लाहौर-काशगर बस सेवाः भारत चीन के बीच बढ़ेगा विवाद?

  • 2 नवंबर 2018
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चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कारिडोर (सीपैक) पर यात्री बस सेवा शुरू किए जाने का भारत ने विरोध किया है. दोनों देशों के बीच ये निजी बस सेवा शनिवार से शुरू होगी.

पाकिस्तान के लाहौर से लेकर चीन के काशगर तक जाने वाली इस बस में यात्रा के लिए पासपोर्ट, वीज़ा और वापसी टिकट ज़रूरी होगा. टिकटों की बुकिंग शुरू हो गई है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस बस सेवा का विरोध करते हुए कहा है, "हमनें पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से होकर जाने वाली प्रस्तावित बस सेवा का चीन और पाकिस्तान से कड़ा विरोध दर्ज कराया है."

भारत ने 1963 में हुए सीमा समझौते को अवैध बताते हुए कहा है कि पाकिस्तान प्रशासित जम्मू-कश्मीर से गुज़रने वाली ऐसी कोई भी बस सेवा भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन होगा.

बीजिंग में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "पाकिस्तान चीन इकोनॉमिक कॉरिडोर भारत प्रशासित कश्मीर से होकर गुज़रता है और भारत के विरोध का आधार यही है. पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है और इस हिस्से में जब भी कोई काम होता है भारत उसकी आपत्ति करता ही है."

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लेकिन क्या भारत के विरोध का चीन पर असर होगा? चीन मामलों के विशेषज्ञ स्वर्ण सिंह कहते हैं, "भारत चीन का सबसे बड़ा और अहम पड़ोसी देश है. ये भी सच है कि पाकिस्तान चीन का एक बेहद ख़ास मित्र देश है. बहुत संभव है कि भारत के विरोध का बहुत ज़्यादा असर न हो. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत के विरोध को सुना ही नहीं जाएगा."

स्वर्ण सिंह कहते हैं, "भारत प्रशासित कश्मीर को भारत अपना हिस्सा मानता है ऐसे में उसका विरोध सही है. ये बस सेवा चीन की अपनी किसी विवादित जगह पर निर्माण कार्य न करने की नीति के भी ख़िलाफ़ है."

क्या भारत के विरोध को मानेगा चीन

सैबल दास गुप्ता बताते हैं, "बस सेवा पर भारतीय विरोध का सवाल भारतीय पत्रकारों ने चीनी विदेश मंत्रालय की प्रेस कांफ्रेंस में उठाया था जिसके जवाब में चीन की ओर से कहा गया था कि ऐसी किसी सेवा या आपत्ति के बारे में हमें नहीं पता. चीन ने ये भी कहा है कि भारत और चीन के रिश्तों पर ऐसी किसी आपत्ति का कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा."

गुप्ता कहते हैं, "इससे ये तो स्पष्ट है कि इस मुद्दे को लेकर चीन भारत के साथ किसी सीधे तनाव में नहीं पड़ना चाहता है. लेकिन अगर चीन इस बस सेवा को रोक देता है तो ये पाकिस्तान के लिए अपमानजनक स्थिति होगी."

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लेकिन अगर चीन भारत के विरोध को बिल्कुल दरकिनार कर देता है तो क्या ये भारत का अपमान होगा?

स्वर्ण सिंह कहते हैं, "ये भारत के बजाए चीन का अपना अपमान होगा क्योंकि ये उनकी अपनी घोषित नीति के ख़िलाफ़ ही होगा."

सिंह कहते हैं, "भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच भी भूमि को लेकर विवाद है. तीनों ही देश इस विवाद को स्वीकार भी करते हैं. जब तक विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं होता तब तक निर्माण कार्य को बढ़ावा देने पर सवाल तो उठेंगे ही."

सिंह कहते हैं, "कश्मीर से जुड़े मुद्दे भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए अहम होते हैं. क्योंकि ये भावनात्मक रूप ले लेते हैं. ऐसे में अगर बस सेवा के इस मुद्दे पर बात आगे बढ़ी तो ये कूटनीतिक तनाव तक भी पहुंच सकती है."

वहीं पाकिस्तान ने अभी तक भारत के विरोध पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है.

चीन के लिए भी अहम होगी बस सेवा

सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "ऐसा लगता नहीं कि चीन इस बस सेवा को रोकेगा लेकिन भारत के विरोध को कम करने के लिए कुछ करने की कोशिश करेगा. ये बस सेवा चीन के लिए भी उतनी ही अहम होगी जितनी की पाकिस्तान के लिए, क्योंकि चीन अपने वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव के ज़रिए पूरी दुनिया में अपनी निर्माण क्षमता को दिखाना चाहता है."

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"चीन श्रीलंका और म्यांमार में भी इस योजना के तहत काम कर रहा है. लेकिन इसकी सबसे कामयाब कहानी यदि कहीं से आ सकती है तो वो पाकिस्तान ही है क्योंकि पाकिस्तान में सबसे ज़्यादा काम हो रहा है. यदि पाकिस्तान और चीन के बीच बनी सड़क पर बस नहीं चल पायी तो ये चीन के लिए भी झटका होगा.

क्या ये निजी बस सेवा कामयाब होगी?

इस पर सैबल दास गुप्ता कहते हैं, "दोनों देशों के बीच लोगों का आवागमन बढ़ा है. चीन के जिस हिस्से में ये बस जाएगी उसमें पाकिस्तानी भर गए हैं. वो कई तरह के काम वहां करते हैं. इसी तरह वन बेल्ट वन रोड वाले पाकिस्तान के हिस्से में चीनी लोगों की तादाद बढ़ी है, वो यहां इस प्रोजेक्ट पर काम करते हैं."

पाकिस्तान के चीनी सीमा से सटे इलाक़ों में चीनी निवेश से आधारभूत ढांचे के विकास में भी तेज़ी आई है.

गुप्ता कहते हैं, "इस क्षेत्र में बिजली की लाइने बिछ रही हैं, बिजली संयंत्र विकसित किए जा रहे हैं. चीन पाकिस्तान में 60 अरब डॉलर निवेश कर रहा है. इस निवेश का बड़ा हिस्सा सीमावर्ती क्षेत्र में ही लगाया जा रहा है."

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गुप्ता कहते हैं, "ये बस सेवा बेहद कामयाब साबित होगी क्योंकि इस क्षेत्र में यातायात की ज़रूरत बढ़ रही है और लोगों को विमान की महंगी यात्रा करनी पड़ती है. दोनों देशों के बीच हज़ारों लोग आ जा रहे हैं, उनके लिए ये बस सेवा कामयाब साबित होगी."

लेकिन इससे पहले 2005 में किया गया ऐसा ही प्रयोग नाकाम साबित हुआ था. पाकिस्तान के पर्यटन विकास विभाग ने साल 2005 में पाकिस्तान के गिलगित से काशगर तक बस सेवा शुरू की थी लेकिन वो बाद में बंद हो गई थी.

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता हारून रशीद कहते हैं, "उस समय गिलगित से काशगर के बीच शुरू हुई इस बस का हाल जानने के लिए हमने भी सफ़र करने की कोशिश की थी लेकिन चीन सरकार ने हमें पत्रकार होने की वज़ह से वीज़ा नहीं दिया था. अब वो बस सेवा बंद हो गई है."

रशीद कहते हैं, "जो नई बस सेवा शुरू हो रही है वो एक निजी कंपनी की सेवा है और पाकिस्तान की सरकार का इससे कोई संबंध नहीं है. दोनों देशों के बीच आर्थिक प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद से व्यापार बढ़ा है और लोगों का आना जाना भी बढ़ा है. ज़ाहिर तौर पर ये बस सेवा दोनों देशों के बीच व्यापार करने वाले व्यापारियों को सेवा देने के लिए शुरू की गई है. हालांकि आम लोग भी इससे यात्रा कर सकते हैं."

रशीद कहते हैं, "सीपैक परियोजना के बाद पाकिस्तान और चीन के बीच लोगों का आना जाना बढ़ा है, ऐसे में इस बार ये सेवा कामयाब साबित हो सकती है."

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