चीन और ताइवान: दुनिया का सबसे अनोखा रिश्ता

  • 22 नवंबर 2018
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Image caption निर्देशक फ़ू युए (दाएं) को बेस्ट डॉक्युमेंट्री के लिए सम्मान मिला

पिछले दिनों ताइवान की राजधानी ताइपे में गोल्डन होर्स अवॉर्ड कार्यक्रम में ताइवानी निर्देशक फ़ू युए को बेस्ट डॉक्युमेंट्री के लिए सम्मान मिला.

अपने भाषण में फ़ू युए ने कहा कि वह चाहती हैं कि उनके देश ताइवान को स्वतंत्र देश के रूप में पहचाना जाए. इस घटना ने मानो चीन और ताइवान के रिश्तों की दुखती रग पर हाथ रख दिया.

उनका यह कहना था कि चीन से आई हस्तियों ने इसका विरोध किया और कुछ लोग कार्यक्रम से चले गए. कुछ ने कार्यक्रम में ही 'चीनी ताइवान' के नारे लगाए यानी ताइवान को चीन का हिस्सा बताया गया.

बाद में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने फेसबुक पोस्ट के जरिए अपने देश की निर्देशक के भाषण का बचाव किया और कहा कि हम नहीं मानते कि ताइवान 'चीनी ताइवान' है.

इसके बाद से ताइवान और चीन के बीच तनाव पैदा हो गया है.

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क्या है विवाद की वजह

'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' और 'रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' एक-दूसरे की संप्रभुता को मान्यता नहीं देते. दोनों खुद को आधिकारिक चीन मानते हुए मेनलैंड चाइना और ताइवान द्वीप का आधिकारिक प्रतिनिधि होने का दावा करते रहे हैं.

जिसे हम चीन कहते हैं उसका आधिकारिक नाम है 'पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना' और जिसे ताइवान के नाम से जानते हैं, उसका अपना आधिकारिक नाम है 'रिपब्लिक ऑफ़ चाइना.' दोनों के नाम में चाइना जुड़ा हुआ है.

व्यावहारिक तौर पर ताइवान ऐसा द्वीप है जो 1950 से ही स्वतंत्र रहा है. मगर चीन इसे अपना विद्रोही राज्य मानता है. एक ओर जहां ताइवान ख़ुद को स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र मानता है, वहीं चीन का मानना है कि ताइवान को चीन में शामिल होना चाहिए और फिर इसके लिए चाहे बल प्रयोग ही क्यों न करना पड़े.

इस विवाद के कारण को समझने के लिए इतिहास में जाना होगा. दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर चाइनीज़ एंड साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज़ में असिस्टेंट प्रोफेसर गीता कोचर बताती हैं, "चीन में साल 1644 में चिंग वंश सत्ता में आया और उसने चीन का एकीकरण किया. साल 1895 में चिंग ने ताइवान द्वीप को जापानी साम्राज्य को सौंप दिया. मगर 1911 में चिन्हाय क्रांति हुई जिसमें चिंग वंश को सत्ता से हटना पड़ा. इसके बाद चीन में कॉमिंगतांग की सरकार बनी. जितने भी इलाके चिंग रावंश के अधीन थे, वे कॉमिंगतांग सरकार को मिल गए."

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Image caption माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी को हराया था

गृहयुद्ध ने बदले हालात

कॉमिंगतांग सरकार के दौरान चीन का आधिकारिक नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना कर दिया गया था.

चीन और ताइवान के इस पेचीदा विवाद की कहानी शुरू होती है साल 1949 से. ये वो दौर था जब चीन में हुए गृहयुद्ध में माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्टों ने चियांग काई शेक के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कॉमिंगतांग पार्टी को हराया था.

चीन में सत्ता में आ चुके कम्युनिस्टों की नौसैनिक ताक़त न के बराबर थी. यही कारण था कि माओ की सेना समंदर पार करके ताइवान पर नियंत्रण नहीं कर सकी.

डॉक्टर गीता कोचर बताती हैं, "कम्युनिस्टों से हार के बाद कॉमिंगतांग ने ताइवान में जाकर अपनी सरकार बनाई. इस बीच दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की हार हुई तो उसने कॉमिंगतांग को ताइवान का नियंत्रण सौंपा. यह हस्तांतरण दो संधियों के आधार पर हुआ. इस बीच यह विवाद उठ खड़ा हुआ कि जापान ने ताइवान किसको दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि चीन में कम्युनिस्ट सत्ता में थे और ताइवान में कॉमिंगतांग का शासन था. माओ का मानना था कि जीत जब उनकी हुई है तो ताइवान पर उनका अधिकार है जबकि कॉमिंगतांग का कहना था कि बेशक चीन के कुछ हिस्सों में उनकी हार हुई है मगर वे ही आधिकारिक रूस से चीन का प्रतिनिधित्व करते हैं."

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Image caption चियांग काई शेक

डॉक्टर गीता कहती हैं कि यहीं से दो राजनीतिक इकाइयां अस्तित्व में आ गईं और वे दोनों आधिकारिक चीन होने का दावा करने लगीं.

वह बताती हैं, "1911 में कॉमिंगतांग ने देश का नाम रिपब्लिक ऑफ़ चाइना कर दिया था और 1950 तक यही नाम रहा. 1959 में कॉमिंगतांग ने ताइवान में सरकार बनाई तो उन्होंने कहा कि बेशक चीन के मुख्य हिस्से में हम हार गए हैं फिर भी हम ही आधिकारिक रूप से चीन का नेतृत्व करते हैं न कि कम्युनिस्ट पार्टी, इसलिए हमें मान्यता दी जाए.

उधर माओ ने कहा कि हमें आधिकारिक रूप से मान्यता मिलनी चाहिए. इस बीच कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों ने मांग उठाई कि देश का यह नाम कॉमिंगतांग का दिया हुआ है और अब वे ताइवान में जाकर खुद को रिपब्लिक ऑफ चाइना ही कह रहे हैं. ऐसे में उन्होंने अपनी सरकार बनाई और देश को नया नाम दिया- पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना."

इसके बाद से दोनों 'चाइना' खुद को आधिकारिक चीन बताते रहे और इसी आधार पर विश्व समुदाय से मान्यता चाहते रहे.

मान्यता की होड़

इस बीच दुनिया की सियासत भी तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. पहले ताइवान (रिपब्लिक ऑफ चाइना) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का भी हिस्सा था. शीतयुद्ध के दौरान ताइवान को अमरीका का पूरा समर्थन मिला हुआ था, मगर फिर हालात एकदम बदल गए.

जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर रवि प्रसाद नारायण बताते है कि ताइवान के लिए 1971 के बाद से चीजें बदलने लगीं. वह कहते हैं, "अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने चीन को पहचान दी और कहा कि ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से हटना होगा. 1971 से चीन यूएन सिक्यॉरिटी काउंसिल का हिस्सा हो गया और 1979 में ताइवान की यूएन से आधिकारिक मान्यता खत्म हो गई. तभी से ताइवान का पतन शुरू हो गया."

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Image caption पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और माओत्से तुंग

अमरीका ने क्यों बदला पाला

डॉक्टर रवि प्रसाद नारायण बातते हैं कि 1970 में आर्थिक प्रगति के बाद अमरीका नए बाजार तलाश रहा था. उस समय चीन की आबादी 60 करोड़ थी जबकि ताइवान की महज़ एक करोड़ के आसपास. ऐसे में अमरीकी कॉर्पोरेट चाहते थे कि अमरीका चीन को मान्यता दे. तो इस तरह से ताइवान यहां कमजोर पड़ गया.

हालांकि, डॉक्टर रविप्रसाद नारायण कहते हैं कि इसका ताइवान को फ़र्क नहीं पड़ा क्योंकि उसे पता था कि ऐसा होने वाला था.

आज स्थिति ऐसी है लगभग डेढ़ दर्जन छोटे-छोटे देश, जैसे कि हैती, पराग्वे और एल सल्वाडोर ही ताइवान को मान्यता देते हैं. जेएनयू के प्रोफेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि चीन की आक्रामक कूटनीति के कारण ताइवान को पहचानने वाले देशों की संख्या लगातार कम होती जा रही है.

वह कहते हैं, "70 के दशक में अमरीका के नेतृत्व में बहुत से देशों ने कम्युनिस्ट चीन से रिश्ते जोड़े. हमेशा से चीन की विदेश नीति में 'वन चाइना पॉलिसी' अहम रही है. चीन किसी भी देश के साथ किसी तरह से इनवॉल्व होता है तो उम्मीद करता है कि सामने वाला देश माने कि वह एक ही चीन को मान्यता देता है और वह है पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना. यही कारण है कि आज छोटे-छोटे देश रह गए हैं जो ताइवान को मान्यता देते हैं."

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दुनिया के ताइवान से संबंध

ऐसा नहीं है कि ताइवान दुनिया से पूरी तरह कट गया है और उपेक्षित हो गया है. कूटनीतिक तौर पर अकेला पड़ जाने के बावजूद ताइवान की गिनती एशिया के सबसे बड़े कारोबारी देश के तौर पर होती है. यह कंप्यूटर टेक्नॉलजी के उत्पादन के मामले में दुनिया का अग्रणी देश है और इसकी अर्थव्यवस्था भी बहुत मज़बूत है.

डॉक्टर गीता कोचर बताती हैं, "बेशक चीन अन्य देशों से व्यवहार करते समय यह मनवाता है कि वे वन चाइना में यकीन करते हैं, फिर भी कई देश हैं जो ताइवान से रिश्ते बनाना चाहते हैं. लेकिन वे देश दूतावास नहीं बनाते. उन्होंने रिलेशनशिप ऑफिसर या कल्चर का प्रमोशन करने वाले, कारोबार को बढ़ाने वाले या सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि बनाए हैं. डिप्लोमैटिक रिश्ते सिर्फ चीन से ही हैं."

प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि इसी तरह से बहुत सारे अंतरराष्ट्रीय संगठन और संस्थान ताइवान को अलग-अलग नामों से संबोधित करते हैं. कहीं इसे ताइवान कहा जाता है, कहीं ताइपे तो कहीं चाइनीज़ ताइपे. वह कहते हैं कि इस समय लगभग 80 देशों के ताइवान के साथ आर्थिक संबंध हैं, भले ही वे स्वतंत्र देश के रूप में उसे मान्यता नहीं देते.

पिछले दिनों भारत की एयर इंडिया को भी अपनी वेबसाइट पर ताइवान का नाम बदलकर ताइपे करना पड़ा था.

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चीन और ताइवान के आपसी रिश्ते

ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक और इंडस्ट्री साथ ही जीडीपी अच्छी है, इसी कारण कई देश इसके प्रति आकर्षित होते हैं. उधर चीन का प्रभाव भी पिछले कुछ दशकों में बढ़ा है. प्रोफेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि ताइवान और चीन के बीच व्यापारिक ही नहीं, सामाजिक संबंध भी गहरे हुए हैं.

वह कहते हैं, "दोनों के बीच सीधी वायुसेवा और समुद्री जहाजों के माध्यम से आवाजाही होती रहती है लेकिन कई बार आक्रोश नजर आता है. चीन के दूसरे बड़े नेता शाओ पिन ने 'वन कंट्री, टू सिस्टम' का विचार रखा था और इसी विचार के आधार पर हॉन्ग कॉन्ग और मकाओ को जोड़ा गया है. हॉन्ग कॉन्ग का अलग झंडा है, पुलिस अलग है, करंसी अलग है. मकाओ में भी काफी छूट है. मगर वे खुद को चीन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं. मगर ताइवान के साथ ऐसा नहीं है. चीन ऐसी ही व्यवस्था की बात ताइवान से करता रहा है मगर उसे कामयाबी नहीं मिली है."

प्रोफेसर स्वर्ण सिंह बताते हैं कि कॉमिंगतांग के ताइवान आने के बाद से लेकर 90 के दशक तक यहां पर चीन से आए नेताओं की लीडरशिप रही. जब सैन्य शासन हटा और लोकतात्रिक व्यवस्था हटी तो स्थानीय यानी ताइवान द्वीप के लोगों की लीडरशिप उभरी. उनका रुझान खुद को स्वतंत्र दिखाने रहता है, इसलिए कई बार तनाव उभरता है मगर चीन और ताइवान के बीच व्यापारिक, सामाजिक और संचार व यातायात के संबंध काफी बन चुके हैं.

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एक होने की संभावना कितनी?

चूंकि चीन का मानना है कि ताइवान को किसी भी रूप में अपने साथ मिलना चाहिए, ऐसे में क्या यह संभव है?

ताइवान में सात साल तक रह चुके डॉक्टर बद्रीप्रसाद नारायण बताते हैं, "ऐसा कैसे होगा? क्या वे सैन्य रूप से करेंगे या कोई और तरीका अपनाएंगे? कोई और तरीका अगर है तो वह स्पष्ट नहीं है. लोग कहते हैं कि आर्थिक रूप से एकीकरण हो जाएगा तो एक हो जाएंगे मगर ताइवान में लोकतंत्र है. यहां पर दो महत्वपूर्ण राजनीतिक दल हैं और उनके बीच लोकल बना मेनलैंडर की राजनीति चलती है. यानी ताइवान द्वीप के मूल लोग बनाम चीन से यहां आए लोग. यहां के लोग मेनलैंडर्स को कहते हैं कि ये बाहर से आए हैं."

डॉक्टर नारायण बताते हैं कि यह पेचीदा मुद्दा है क्योंकि वे ये भी जानते हैं कि एकीकरण होने से उन्हें कुछ लाभ नहीं होगा. हालांकि वह कहते हैं कि ताइवान के लोगों में चिंता भी है, "अपने अस्तित्व को लेकर ताइवान दुविधा में है. वे देखते हैं कि शी जिनपिंग जैसा शक्तिशाली नेता चीन में है तो कुछ भी हो सकता है. इनकी चिंता यह भी है कि हाल ही में वेटिकन का चीन के साथ समझौता हुआ है जिसके तहत उसे वहां चर्च स्थापित करने की इजाजत मिलेगी. अभी तक चर्च की मौजूदगी चीन में नहीं थी. मगर ताइवान में थी और यहां व्यवस्था ऐसी है कि घर में माता-पिता अगर बौद्ध हैं तो बच्चे ईसाई हैं. ताइवान के लोगों को लगता था कि वेटिकन हमारे साथ था, मगर अब वह भी चीन के साथ चला जाएगा तो हमारा कौन बचा?"

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मसले का हल क्या?

सवाल उठता है कि चीन और ताइवान के बीच ये जो दशकों पुराना खिंचाव चला रहा है, उसका हल क्या होगा. प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह मानते हैं कि पीपल टु पीपल कॉन्टैक्ट ही इन राजनीतिक दूरियों को खत्म कर सकता है.

वह कहते हैं, "विशेषज्ञ मानते हैं कि लोगों के लोगों से रिश्ते बनते हैं तो राज्य के राज्य से संबंधों का प्रभाव कम होता है. आने वाले समय में इस बात का महत्व बढ़ जाएगा कि लोग आपस में कैसे जुड़ते हैं. इससे देशों के आपकी संबंध प्रभावित होंगे और उन देशों को आपस के जटिल मुद्दों को सुलझाने में सुविधा मिलेगी."

चीन और ताइवान के बीच रिश्तों की कोई दूसरी मिसाल दुनिया में मौजूद नहीं है. दोनों ही देशों के नागरिकों की संस्कृति, भाषा और इतिहास एक है. लेकिन दो अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं की वजह से सत्तर साल पहले हुए अलगाव को एकजुटता में बदलना मुश्किल रहा है.

ताइवान लिबरल डेमोक्रेसी की हामी भरता है और चीन वन पार्टी सिस्टम वाला देश है. इस मिलन में यही सबसे बड़ा पेच है. और फिलहाल जिस तरह से चीन लगातार शक्तिशाली ढंग से उभर रहा है, उससे इस बात की संभावना कमजोर नजर आती है कि ताइवान को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रवैया बदलेगा.

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