ट्रंप के लिए अमरीका के जन्मसिद्ध नागरिकता क़ानून में बदलाव कितना आसान?

  • 3 नवंबर 2018
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अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के जन्मजात या जन्मसिद्ध नागरिकता संबंधी क़ानून को ख़त्म करने के लिए एक विशेष अध्यादेश लाने की बात कही है. यह क़ानून कहता है कि जो अमरीका में पैदा हो, उसे अमरीकी नागरिक माना जाए.

ट्रंप के मुताबिक़ वह चाहते हैं कि अवैध तरीके से अमरीका में दाखिल होने वाले लोगों के उन बच्चों को अमरीकी नागरिकता न दी जाए, जो अमरीका मे ही पैदा होते हैं.

लेकिन क्या इ क़ानून कानून बदलना इतना आसान है?

अमरीका में जब दो दिन पहले राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अमरीका के Birthright Citizenship या जन्मसिद्ध नागरिकता संबंधी कानून को ख़त्म करने की बात कही थी, तबसे देश भर में इस मुद्दे पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है.

अभी इस कानून के तहत जो अमरीका में पैदा हो उसे अमरीकी नागरिक माना जाता है, चाहे बच्चे के जन्म के समय बच्चे के माता-पिता अवैध रूप से ही अमरीका में क्यों न रह रहे हों.

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लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप प्रवासियों के खिलाफ़ सख़्त रवैय्या अपनाते हैं और अब उन्होंने इस नागरिकता के क़ानून को ख़त्म करने के लिए एक विशेष अध्यादेश लाने की बात कही है.

राष्ट्रपति ट्रंप का मकसद है कि अवैध तरीके से अमरीका में दाख़िल होने वाले लोगों के बच्चों को भी अमरीकी नागरिकता न दी जाए, जो अमरीका में ही पैदा होते हैं.

बहुत से लोग इसे चुनावी फ़ायदे के लिए उठाया जाने वाला क़दम कह रहे हैं. 6 नवंबर को अमरीका में कांग्रेस और सीनेट की सीटों के लिए चुनाव होने हैं.

बुधवार को फ़्लोरिडा की एक चुनावी रैली में इस कानून के बारे में ट्रंप का कहना था, "गैरकानूनी तौर पर अमरीका में आने वाले प्रवासियों को इस तरह नागरिकता देने के लिए अमरीकी कांग्रेस ने कभी क़ानून को मंज़ूरी नहीं दी है. ग़ैरकानूनी प्रवासियों पर अमरीकी क़ानून लागू नहीं किया जाता है."

दरअसल, अमरीकी संविधान में 1868 में किए गए 14वें संशोधन के तहत उन सभी लोगों को अमरीकी नागरिक माना जाता है जो अमरीका के अंदर अमरीकी क़ानून के दायरे में आते हों.

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लेकिन क़ानून इस बारे में साफ़ नहीं है कि ग़ैरकानूनी प्रवासियों के बच्चों का अमरीका में जन्म होने पर वे बच्चे भी अमरीकी होंगे या नहीं.

भारतीय नागरिक टी.पी. पटेल अमरीका में एच1बी वीज़ा पर आए हैं और नौकरी कर रहे हैं. उनकी एक बेटी अमरीका में ही पैदा हुई है.

टी.पी. पटेल इस तरह नागरिकता के क़ानून में बदलाव की संभावना से परेशान हैं.

वह कहते हैं, "जब से ट्रंप ने नागरिकता के क़ानून बदलने की बात की है तब से हम सभी बहुत ही तनाव में हैं. इससे पहले भी ट्रंप ने कई अध्यादेश जारी कर कानून बदले हैं. ऐसे में कोई भरोसा नहीं वे नागरिकता के क़ानून में भी बदलाव कर दें. क्योंकि ट्रंप तो साफ़ कहते हैं कि वह प्रवासियों के सख़्त खिलाफ़ हैं."

इसी तरह भारतीय मूल के अमरीकी निलेश विश्वासराव का जन्म अमरीका में हुआ था अब वह पढ़ाई पूरी करके नौकरी भी कर रहे हैं. उनके जन्म के समय उनके पिता तो अमरीकी नागरिकता ले चुके थे लेकिन मां के पास ग्रीन कार्ड था.

निलेश विश्वासराव बताते हैं कि उनके बहुत से दोस्त ऐसे हैं जिनका जन्म अमरीका में हुआ और उनके माता पिता अमरीका में ग़ैरक़ानूनी प्रवासी थे. अब ऐसे लोग नागरिकता क़ानून में बदलाव के अंदेशे से डर रहे हैं.

निलेश विश्वासराव कहते हैं, "मेरे कई दोस्त हैं जो इस बात से डरे हुए हैं कि अगर नागरिकता ख़त्म कर दी गई तो कहां जाएंगे, क्या करेंगे. हर समय निष्कासन का डर लगा रहता है."

अधिकतर वकीलों का ये मानना है कि ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों के बच्चों को भी मौजूदा क़ानून के तहत अमरीकी नागरिक ही माना जाएगा.

फ़्लोरिडा में भारतीय मूल के एक अमरीकी वकील अश्विन शर्मा ऐसे कई प्रवासियों के मामलों की भी देखरेख करते हैं.

अश्विन शर्मा का कहना है कि नागरिकता के क़ानून में बदलाव लाना आसान काम नहीं है.

वह कहते हैं, "इस कानून को बदलने के लिए अमरीकी कांग्रेस की सहमति ज़रूरी है. लेकिन मुझे लगता है कि राष्ट्रपति ट्रंप यह सब कुछ जानते हैं और यह मुद्दा बस इसलिए उठा रहे हैं ताकि अपने समर्थकों में जोश ला सकें और राजनीतिक फ़ायदा उठा सकें."

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अश्विन शर्मा कहते हैं कि अब यह मामला उठता रहेगा और अभी तो नहीं तो आने वाले 25 से 30 वर्षों में अमरीका को नागरिकता से संबंधित क़ानून में बदलाव करना ही पड़ेगा. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप अगर अध्यादेश के ज़रिए इस क़ानून को बदलने की कोशिश करेंगे तो यह मामला अदालत में जाने की पूरी उम्मीद है.

खुद राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के प्रतिनिधि सभा के स्पीकर पॉल रायन और कुछ अन्य सांसद भी इस क़ानून में अध्यादेश के ज़रिए तब्दीली के खिलाफ़ हैं.

वह कहते हैं कि इस तरह के संवैधानिक मामलों में कानून में तब्दीली लाने का कांग्रेस को ही अख्तियार है.

लेकिन अभी भी अमरीका ऐसा अकेला देश नहीं है बल्कि विश्व भर में 30 से अधिक ऐसे देश हैं जहां पैदा होने वाले हर शख़्स को उसी देश की नागरिकता दे दी जाती है.

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