तान पर लगातार बढ़ रहे क़र्ज़ से राहत पाने के लिए चीन से ताज़ा निवेश लाने की कोशिश करेंगे.

इमरान ख़ान का दौरा उन हालात में हो रहा है जब चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) को लेकर उनके देश में सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि इस योजना से केवल पाकिस्तान के सूबा पंजाब को फ़ायदा हो रहा है.

चाइना-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर या सीपेक चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत बनाए जा रहे व्यापारिक नेटवर्क का हिस्सा है.

सीपेक के तहत पाकिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई प्रॉजेक्ट चल रहे हैं, जिनमें चीन का 62 अरब डॉलर का निवेश है.

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हालांकि इमरान ख़ान ने सीपेक का समर्थन किया है और चीन ने भी उम्मीद जताई है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते प्रभावित नहीं होंगे.

चीन ने सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने 28 अक्तूबर को छपे एक संपादकीय में लिखा है, "चीन की परियोजनाओं पर बेवजह ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है और बेमतलब के सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि बहुत से लोग अब भी चीन के उदय को स्वीकार नहीं कर पा रहे. मगर सीपेक के तहत चीन और पाकिस्तान के आपसी सहयोग से हासिल की गई कई उपलब्धियां साफ़ नज़र आ जाती हैं."

इसके एक दिन बाद ही चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लू कांग ने कहा, "सीपेक के नतीजे फलदायी रहे हैं और हमारी दोस्ती गहरी हुई है."

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'पिछली सरकारों का ख़राब काम'

इमरान ख़ान के कैबिनेट मंत्रियों और सलाहकारों की राय थी कि सरकार को देश में चल रहे सीपेक से जुड़े प्रॉजेक्टों की समीक्षा करनी चाहिए.

सबसे पहले वाणिज्य, कपड़ा, उद्योग और निवेश मंत्री अब्दुल रज़ाक दाऊद ने एक विदेशी चैनल को दिए इंटरव्यू में इस प्रॉजेक्ट को लेकर कुछ चिंताएं जताई थीं.

उन्होंने कहा था, "पिछली सरकार ने चीन के साथ सीपेक को लेकर सही से समझौते नहीं किए थे. उन्होंने न तो होमवर्क सही से किया और न ही मोलभाव सही से किया. उन्होंने बहुत कुछ ऐसे ही सौंप दिया."

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दाऊद ने कहा था, "मुझे लगता है कि हमें एक साल के लिए थोड़ा विराम देना चाहिए ताकि हम मिलकर काम कर सकें. शायद हम सीपेक को पांच साल के लिए खींच सकते हैं."

लेकिन चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने हाल ही में पाकिस्तान के एक दौरे के दौरान इस विचार को ख़ारिज कर दिया था. उन्होंने कहा था, "सीपेक ने पाकिस्तान पर क़र्ज़ का कोई बोझ नहीं डाला है."

पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल

हालांकि सीपेक को पाकिस्तान के लिए अर्थव्यवस्था, इन्फ्रास्ट्रक्चर और नौकरियों के मामले में 'गेम-चेंजर' बताया जा रहा है. मगर विशेषज्ञ इस प्रॉजेक्ट में पारदर्शिता न होने की बात कहते रहे हैं.

अब्दुल रज़ाक दाऊद की टिप्पणी का हवाला देते हुए पाकिस्तान के अग्रणी अंग्रेज़ी अख़बार डॉन ने लिखा है, "व्यवसायी समुदाय से आने वाले वाणिज्य सलाहकार से पहले भी कई सारी कारोबारी और व्यावसायिक संस्थाओं ने ऐसी ही भाषा में चिंताएं जताई थीं."

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इमरान ख़ान ने भी सीपेक को लेकर सवाल उठाए थे

सत्ता में आने से पहले ही इमरान ख़ान ने परियोजनाओं के संबंध में जानकारियां सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध न होने और पाकिस्तान के विभिन्न प्रांतों को कथित तौर पर इसका सही से लाभ न मिलने को लेकर सवाल उठाए थे.

उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के एक सदस्य ने तो इस प्रॉजेक्ट को 'चाइना-पंजाब इकनॉमिक कॉरिडोर' कह दिया था. उनका कहना था कि इस परियोजना का असमान रूप से सबसे ज्यादा लाभ पाकिस्तान के पंजाब प्रांत को हो रहा है.

तीसरे साझेदार को लेकर समस्या

सीपेक में सऊदी अरब के तीसरे साझेदार के रूप में शामिल होने की संभावनाओं से भी पाकिस्तान में चिंता का माहौल पैदा हुआ है.

पाकिस्तान ने दो अक्टूबर को एलान किया कि सऊदी अरब सीपेक की रूपरेखा में शामिल नहीं है. इससे पहले उसने कहा था कि सऊदी अरब इस प्रॉजेक्ट का 'रणनीतिक साझेदार' हो सकता है. लेकिन इस बयान को लेकर पाकिस्तान के उच्च सदन में चिंता जताई गई थी, तब सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आया.

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हालांकि सरकार ने कहा है कि सऊदी अरब कुछेक परियोजनाओं में निवेश कर सकता है और पाकिस्तान-चीन के साथ अलग-अलग समझौते कर सकता है.

पत्रकार हसन खवार ने कराची के अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपे एक लेख में लिखा है कि क्षेत्रीय स्थिरता और नए भूराजनीतिक तनाव की कीमत पर सऊदी अरब को शामिल नहीं किया जाना चाहिए.

आईएमएफ़ बेलआउट पर अमरीका का रुख़

इस बीच पाकिस्तान इंटरनेशनल मॉनिटेरी फंड यानी आईएमएफ़ से आर्थिक सहायता लेने में अमरीका की ओर से दबाव महसूस कर रहा है.

अमरीका का कहना है कि पाकिस्तान पर सीपेक से जुड़े प्रॉजेक्टों के लिए मिले ऋण से कर्ज़ का बोझ बढ़ा है. हालांकि बीजिंग और इस्लामाबाद दोनों ही इस बात को ख़ारिज करते हैं.

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पाकिस्तान को आईएमएफ़ से क़र्ज़ दिए जाने का अमरीका इसलिए विरोध करता है क्योंकि उसे लगता है कि इस पैसे से चीन का कर्ज़ चुकाया जाएगा और इस तरह इंटरनैशनल फ़ंड चीन तक पहुंच जाएगा.

आईएमएफ़ ने भी कहा है कि वह सीपेक की परियोजनाओं की बारीक़ी से विश्लेषण करेगा और अगर पाकिस्तान को लोन देगा तो कड़ी शर्तों के साथ. 

पाकिस्तान ऐसे समय में अमरीका को नाराज़ नहीं करना चाहेगा जब उसे आईएमएफ़ के पैकेज की सख़्त ज़रूरत है. वित्त मंत्री असद उमर के मुताबिक़ पाकिस्तान को अपने वित्तीय क़र्ज़ को भरने के लिए 12 अरब डॉलर की ज़रूरत है.

इसलिए सीपेक की शर्तों पर फिर से मोलभाव करना पाकिस्तान के लिए आईएमएफ़ का पैकेज हासिल करने में सहायक सिद्ध हो सकता है.

लेकिन पाकिस्तान ने हाल ही में सऊदी अरब से 6 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता ली है और इमरान ये भी चाहेंगे कि आईएमएफ़ का बेलआउट न मिलने की स्थिति में उसकी कमी पूरी करने के लिए चीन से भी क़र्ज़ मिले.

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चीन से अभी भी उम्मीदें हैं पाकिस्तान को

पाकिस्तान ने आईएमएफ़ से वित्तीय मदद देने की जो गुज़ारिश की है, चीन ने उसका समर्थन किया है.

चीन के प्रवक्ता लू ने कहा है, "चीन आईएमएफ़ का सदस्य होने के नाते चाहेगा कि संस्थान पाकिस्तान की मौजूदा मुश्किलों से निपटने में मदद करने की दिशा में निष्पक्ष आकलन करे."

आगे क्या हो सकता है

इमरान ख़ान ने वादा किया है कि वह सीपेक को देश के लिए फ़ायदेमंद बनाएंगे जिसमें मानव विकास और सामाजिक कल्याण संबंधित परियोजनाओं का समावेश होगा.

इन नई परियोजनाओं को शामिल करके इमरान अपने मतदाताओं, ख़ासकर ख़ैबर पख़्तूनख़्वा प्रांत के लोगों को ख़ुश कर पाएंगे, जहां लोगों को लगता है कि सीपेक से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होने वाला.

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पाकिस्तान के कई प्रांतों में लोगों को लगता है कि उन्हें सीपेक का लाभ नहीं मिल रहा

इसकी उम्मीदें कम हैं पाकिस्तान सीपेक पर फिर से समझौता करने के लिए चीन पर ज़्यादा ज़ोर डालेगा क्योंकि अगर यह प्रॉजेक्ट बंद होता है तो इससे पाकिस्तान और चीन के मज़बूत रिश्तों में खटास आ जाएगी और भविष्य में देश की आर्थिक प्रगति भी ख़तरे में पड़ जाएगी.

इस संभावना से अलग 28 अक्टूबर के संपादकीय में ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, "चीन लगातार सीपेक के तहत विकास को गति देने के लिए पाकिस्तान की मदद करता करेगा, भले ही बाक़ी दोनों के बीच दरार पैदा करने की भरपूर कोशिशें करते रहें."

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