व्लादिमीर पुतिन की ताक़त रूस की ताक़त कैसे बन रही

  • 29 नवंबर 2018
पुतिन इमेज कॉपीरइट Getty Images

रूस के क़रीब आज़ोव समंदर के पानी का अशांत होना कोई नई बात नहीं लेकिन रविवार को समंदर में हुई हलचल की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी.

अगले ही दिन हज़ारों नॉटिकल मील दूर न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक हुई. वहां अमरीकी राजदूत निकी हेली रूस को कटघरे में खड़ा कर रही थीं.

"रूस ने जो कोशिश की है, हम उसका विरोध करने के लिए एकजुट हैं. हम यूक्रेन की संप्रभुता और उसकी अतंरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सीमाओं की अखंडता का मजबूती से समर्थन करते हैं. हम रूस की उकसावे वाली कार्रवाई पर बातचीत करेंगे और रूस की ओर से प्रस्तावित एजेंडे के ख़िलाफ़ वोट करेंगे."

रूस-चीन की गहराती दोस्ती क्या भारत के लिए झटका है

आख़िर राष्ट्रपति पुतिन कभी पाकिस्तान क्यों नहीं गए

इमेज कॉपीरइट Reuters

विवाद क्यों हुआ?

अमरीका और दूसरे पश्चिमी देशों की नाराज़गी की वजह रविवार को यूक्रेन के तीन जहाजों के ख़िलाफ़ रूस की ओर से की गई कार्रवाई थी. रूस ने क्राइमिया के तट के क़रीब से गुजरते इन तीन जहाजों पर क़ब्ज़ा कर लिया और चालक दल के 23 सदस्यों को पकड़ लिया.

यूक्रेन और पश्चिमी देशों की आपत्ति के उलट रूस की दलील है कि यूक्रेन के जहाज अवैध रूप से उसके अधिकार वाले समुद्री इलाक़े में दाखिल हुए थे.

यूक्रेन और रूस के बीच विवाद नया नहीं है. साल 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद आज़ाद हुए यूक्रेन का झुकाव पश्चिमी देशों की तरफ़ है और रूस इसे ख़तरे के तौर पर देखता है.

साल 2014 में रूस ने क्राइमिया पर क़ब्ज़ा किया तब से दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण हैं.

रूस और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की जानकार प्रोफ़ेसर अनुराधा चिनॉय कहती हैं कि अर्से से चले आ रहे विवाद की वजह रूस की वो चिंताएं हैं जिन पर पश्चिमी देशों ने ध्यान नहीं दिया.

वो कहती हैं, "रूस की समझ ये है कि उसकी सीमाओं और नेटो के देशों के बीच अगर कोई कॉरिडोर नहीं होगा तो नेटो धीरे-धीरे उनको भी तोड़ देगा. जब उन्होंने सोवियत संघ को ख़त्म किया तो एक वादा लिया गया था कि नेटो उनकी सीमा तक आगे न आए. लेकिन पूर्व के देश धीरे-धीरे नेटो का हिस्से बन गए. फिर यूक्रेन में एक दक्षिणपंथी पार्टी आ गई जिसने एथनिक रूसी लोगों को पर दबाव डाला. क्राइमिया में रूसी अल्पसंख्यक थे. वहां अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक राजनीति शुरू कर दी गई. रूस इससे तंग हो गया."

रूस का यूक्रेन के जहाज़ों पर क़ब्ज़ा, रूसी दूतावास के बाहर प्रदर्शन

रूस और यूक्रेन के बीच झगड़े का कारण

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption यूक्रेन के राष्ट्रपति पेट्रो पोरोशेंको और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन

दुनिया में कहां खड़ा है रूस?

रूस और यूक्रेन के विवाद को मॉस्को में भारत के राजदूत रहे कंवल सिब्बल ने भी करीब से देखा और समझा है. वो भी उन पहलुओं की बात करते हैं, जिनका ज़िक्र पश्चिमी देशों की ओर से नहीं होता.

कंवल सिब्बल कहते हैं, "यूक्रेन में जो ऑरेंज रेवोल्यूशन हुआ उसका मक़सद क्या था? मकसद यही था कि लोकतंत्र को किसी तरह से रूस की परिधि में ले आएं और फिर ऐसा उदाहरण तैयार करें कि रूस में भी विद्रोह हो जाए. रूस का सिस्टम भी बदल जाए."

शीत युद्ध के दौर में सोवियत संघ महाशक्ति था लेकिन मौजूदा वक़्त में दुनिया के शक्ति केंद्र बदल गए हैं. चीन ने रूस को काफ़ी पीछे छोड़ दिया है और अमरीका के बाद दूसरे नंबर की स्थिति में आ गया है.

तीन साल पहले तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में रूस नौवें नंबर पर था. अब वो 12वें पायदान पर फिसल गया है.

स्वास्थ्य और शिक्षा की ज़रूरतों के लिहाज से उसके संसाधन घट रहे हैं. रूस में जोड़-तोड़ा वाला पूंजीवाद, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी बढ़ने की चर्चा लगातार होती है.

आख़िर पुतिन को कोई चुनौती क्यों नहीं दे पाता?

पुतिन एक ऐसा 'माचो मैन' जो किसी से डरता नहीं!

इमेज कॉपीरइट Getty Images

रूस का बढ़ता असर

साल 2000 से कभी राष्ट्रपति और कभी प्रधानमंत्री के रूप में देश की अगुवाई कर रहे व्लादिमीर पुतिन ने देश को एकजुट किया है लेकिन आर्थिक मोर्चे पर दिक्क़तें बढ़ रही हैं.

तमाम दिक्क़तों के बाद भी रूस ख़ुद को महान शक्ति के तौर पर देखता है. सीरिया की जंग से लेकर तेल को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले खेल तक रूस का दबदबा बढ़ रहा है.

भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं, "रूस का प्रभाव तो बढ़ रहा है. ये पक्की बात है. उन्होंने सीरिया में जो हस्तक्षेप किया, उससे ये संकेत मिला कि रूस के पास आत्मविश्वास है. कोल्ड वॉर की सारी पॉलिटिक्स ये थी कि रूस को किसी तरह मध्य पूर्व से हटाया जाए. उसे लेकर भी हम देखें तो ये तो ज़ाहिर है कि रूस अब मध्य पूर्व में एक प्लेयर बन गया है, जिसको नज़रअंदाज नहीं कर सकते."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
रूस के ग़लत दावों पर बीबीसी की पड़ताल

कंवल सिब्बल कहते हैं कि सीरिया को लेकर भले ही रूस की हर बात न मानी जाए लेकिन उसके बिना सामाधान मुमकिन नहीं है. इराक़ में भी रूस का प्रभाव बढ़ा है. सीरिया में एक साथ दिखने वाली रूस, ईरान और तुर्की की तिकड़ी के साथ इराक़ भी जुड़ गया है. सिब्बल याद दिलाते हैं कि अफ़गानिस्तान में भी रूस का असर बढ़ रहा है.

सिब्बल कहते हैं, "अफ़गानिस्तान में रूस पहलकदमी कर रहा है. तालिबान को शरीक कर रहा है. मॉस्को में कॉन्फ्रेंस कर रहा है. अमरीकी दूतावास ने भी इसमें हिस्सा लिया. हमने (भारत ने) भी हिस्सा लिया. तो ये भी बताता है कि उनके पास आत्मविश्वास है और उनका जियो पॉलिटिकल दायरा बढ़ गया है."

इमेज कॉपीरइट AFP

अमरीका ग़लतियों से रूस को फ़ायदा

राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि घरेलू चुनौतियों में घिरे और आर्थिक तौर पर कमज़ोर दिखने वाले रूस का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाने में अमरीका और ट्रंप प्रशासन की अहम भूमिका है.

ईरान से परमाणु समझौता ख़त्म करने के अमरीका के एकतरफ़ा फ़ैसले ने पश्चिमी देशों को नाराज़ किया.

अमरीका और चीन के बीच छिड़े ट्रेड वॉर की वजह से चीन और रूस के रिश्ते गहरे हो रहे हैं. इनके बीच सैन्य और आर्थिक साझेदारी भी बढ़ रही है. समाचार एजेंसी शिन्हुआ के मुताबिक़ रूस में साल 2017 में चीन का प्रत्यक्ष निवेश 72 फीसद बढ़ा है. फ़िलहाल चीन सबसे ज़्यादा तेल रूस से ख़रीदता है.

इमेज कॉपीरइट Getty Images

पास आ रहे हैं रूस-चीन

अनुराधा चिनॉय दोनों देशों के बीच गहराती दोस्ती की वजह बताती हैं.

"रूस की चीन के साथ दोस्ती बढ़ रही है. दोनों के बीच एक तरह की रणनीतिक समझ है. रूस को लगता है कि उनकी पूर्वी सीमा सुरक्षित है और गठबंधन भी है. उनकी ये भी समझ है कि सीरिया में पश्चिमी देश ख़ासकर अमरीका टेररिस्ट किस्म के लोगों को आगे बढ़ा रहा है."

रूस रणनीतिक संबंधों के ज़रिए आर्थिक स्थिति को भी सुधारने में लगा है. दुनिया में सबसे ज़्यादा तेल का उत्पादन रूस में ही होता है. कंवल सिब्बल कहते हैं कि वो दूसरे देशों की हथियार ज़रूरतें भी पूरी कर रहा है.

"रूस की दो तीन ताक़त हैं. पहली तेल और ऊर्जा के क्षेत्र में. दूसरा है रक्षा क्षेत्र. रूस कई देशों को हथियार बेच रहा है. भारत के साथ तो ख़ास रिश्ता है. वियतनाम, मिस्र और सऊदी अरब से भी उनकी बातचीत चली है. तुर्की से भी बातचीत चली लेकिन अभी तुर्की के साथ एस-400 पर आख़िरी फ़ैसला नहीं हुआ है. वो चीन को भी काफ़ी हथियार दे रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दबदबे के लिए ये उनका पुराना औजार है."

रूस के बढ़ते दबदबे की कहानी पर उस वक़्त दाग़ दिखते हैं जब अमरीका और पश्चिमी देश उस पर दूसरे देशों में दख़लंदाज़ी करने और उन्हें कमज़ोर करने की कोशिश का आरोप लगाते हैं.

जॉर्जिया और यूक्रेन के साथ विवाद को लेकर रूस को आरोपों को सामना करना पड़ता है. साल 2016 में अमरीका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में रूस पर दख़लंदाज़ी का आरोप लगा. इस साल ब्रिटेन में रूस के पूर्व जासूस और उनकी बेटी पर नर्व एजेंट से हमला हुआ तो भी रूस पर आरोप लगे. रूस इन सभी आरोपों को ग़लत बताता रहा है.

कंवल सिब्बल को भी लग़ता है सिर्फ़ रूस को ग़लत ठहराना ठीक नहीं होगा.

वो कहते हैं, "अमरीका और यूरोप जितना हस्तक्षेप दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में करते हैं, उनके मुक़ाबले अगर रूस हस्तक्षेप करता है तो बहुत कम करता है. ये कहना कि उन्होंने अमरीकी चुनाव में हस्तक्षेप किया, मैं रूस में राजदूत था, मैं जानता हूं कि ये (पश्चिमी देश) पुतिन के ख़िलाफ़ और रूस की घरेलू राजनीतिक में कितना हस्तक्षेप कर रहे थे."

अमरीकी चुनाव में कथित रूसी दख़ल पर दिए बयान से पलटे ट्रंप

इमेज कॉपीरइट EPA

कैसे होंगे आने वाले दिन

रूस को लेकर अमरीका और पश्चिमी देशों की नाराज़गी बढ़ रही है और रूस और पुतिन के लिए आने वाले दिन मुश्किल बताए जा रहे हैं.

लेकिन अनुराधा चिनॉय की राय अलग है. वो कहती हैं, "अब रूस में राष्ट्रवाद बढ़ेगा. इससे पुतिन के हाथ मजबूत होंगे. वो कहेंगे कि पश्चिमी देश हम पर दबाव डाल रहे हैं. इसका मतलब आप (नागरिक)अपने अधिकार मत लीजिए. अपने राज्य को बचाने की कोशिश कीजिए. संप्रभुता सबसे अहम है."

कंवल सिब्बल भी ऐसी ही राय रखते हैं. वो कहते हैं, "एक बात तो स्पष्ट है कि पुतिन की लोकप्रियता अब भी बहुत है. पिछले दिनों लोग कह रहे थे कि उनकी लोकप्रियता कम हो गई है. ये कह सकते हैं कि रूस की कामयाबी पुतिन की रणनीति और विदेश नीति का असर है. देखिए आज वर्ल्ड स्टेज पर कोई नेता अगर परिपक्व है तो उसमें पुतिन बिल्कुल शामिल हैं."

यानी पुतिन का रूस भले ही मुश्किलों के भंवर में डूबता-उतरता सा दिखे. विश्लेषकों की राय में दुनिया में उसका दबदबा डंके की चोट पर बढ़ रहा है.

रूस 25 सालों में कहां से कहां तक पहुँचा?

कैसी है पुतिन के रूस में लोगों की जिंदगी?

वो सात कारण जिससे रूस में पुतिन बने सबसे ताक़तवर

पुतिन के रूस में कितनी सुरक्षित हैं महिलाएं

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार