खादिम हुसैन रिज़वी जिनके इशारे पर हुआ पाकिस्तान में चक्का-जाम

  • 2 नवंबर 2018
पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट Getty Images

आसिया बीबी की रिहाई से ख़फ़ा पाकिस्तान के धार्मिक संगठन 'तहरीके लब्बैक या रसूल अल्लाह' की सरकार और खुफिया एजेंसी आईएसआई से हुई बातचीत विफल घोषित कर दी गई है.

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मज़बूत पकड़ रखने वाले तहरीके लब्बैक संगठन ने शुक्रवार सुबह से अपना आंदोलन और तेज़ कर दिया है.

शुक्रवार सुबह जब लाहौर और इस्लामाबाद शहर के ट्रैफ़िक की समीक्षा की गई तो इन शहरों की तमाम मुख्य सड़कें बाधित होने की सूचना मिली.

मैप इमेज कॉपीरइट Google
Image caption लाहौर शहर के ट्रै़फ़िक का हाल, शुक्रवार सुबह

तहरीके लब्बैक का कहना है कि जब तक पाकिस्तान का सुप्रीम कोर्ट आसिया बीबी के मामले में अपना फ़ैसला नहीं बदलता, तब तक वो अपना आंदोलन जारी रखेंगे.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तौहीन-ए-रिसालत यानी ईशनिंदा के एक मामले में ईसाई महिला आसिया बीबी को बरी कर दिया था.

आसिया बीबी की फ़ाइल तस्वीर इमेज कॉपीरइट Asia Bibi
Image caption आसिया बीबी की फ़ाइल तस्वीर

कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ बंद का आह्वान करते हुए तहरीके लब्बैक संगठन के खादिम हुसैन रिज़वी ने कहा था, "आसिया ने पब्लिक के सामने अपना गुनाह कुबूल किया था. लेकिन 9 साल बाद कोर्ट उसे बेगुनाह कहकर बरी कर रहा है. इसका मतलब है कि न्यायिक व्यवस्था में कोई गड़बड़ी है. इस फ़ैसले पर सवाल उठने लाज़िम हैं."

इसके बाद तहरीके लब्बैक ने पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में चक्का जाम और विरोध प्रदर्शन किये जो कि अभी भी जारी हैं.

खादिम हुसैन रिज़वी इमेज कॉपीरइट Arif Ali

कौन हैं खादिम हुसैन रिज़वी?

ख़ुद को एक धार्मिक आंदोलनकारी बताने वाले 'तहरीके लब्बैक या रसूल अल्लाह' के संस्थापक खादिम हुसैन रिज़वी के बारे में कुछ साल पहले तक लोगों को ज़्यादा जानकारी नहीं थी.

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल मार्च में ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई को फटकार लगाते हुए कहा था कि खादिम हुसैन रिज़वी को पैसा कहाँ से मिलता है? उनका व्यवसाय क्या है? उन्हें कौन लोग चंदा देते हैं? इसकी जानकारी किसी के पास क्यों नहीं है.

साल 2017 में लाहौर की पीर मक्की मस्जिद के धार्मिक उपदेशक रहे 52 वर्षीय खादिम हुसैन रिज़वी ने असल शोहरत ईशनिंदा क़ानून में संशोधन के ख़िलाफ़ एक लंबी और सफल लड़ाई लड़कर हासिल की.

इससे पहले 4 जनवरी 2011 को मारे गए पंजाब प्रांत के राज्यपाल सलमान तासीर के हत्यारे मुमताज़ क़ादरी की मौत की सज़ा के मामले में भी खादिम हुसैन रिज़वी बहुत सक्रिय रहे थे.

रिज़वी ने सलमान तासीर की हत्या को ये कहते हुए उचित ठहराया था कि "सलमान ने ईशनिंदा क़ानून को 'एक काला क़ानून' कहा था जो कि एक ग़लत बयान था."

रिज़वी के इस बयान के बाद उन्हें पाकिस्तान के वक्फ़ बोर्ड ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था.

इस मामले के ज़रिये उन्होंने अपने कथित धार्मिक आंदोलन को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी. फिर भी मोटे तौर पर खादिम हुसैन रिज़वी की सार्वजनिक छवि एक मामूली व्यक्ति की ही रही.

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट AFP

बरेलवी राजनीति का नया चेहरा

पाकिस्तान में लोग उन्हें ईशनिंदा के विवादित क़ानून के एक बड़े हिमायती के तौर पर देखते हैं.

हालांकि व्हील चेयर पर चलने वाले खादिम हुसैन रिज़वी ख़ुद को बरेलवी विचारक कहते हैं और पाकिस्तान में उन्हें बरेलवी राजनीति का नया चेहरा माना जाता है.

साल 2017 में खादिम हुसैन रिज़वी ने आधिकारिक तौर पर तहरीके लब्बैक की स्थापना की और उसी साल सितंबर में उन्होंने लाहौर की एक सीट से उप-चुनाव भी लड़ा.

लेकिन उन्होंने इस उपचुनाव में 7 हज़ार वोट लाकर सबको हैरत में डाल दिया था.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुमताज़ क़ादरी को फांसी दिए जाने के बाद से बरेलवी विचारधारा के लोगों ने राजनीति में ज़्यादा सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है.

साल 2012 के बाद से ही पाकिस्तान में मुसलमानों के विभिन्न पंथों, ख़ासकर देवबंदी और बरेलवी मुसलमानों के बीच आपसी लड़ाई की घटनाएं तेज़ी से बढ़ी हैं.

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट EPA

सेना का समर्थन?

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाकान अब्बासी की हुक़ूमत में हुए फ़ैज़ाबाद धरने की सफलता के बारे में ऐसा माना जा रहा था कि उस दौरान खादिम हुसैन रिज़वी के प्रदर्शन को पाकिस्तान की सेना का समर्थन प्राप्त था.

हालांकि सेना इस बात से हमेशा इनकार करती रही है. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट से आसिया बीबी की रिहाई के बाद पाकिस्तान में हो रहे धरना प्रदर्शनों के पीछे कौन है और तहरीके लब्बैक को किसका समर्थन हासिल है? ये सवाल अब दोबारा पूछा जा रहा है.

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पहले खादिम हुसैन रिज़वी को किसी का समर्थन हासिल हो या न हो, लेकिन इस बार वो एक ख़ास विचारधारा के लोगों में अपनी लोकप्रियता के बल पर सड़कों पर उतरे हैं.

साथ ही ये भी माना जा रहा है कि अब खादिम हुसैन रिज़वी और उनके संगठन तहरीके लब्बैक के दूसरे वरिष्ठ नेता पाकिस्तानी फ़ौज और सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे देखकर लगता है कि उन्हें अपनी ताक़त पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास है.

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट Getty Images

'पैग़ंबरे इस्लाम का चौकीदार'

साल 1990 के बाद से अब तक पाकिस्तान में भीड़ या लोगों ने ईशनिंदा का आरोप लगाकर कम से कम 69 लोगों की हत्या कर दी है.

लेकिन खादिम हुसैन रिज़वी इस बात पर विश्वास नहीं करते कि ईशनिंदा कानून का पाकिस्तान में ग़लत इस्तेमाल होता है.

पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार कवरेज न मिलने के कारण उन्होंने सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल अपने प्रचार के लिए किया है.

न सिर्फ़ उर्दू और अग्रेज़ी में उनकी वेबसाइट्स मौजूद हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी उनके संगठन तहरीके लब्बैक के कई अकाउंट बने हुए हैं.

खादिम हुसैन रिज़वी अपने आप को 'पैग़ंबरे इस्लाम का चौकीदार' कहकर बुलाते हैं.

तहरीके लब्बैक के एक प्रवक्ता ऐजाज़ अशरफ़ी ने बताया, "खादिम हुसैन रिज़वी का संबंध पाकिस्तान के पंजाब में स्थित अटक ज़िले से है और हाजी लाल ख़ाँ के घर में उनका जन्म 22 जून 1966 में हुआ था. उनके दो बेटे भी विरोध प्रदर्शनों में शरीक होते रहे हैं. साल 2006 में हुए एक एक्सीडेंट के बाद से ही खादिम हुसैन रिज़वी व्हील चेयर पर हैं."

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट Getty Images

लोगों को सड़क पर लाने की शक्ति

बताया जाता है कि सार्वजनिक तौर पर या मीडिया के सामने वो अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में अब बात करने से बचते हैं.

रिज़वी ने लाहौर के एक मदरसे से शिक्षा हासिल की. उनपर कई केस भी दर्ज हैं.

प्रवक्ता ऐजाज़ अशरफ़ी के अनुसार "खादिम हुसैन रिज़वी पर कितने केस दर्ज हैं, इसकी कोई जानकारी नहीं है. लेकिन जब से रिज़वी ने संगठन बनाया है तब से अब तक किसी भी मामले में उनकी गिरफ़्तारी नहीं हुई है. शायद इसका कारण उनकी 'स्ट्रीट पावर' (लोगों को सड़क पर लाने की शक्ति) है."

जनवरी 2017 में खादिम हुसैन रिज़वी ने लाहौर में एक प्रदर्शन आयोजित किया था जिसके बाद पुलिस ने उनके कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज कर दिया था और उन्हें नज़रबंद कर दिया था.

लाहौर पुलिस के अनुसार खादिम हुसैन रिज़वी को अपनी बड़ी गतिविधियों की जानकारी पुलिस को देनी पड़ती है.

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट Getty Images

आर्थिक सहायता कहाँ से?

आईएसआई की एक रिपोर्ट का कहना है कि खादिम हुसैन रिज़वी की अपने वरिष्ठों के सामने घिग्गी बंधी रहती है, लेकिन इसके उलट वो अपने जूनियर साथियों को हमेशा हड़काते रहते हैं.

खादिम हुसैन रिज़वी को अपना संगठन चलाने के लिए आर्थिक समर्थन कहाँ से मिलता है, इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है.

लेकिन इस्लामाबाद धरने के दौरान उन्होंने ये ऐलान कर दिया था कि कई नामालूम लोग उन्हें लाखों रुपये का चंदा देकर जा रहे हैं.

ऐसा माना जाता है कि खादिम हुसैन रिज़वी को पाकिस्तान के भीतर और बाहर, दोनों जगहों से आर्थिक समर्थन मिल रहा है.

पिछले साल के धरने के बाद आईएसआई की तरफ से अदालत में पेश की गई एक रिपोर्ट के अनुसार रिज़वी वित्तीय अनियमितताओं में संलिप्त रहे हैं और इस मामले में उनकी छवि अच्छी नहीं है.

खादिम हुसैन रिज़वी के जोशीले भाषण से ऐसा लगने लगता है कि उन्हें अपनी और अपने संगठन की ताक़त पर बहुत ज़्यादा गुमान है.

उनके समर्थक उनकी ग़ालियों पर भी आँखें बंद करके वाह-वाह करते हैं.

पाकिस्तान इमेज कॉपीरइट AFP

और निडर-बेबाक होने का ख़तरा...

अपने भाषणों में उन्होंने न केवल सत्ता में बैठे या उच्च पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाया, बल्कि पाकिस्तान के सबसे लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल सत्तार ईधी को भी नहीं बख़्शा.

उनके सोशल मीडिया पन्नों पर छपीं कुछ वीडियो सिर्फ़ इसलिए वायरल हो गई थीं क्योंकि वो पाकिस्तान सरकार को कर्ज़ों से छुटकारा पाने के लिए जो सलाह देते हैं, उनपर बस हंसा जा सकता है.

अपने मक़सद के बारे में तहरीक-ए-लब्बैक ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि वह देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी ताकतों के चंगुल से बचाना चाहते हैं.

खादिम हुसैन रिज़वी हॉलैंड की पत्रिका शार्ली एब्डो पर एटम बम से हमले की बात भी कह चुके हैं.

बीते कुछ दिनों में जिस तरह के सख्त और सरकार विरोधी भाषण खादिम हुसैन रिज़वी ने दिए हैं, अगर उनके बावजूद भी रिज़वी पर कोई कार्रवाई नहीं होती तो उनके और भी निडर और बेबाक हो जाने की आशंका है.

इससे निपटने के लिए गेंद एक दफ़ा फिर सरकार के पाले में है और पाकिस्तान सरकार को सोचना है कि इससे कैसे डील करना है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
आसिया बीबी मामला: कट्टरपंथियों से कैसे निपटेंगे इमरान

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आपयहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार