श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने संसद भंग करने के दिए आदेश

  • 10 नवंबर 2018
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Image caption राष्ट्रपति सिरिसेना के क़दम को विरोधी अवैध बता रहे हैं

श्रीलंका में राजनीतिक संकट के बीच राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने संसद भंग करने का आदेश जारी कर दिया है.

इसके लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी हो चुकी है जो शुक्रवार मध्यरात्रि से लागू हो जाएगी. अगर यह हो जाता है तो अगले साल की शुरुआत में चुनाव हो सकते हैं.

हालांकि, यह इतना भी आसान नहीं होगा क्योंकि इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

वहीं, प्रधानमंत्री पद से बर्ख़ास्त किए गए रानिल विक्रमासिंघे की पार्टी यूनाइटेड नेशनल पार्टी (यूएनपी) ने कहा है कि राष्ट्रपति के पास ऐसे फ़ैसले लेने की शक्ति नहीं है.

पिछले महीने राष्ट्रपति सिरिसेना ने पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री बना दिया था जबकि प्रधानमंत्री रानिल विक्रमासिंघे और उनके मंत्रिमंडल को बर्ख़ास्त कर दिया था.

विक्रमासिंघे ने पद छोड़ने से इनकार कर दिया था और कहा था कि उन्हें हटाना अवैध है.

विक्रमासिंघे की पार्टी यूएनपी के सांसद अजीत परेरा ने कहा है कि संसद को भंग करने का क़दम 'अवैध' है और उन्हें विश्वास है कि यह रद्द होगा.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "हम चुनाव आयोग से निवेदन करते हैं कि देश में ख़ूनी संघर्ष हुए बिना शांतिपूर्ण तरीक़े से वह इस मुद्दे का समाधान करें."

वहीं राजपक्षे ने आम चुनावों के समर्थन में एक ट्वीट करते हुए लिखा है कि और बतौर नेता ये उनकी ज़िम्मेदारी बनती है कि वे श्रीलंका के भविष्य पर आम जनता को फ़ैसला करने का अवसर दें. आम चुनाव देश को स्थिरता की ओर ले जाएगा.

बीबीसी सिंहला सेवा के आज़म अमीन का कहना है कि सिरिसेना-राजपक्षे कैंप जल्द चुनाव चाहता है क्योंकि उनके पास संसद में अपनी नई सरकार के लिए बहुमत नहीं है.

हमारे संवाददाता अमीन ने कहा कि यूएनपी इस समय राष्ट्रीय चुनाव के लिए संसदीय मतदान चाहेगी.

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Image caption विक्रमासिंघे ने अपना दफ़्तर छोड़ने से इनकार कर दिया है

किस वजह से हुआ यह सब?

2015 में लंबे समय से राष्ट्रपति रहे राजपक्षे को सिरिसेना और विक्रमासिंघे के गठबंधन ने हराया था.

इस गठबंधन में शुरू से ही दरार रही और आख़िरकार सिरिसेना ने विक्रमासिंघे को पद से हटाते हुए राजपक्षे को प्रधानमंत्री बना दिया.

कथित तौर पर इन दोनों के बीच विवाद तब बढ़ गया जब सरकार की भारत को एक बंदरगाह लीज़ पर देने की योजना थी.

इस विवाद के बाद दोनों पक्ष सरकार चलाने का दावा कर रहे थे. बर्ख़ास्त प्रधानमंत्री ने अपना निवास टेम्पल ट्रीस छोड़ने से इनकार कर दिया. उन्होंने राष्ट्रपति के इस क़दम को असंवैधानिक बताते हुए संसद सत्र बुलाने की मांग की.

उनकी मांग है कि संसद सत्र बुलाकर विश्वास मत पारित किया जाए.

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Image caption राजपक्षे पर भ्रष्टाचार और गृह युद्ध के दौरान ज़्यादती बरतने के आरोप रहे हैं

वहीं, राजपक्षे ने नए मंत्रिमंडल में शपथ लेने के साथ ही वित्त मंत्री का पद भी लिया. चार सांसदों को भी मंत्री पद दिए गए ताकि संसद में समर्थन जीता जा सके.

इस संकट के बाद पिछले महीने हिंसा भी हुई. जब बर्ख़ास्त तेल मंत्री के अंगरक्षक ने उनके दफ़्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी.

इस पूरी घटना पर पड़ोसी देश बेहद क़रीबी नज़र बनाए हुए हैं. चीन ने राजपक्षे को बधाई दी है जबकि भारत, यूरोपीयन यूनियन और अमरीका ने संविधान का सम्मान करने को कहा है.

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