#100WOMEN खाना पकाने और सफाई ने किस प्रकार ‘एक हिंसक व्यक्ति को बदल दिया’

  • 15 दिसंबर 2018
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Image caption जीन पियरे

घरेलू हिंसा में कमी लाने के लिए रवांडा में एक ग्रासरूट्स इंटरवेंशन कार्यक्रम में पुरुषों को घरेलू काम करना सिखाया जा रहा है.

हाल में एक अध्ययन में सामने आया है कि इस पहल का समाज पर सकारात्मक असर पड़ रहा है.

मुहोज़ा जीन पियरे अक्सर पत्नी को पीटते थे.

शादी का अर्थ उनके लिए सिर्फ़ इतना ही था कि पत्नी का काम उनके बच्चे पैदा करना और उनकी देखभाल करना है.

उन्होंने कहा, "मैं अपने पिता का अनुसरण कर रहा था. मेरे पिता घर में कुछ नहीं करते थे."

"जब मैं घर आता और कोई काम अधूरा पाता, तो उसे डांटता था."

"मैं उसे आलसी कहता, उसे बेकार बताता और अपने माता-पिता के घर वापस जाने को कहता था."

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ग्रासरूट इंटरवेंशन कार्यक्रम

लेकिन फिर कुछ बदलाव आया. उन्होंने खाना पकाना और सफाई करना सीखा.

ये रवांडा के पूर्वी प्रांत में मुलियर स्थित उनके गांव में एक ग्रासरूट इंटरवेंशन कार्यक्रम का हिस्सा था, जिसमें पुरुषों को बच्चों की देखभाल समेत घरेलू कार्यों के लिए प्रोत्साहित किया जाता था.

जीन पियरे ने बताया कि 'बांदरबेरेहो' नामक इस कार्यक्रम ने उनका व्यवहार बदलने में मदद की.

वो उन कक्षाओं में जाते थे, जिनमें खाना पकाने और सफ़ाई करने से लेकर लिंग आधारित पारम्परिक भूमिकाओं को बदलने के बारे में सिखाया जाता था.

उन्होंने बताया, "वो हमसे पूछते थे कि क्या कोई पुरुष घर में झाड़ू लगा सकता है और हम कहते थे, हां, वो झाड़ू लगा सकता है."

"और फिर वो हमसे पूछते थे, 'आपमें से किसने ऐसा किया है?' और कोई इस सवाल का जवाब नहीं देता था."

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Image caption जीन पियरे और उनकी पत्नी की 10 साल पहले शादी हुई थी

'असली पुरुष को खाना नहीं पकाना चाहिए'

'बांदरबेरेहो' के आयोजक जीन पियरे को वो काम करना सिखाते, जिनके बारे में पहले उसका मानना था कि ये काम पत्नी को ही करना चाहिए.

उसने बताया, "हम घर जाकर वो कार्य करने की कोशिश करते."

"फिर हम गवाह के साथ वापस प्रशिक्षण केन्द्र जाते, जो इस बात की तस्दीक करता कि उसने हममें कुछ बदलाव पाया है."

"मैं खाना बनाना जानता हूं. बच्चों के कपड़े धोना जानता हूं. मैं केले तोड़ना जानता हूं, मुझे ये भी मालूम है कि किस प्रकार सूखे कसावा को पीसकर आटा तैयार किया जाता है."

हालांकि ये बदलाव आसान नहीं था, क्योंकि जीन पियरे के दोस्त उन्हें घरेलू कार्य करने से हतोत्साहित करते. वो उससे कहते थे, 'किसी असली पुरुष को खाना नहीं पकाना चाहिए.'

वो कहते हैं, "मेरे परिवार और दोस्तों ने कहना शुरू किया कि मेरी पत्नी ने निश्चित रूप से मुझे कोई नशीली दवा दी है. वो कहते कि किसी पुरुष को सड़क पर ईंधन की लकड़ी नहीं ढोना चाहिए. ये काम स्त्री के वश में रहने वाले पुरुषों का है."

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क्या हुआ फ़ायदा?

लेकिन जब जीन पियरे ने परिवार के लिए इन कार्यों के फायदे देखे, तो इन्हें करना जारी रखा.

उन्होंने कहा कि इससे बच्चों के साथ उसकी आत्मीयता बढ़ी और उनकी पत्नी ने केले की बेचने शुरू कर दिए, जिससे परिवार की आमदनी बढ़ी.

उन्होंने कहा, "मेरी पत्नी का मेरे प्रति व्यवहार पहले से बदल गया है."

"पहले वो मुझसे बुरा व्यवहार करती थी, क्योंकि मैं भी उसके साथ दुर्व्यवहार करता था. लेकिन अब हम विचार-विमर्श के ज़रिये कोई कार्य करते हैं."

"मैंने उसे आज़ाद छोड़ दिया है. अब वो भी काम करती है और मैं भी काम करता हूं, जबकि पहले मैं मानता था कि उसे घर पर रहना चाहिए और जब भी मुझे ज़रूरत पड़े उसे उपलब्ध होना चाहिए."

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डर और आज़ादी

जीन पियरे की पत्नी मुसाबिमाना डेलफिन का कहना है कि उन्हें आज़ादी नहीं थी और वो डरकर जीती थीं.

उन्होंने कहा, "कभी-कभी मुझे लगता कि मैं सिर्फ़ एक मजदूर हूं और फिर मुझे याद आता कि मजदूर की भी एक पगार होती है."

"मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक महिला के पास अपना धन होगा. क्योंकि मैंने ऐसा कोई काम करने का नहीं सोचा था, जिससे मैं अपने लिए धन इकट्ठा कर सकूं."

"अब मुझे घर में आज़ादी है. मैं बाहर जाती हूं और दूसरों की तरह धन कमाने के लिए काम करती हूं."

डेलफिन सुबह पांच बजे बाज़ार में केले बेचने के लिए निकल जाती है, जबकि उस वक्त जीन पियरे घर पर रहता है और अपने चार बच्चों की देखभाल करता है.

उन्होंने कहा, "मैं निश्चिंत होकर घर लौटती हूं और मुझे खाना तैयार मिलता है."

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Image caption जीन पियरे

महिला-पुरुष में बराबरी

इस योजना का कार्यक्रम मूल रूप से लैटिन अमेरिका में मेनकेयर नामक वैश्विक पितृत्व अभियान द्वारा तैयार किया गया था. इस संस्था का मानना है कि असली बराबरी तभी आएगी, जब पुरुष बच्चों की देखभाल और घरेलू कार्यों में आधा काम खुद करेंगे.

इस योजना में भाग लेने वाले दम्पतियों के एक अध्ययन में पाया गया कि रवांडा में बच्चों की देखभाल करने का सबक दो साल तक सीखने वाले पुरुषों में महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा में उन पुरुषों की तुलना में कमी आई, जिन्होंने प्रशिक्षण नहीं लिया था.

लेकिन अध्ययन में ये भी सामने आया कि जिन महिलाओं के पतियों ने इस प्रशिक्षण में हिस्सा लिया, वैसी तीन में से एक महिला को अब भी अंदरूनी मामलों में हिंसा की शिकायत है.

The National Institute of Statistics of Rawanda की साल 2015 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के क़रीब 52 फ़ीसदी पुरुषों ने माना कि उन्होंने कभी ना कभी अपनी पत्नी के साथ हिंसा की है.

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'शादी के 10 साल बाद हनीमून'

देश में इस कार्यक्रम को संचालित करने वाला The Rwanda Men's Resource Centre अब चाहता है कि 'बांदरबेरेहो' को देश की सरकार अधिक से अधिक समुदायों में लागू करे.

केन्द्र के अध्यक्ष फिदेल रुतायिसायर ने कहा, "हमारी सामाजिक परम्पराएं अब भी नकारात्मक हैं, पुरुषत्व के बारे में नकारात्मक सोच है और सांस्कृतिक रुकावटें हैं. ये रवांडा में महिलाओं के प्रति हिंसा की ऊंची दर के मुख्य कारण हैं."

"पारम्परिक रूप से यहां पुरुष बच्चों की देखभाल नहीं करते. यौन संबंध, संसाधनों तथा फ़ैसले लेने पर अब भी पुरुषों का एकाधिकार है."

"जब पुरुष सक्रिय रूप से बच्चों की देखभाल करते हैं तो विपरीत लिंग के प्रति उनका व्यवहार सकारात्मक रूप से बदलता है और वो लिंग के आधार पर बराबरी का महत्व समझते हैं."

डेलफिन और जीन पियरे के लिए ये कार्यक्रम न सिर्फ़ उनके परिवार, बल्कि उनके पूरे समाज के लिए फायदेमंद रहा है.

जीन पियरे का कहना है, "शादी के 10 वर्षों बाद अब हम हनीमून मना रहे हैं."

"जब कभी पड़ोस में संघर्ष होता है या सुरक्षा से जुड़ा कोई मुद्दा उभरता है तो हमारी सोच का काफ़ी सम्मान किया जाता है. क्योंकि वो देखते हैं कि हमारे घर में कोई समस्या नहीं है."

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