ईरान की बेक़रारी, तेल खरीदता रहे भारत

  • 2 दिसंबर 2018
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अमरीकी विदेश नीति में एनर्जी (ऊर्जा) हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण फ़ैक्टर रहा है.

तेल और गैस के बाज़ार में जो कुछ भी चल रहा होता है, वो इसके उत्पादन और खपत करने वाले देशों की विदेश नीति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है.

ऐसा कोई भी विवाद जो तेल और गैस के उत्पादन, आपूर्ति, खपत और बाज़ार तक का परिवहन खर्च को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है, नए क्षेत्रीय और विश्वस्तरीय गुट और संगठन के अस्तित्व में आने का कारण बनता है.

ये क्षेत्रीय और वैश्विक विवादों को हल करने और तेल और गैस के उत्पादन के वैकल्पिक रास्ते की तलाश की दिशा में फ़ैसले लेता है.

वेनेज़ुएला और ईरान के ख़िलाफ़ पाबंदियों ने अमरीका को अपने एलएनजी के लिए अधिक से अधिक बाज़ार हासिल करने का अवसर प्रदान किया है.

ईरान के ख़िलाफ़ दूसरे चरण की पाबंदी और अमरीका की सऊदी अरब और रूस के साथ मिलकर अपने-अपने तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी इन तीनों के साझा मक़सद की झलक देता है.

ओबामा प्रशासन के दौरान पाबंदी

तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के शासनकाल में ईरान पर लगाई गई पाबंदी का मुख्य लक्ष्य था ईरान के तेल निर्यात में कमी लाना.

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और बेचे गए तेल के पैसे की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सिस्टम के माध्यम से ईरान को आवाजाही पर रोक लगाना.

ओबामा प्रशासन ने पहली बार ईरान की 'स्विफ्ट' (सोसाइटी फ़ॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्यूनिकेशन) द्वारा वित्तीय लेन देन की संभावनाओं को सीमित किया.

फिर बाद में पता चला कि ईरान के लिए 'स्विफ्ट' के माध्यम को अवरुद्ध करने से उसके ऊर्जा उद्योग पर भारी असर पड़ा है.

क्योंकि इसके बाद ईरान जिसको भी जितना तेल बेचे उसको तेल के बदले पैसा मिलना बंद हो गया.

ईरान को अपने आर्थिक विकास और क्षेत्र में सियासी दबदबा बरक़रार रखने के लिए तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल्स की बिक्री से हासिल होने वाले पैसे की सख़्त ज़रूरत रही है.

ओबामा सरकार के दौरान की पाबंदी ने ईरान के तेल निर्यात में कमी के साथ-साथ उसके एलएनजी के तमाम प्रोजेक्ट को भी बीच में ही अधूरा रोक दिया और ईरान एलएनजी के बाजार में अपनी भागीदारी हासिल नहीं कर पाया.

ईरान की योजना थी कि यूरोप को एलएनजी निर्यात करके उसके प्राकृतिक गैस के बाजार में अपना क़दम जमाये और इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए वो ओमान के एलएनजी संयंत्र से अपनी ज़रूरत भर की एलएनजी पाइपलाइन द्वारा हासिल करना चाहता था लेकिन पाबंदी की वजह से ये पाइपलाइन पूरी नहीं हो पाई.

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ईरान की एक योजना ये भी थी कि विशेष प्रकार के पानी जहाज से एफ़एलएनजी (फ़्लोटिंग लिक्विफ़ाइड नैचुरल गैस) हासिल करके एलएनजी का उत्पादन करे मगर पाबंदी ने ये रास्ता भी बंद कर दिया क्योंकि इसके लिए ज़रूरी टेक्नॉलॉजी हासिल करने के लिए दूसरे देशों से समझौता नहीं हो पाया.

परमाणु करार से अमरीका का बाहर हो जाना

राष्ट्रपति ट्रंप का ईरान के परमाणु करार से बाहर होने और ईरान के ऊर्जा उद्योग पर नई पाबंदी लगाने का एक सबसे बड़ा लक्ष्य ये था कि अपनी ऊर्जा निर्यात के लिए ज़रूरी माहौल बनाया जा सके और अमरीका के ऊर्जा उद्योग को मज़बूती प्रदान करने के लिए सहयोग दिया जा सके.

अमरीकी एलएनजी के निर्यात के लिए नए बाज़ार की उपलब्धि और अब तक ईरान का तेले और गैस खरीदने वाले देशों के बीच अपने एलएनजी के खरीदार की तलाश भी ईरान पर अमरीका द्वारा नई पाबंदी का एक लक्ष्य था.

साल 2018 में अमरीका ने रोज़ाना तीन मिलियन बैरल से भी अधिक तेल और गैस निर्यात किया है. उधर, दक्षिण कोरिया ने 60 फ़ीसदी से ज़्यादा ईरानी तेल आयात किया.

ओबामा प्रशासन के दौर में अमरीका दक्षिण कोरिया को अधिक एलएनजी निर्यात नहीं कर सका था.

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अमरीका अब दक्षिण कोरिया को अपने एलएनजी का निर्यात बढ़ाते हुए ईरान के तेल और गैस के निर्यात की मात्रा में कमी लाना चाहता है.

और इस तरह ईरान पूर्वी एशिया में अपना एक बड़ा खरीदार खो सकता है.

एक ध्यान देने वाली बात ये है कि ईरान के हल्के कच्चे तेल की केमिकल प्रोपर्टी अमरीका के कच्चे तेल की रासायनिक विशेषता से भिन्न है.

अगर ईरान के कच्चे तेल की विशेषता अमरीका के कच्चे तेल (शेल तेल) से मिलती-जुलती होती तो इसकी प्रबल संभावना थी कि अमरीका का कच्चा तेल विश्व बाजार में एक सीमा तक ईरान के कच्चे तेल का पर्याय बन जाता.

अमरीका ईरान के तेल निर्यात को शून्य तक पहुंचाना चाहता था लेकिन अमरीका द्वारा ईरान के 8 बड़े तेल आयातक देशों को दी गई छूट से अब ईरान का निर्यात जारी रह सकेगा.

और इस तरह ईरान अपने साल 2025 के लिए निर्धारित विकास योजना के मुताबिक़ रोज़ाना पांच करोड़ सात लाख बैरल तेल का उत्पादन कर सकेगा जो कुल विश्व तेल उत्पादन का सात फ़ीसदी होगा.

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ईरान के तेल उद्योग पर पाबंदी ईरान के बड़े तेल खरीदार देशों की नीति पर असर डाल सकता है और साथ ही ऊर्जा के बाजार में रूस ईरान का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी बनकर खड़ा हो सकता है.

चीन की ऊर्जा नीति

ईरान के तेल का एक बड़ा खरीदार चीन साल 2017 में रोज़ाना लगभग सात लाख अस्सी हजार बैरल तेल ईरान से आयात करता था.

चीन की विकासोन्मुख अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षित स्रोतों से आवश्यक ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति और ऊर्जा के मुख्य स्रोत में विविधता ही चीन की राष्ट्रीय ऊर्जा नीति का केंद्रीय बिंदु है.

ईरान पर पाबंदी से पहले तक चीन की कंपनियां ईरान के ऊर्जा उद्योग में काफ़ी सक्रिय थीं.

ईरान के ऊर्जा उद्योग में चीन की व्यापक मौजूदगी और इसके द्वारा अपने तेज़ औद्योगिक विकास के लिए भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति की गारंटी ने ही चीन को मध्यपूर्व में एक प्रभावशाली भूमिका निभाने में सहयोग दिया है और साथ ही चीन के सामरिक महत्व के लक्ष्य को पूरा किया है.

ऊर्जा स्रोत और ऊर्जा मार्ग, जैसे हरमुज़ जलडमरू के रास्ते पर अधिपत्य के लिए हमेशा से बड़ी शक्तियों का ध्यान आकर्षित किया है, और करता रहा है.

अपनी अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा और विदेश नीति के मद्देनज़र चीन ईरान से तेल की खरीद जारी रखना चाहता है लेकिन वो ऐसे देशों से तेल और गैस के आयात को तरजीह देना चाहेगा जिसका अमरीका के साथ कोई बड़ा विवाद और तनाव न हो.

भारत का बाज़ार

भारत ईरान का दूसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है.

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अप्रैल से अगस्त महीने के बीच भारत ने रोज़ाना छह लाख अट्ठावन हजार बैरल तेल ईरान से आयात किया है और साथ ही ईरान के गैस और तेल के प्रोजेक्ट में भागीदारी भी करना चाहता है.

सऊदी अरब भारत के ऊर्जा बाजार में सक्रिय कूटनीति के बल पर भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने के लिए निवेश भी कर रहा है ताकि भारत के ऊर्जा बाजर में ईरान की भूमिका को कम किया जा सके.

साल 2018 की शुरुआत में सऊदी अरब की 'आरामको' कंपनी ने भारत के रत्नागिरि तेलशोधक कारखाने का 50 फ़ीसदी शेयर 44 बिलियन डॉलर में खरीदा जो रोज़ाना 60 मिलियन टन कच्चे तेल को साफ़ करने की क्षमता रखता है.

भारत अमरीका से तेल आयात करता रहा है. भारत ने जून में अमरीका से रोज़ाना लगभग दो लाख अट्ठाइस हजार बैरल तेल आयात किया था.

उधर, अमरीकी तेल मंत्री का कहना है कि आनेवाले दिनों में अमरीका भारत का तेल निर्यात बढ़ाएगा. दोनों देशों ने एलएनजी से संबंधित एक 20 वर्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया है जिसके तहत अमरीका भारत को एलएनजी निर्यात करेगा.

भारत को अमरीका के तेल और एलएनजी की निर्यात में बढोतरी और ईरान पर जारी पाबंदी के कारण भारत की ईरान से तेल खरीद में कमी आएगी.

भारत में अपने तेल बाज़ार को बनाए रखने के लिए ईरान ने कई प्रलोभन दिए हैं जैसे तेल के वाहन खर्च में कमी, ईरानी तेल टैंकरों द्वारा भारत को तेल की सप्लाई, तेल टेंकरों के बीमा खर्च में कमी लाना.

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लेकिन अब देखना है कि ये प्रलोभन किस हद तक भारत में ईरान के ऊर्जा बाजार को बचाए रखने में कारगर साबित होते हैं.

यूरोपीय संघ

अपने लिए ऊर्जा की सुरक्षित आपूर्ति यूरोपीय संघ की एक बुनयादी विदेश नीति रही है. यूरोपीय देश रोज़ाना लगभग पांच लाख बैरल तेल ईरान से आयात करते हैं.

ओबामा प्रशासन द्वारा लगाई गई पाबंदी से पहले ईरान ने योजना बनाई थी कि एक निश्चित समय के अंदर अपने यहां ज़रूरी बुनियादी ढांचा तैयार कर यूरोपीय संघ को गैस निर्यात करे लेकिन ऊर्जा के घरेलू खर्च में बढ़त और तेल निकाले जाने वाले सक्रिय मैदानों में आवश्यक निवेश की कमी के कारण ये संभव न हो सका.

जो विदेशी कंपनियां ईरान के तेल और गैस से संबंधित प्रोजेक्ट में सक्रिय थीं, पाबंदी के बाद वो भी बाहर हो गईं.

फिर यूरोप को अतिरिक्त गैस की ज़रूरत भी नहीं रही और साथ ही गैस की क़ीमत में कमी कुछ ऐसे कारक थे जिसके कारण ईरान का यूरोप को तेल और गैस निर्यात करने का प्रोजेक्ट सफल न हो सका.

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रूस की नज़र

रूस विश्व का एक बहुत बड़ा तेल और गैस उत्पादक देश है जो ईरान पर पाबंदी से बहुत फायदे में है.

साल 2017 में ईरान ने अपने आबान और पश्चिमी पाएदार नाम के दो तेल के मैदानों के विकास के लिए रूसी कंपनी ज़रुबेज़नेफ़त के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था.

ईरान के एक नेता अली अकबर विलायती ने इस साल जुलाई में अपने रूस यात्रा के दौरान व्लादिमीर पुतिन के हवाले से कहा था कि रूस ईरान के तेल और गैस के क्षेत्र में ईरान के साथ अपने सहयोग को जारी रखेगा और साथ ही ईरान के इस क्षेत्र में 50 बिलियन डॉलर का निवेश भी करेगा.

उन्होंने कहा था कि रूसी कंपनियां ऐसे क्षेत्रों में निवेश कर रही हैं जिन क्षेत्रों का उत्पादन रूस के अपने टार्गेट मार्केट (लक्षित बाज़ार) के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करेगा.

लेकिन इसके साथ ही यूरोपीय टेक्नॉलॉजी के मुक़ाबले रूसी टेक्नॉलॉजी की गुणवत्ता का सवाल भी सामने है.

ईरान के तेल और गैस निर्यात का भविष्य

शेल गैस की क्रांति ने अमरीका को ऊर्जा आयातक देश से प्राकृतिक गैस और एलएनजी निर्यातक देश में बदल दिया है.

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शेल गैस ने न केवल अमरीका की अर्थव्यवस्था में चमक पैदा की है बल्कि अमरीका की विदेश नीति के लिए ये एक कारगर हथियार साबित हुआ है.

शेल तेल के उत्पादन में वृध्दि के कारण भविष्य में ओपेक को चुनौती का सामना करना पड़ सकता है.

ईरान पर ऊर्जा पाबंदी और अब तक के ईरान के तेल खरीदारों को अमरीकी तेल और गैस का निर्यात वास्तव में ईरान पर अमरीकी आर्थिक और राजनीतिक दबाव का डंडा या प्रभाव उत्पन्न करने का साधन है.

ईरानी अर्थव्यवस्था की तेल की आय पर निर्भरता और अमरीका के कारण इसके तेल निर्यात में कमी से क्षेत्र में ईरान के प्रभाव में भी कमी आई है जो अमरीकी ऊर्जा निर्यात के लिए अनुकूल स्थिति पैदा करेगा.

ईरान के तेल निर्यात में कमी के साथ-साथ तेल की क़ीमत में कमी भी राजनीतिक वैधता के लिये ख़तरा है.

ईरान के तेल निर्यात में कमी पैदा करना उत्तरी अमरीका में ऊर्जा उत्पादन में बढ़ोतरी के बिना लगभग असंभव है.

ईरान बिना विदेशी निवेश और टेक्नॉलॉजी के अपने तेल के उत्पादन और निर्यात में बढोतरी नहीं ला सकता है.

ईरान के विनिमय, विदेशी मुद्रा भंडार और राजस्व में कमी उसकी अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालेगा.

अगर ईरान प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में पर्याप्त उत्पादन नहीं कर सकता है और अपने घरेलू खपत को भी कम नहीं कर सकता है तो वो अपने तुर्की के बाज़ार को भी खो सकता है जो उसका अब एकमात्र बड़ा बाजार रह गया है, क्योंकि तुर्की अपने ऊर्जा स्रोत में विविधता लाते हुए अमरीका और क़तर से एलएनजी की खरीद बढ़ाने लगा है.

ऐसा लगता है कि पाबंदी और अमरीकी एलएनजी के निर्यात में बढ़ोतरी से ओपेक देशों में ईरान पर सबसे अधिक असर पड़ेगा.

अगर पाबंदी और अमरीका की ऊर्जा निर्यात उसकी विदेश नीति के एक हथियार के रूप में सफल हो जाती है तो भविष्य में अमरीका यही हथियार दूसरे तमाम देशों के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर सकता है.

ऐसा लगता है कि अगर ईरान अपनी विदेश नीति में बदलाव नही लाता है और ऊर्जा से संबंधित सक्रिय कूटनीति में कमजोर रह जाता है तो आनेवाले सालों में उसे अपने तेल और गैस के उत्पादन और निर्यात में कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा.

इससे ईरान की आर्थिक स्थिति और क्षेत्र में उसके असर को नुक़सान पहुंचेगा.

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