भारत-पाक में पराली जलाना बंद कर देंगे किसान?

  • 31 दिसंबर 2018
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मुबश्शिर अहमद ने चावल की फसल उठाई, तो गेंहू बोने का वक़्त सिर पर था. मगर उनके खेतों में अब तक चावल की फसल खड़ी थी. उस पर पराली या भूसा बिखरा पड़ा था. क्या करते, उन्होंने खेतों में आग लगा दी.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने बताया कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में ज़िला नारवाल के उनके उस गांव में तक़रीबन हर किसान यही तरीक़ा अपना रहा है.

"काटें नहीं तो क्या करें? वरना गेहूं की कटाई के वक़्त हसिए से हाथ कट जाते हैं."

क्या ये ठीक है और गेंहू की फसल की तैयारी के लिए पराली को ख़त्म करना ज़रूरी होता है. चावल की खेती के ज़्यादातर इलाक़े पंजाब प्रांत के गुजरांवाला डिवीज़न में आते हैं. इन तमाम इलाक़ों में आग लगाकर ही चावल के पराली को ख़त्म किया जाता है.

तो इस कारण इससे भारी मात्रा में धुआं पैदा होता है. पंजाब के कई इलाक़ों के साथ-साथ लाहौर में बड़े पैमाने पर होने वाले प्रदूषण या स्मॉग को इसकी वजह बताया जाता है.

बीते कई सालों से धुंध और धुंआ इस क़दर सामने आया है कि इसे पंजाब का पांचवां मौसम कहा जाने लगा है. ये मौसम ठंड की शुरुआत के साथ ही आता है और हज़ारों लोग इससे प्रभावित होकर अस्पताल तक पहुंच जाते हैं.

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Image caption इस मौसम में भारत की राजधानी दिल्ली भी स्मॉग की क़ैद में रहती है

भारत में भी क्या यही दोषी है?

ज़िला नारवाल के इस इलाक़े से महज़ चंद किलोमीटर के फ़ासले पर सीमा के उस पार भारतीय पंजाब है. वहां भी ज़मीन उतनी ही उपजाऊ है और वहां भी किसान कृषि के यही तौर-तरीक़े अपनाते हैं.

वास्तव में भारत में चावल की खेती का इलाक़ा पाकिस्तान के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बड़ा है इसलिए वहां पराली ज़्यादा जलती है तो धुआं भी ज़्यादा उठता है. भारत में स्मॉग का मुद्दा कहीं ज़्यादा तेज़ी से उठ रहा है. स्मॉग के मौसम में भारत की राजधानी दिल्ली में सांस तक लेना मुश्किल हो जाता है.

वहां भी बड़ा दोषी चावल की पराली का धुआं है. पाकिस्तानी पर्यावरण विशेषज्ञ तो इसे पाकिस्तान का भी दोषी मानते हैं. उनका कहना है कि हवाओं के साथ सफ़र करता ये धुआं भारत से पाकिस्तान में आता है और यहां स्मॉग को और भयंकर रूप दे देता है.

इस साल लाहौर में स्मॉग का मौसम आया ही था कि बारिश हो गई. इस बार क़िस्मत अच्छी रही वरना स्मॉग पैदा करने वाले कारक मौजूद थे. दोनों देशों में सरकार कशमकश में है कि इसका हल क्या किया जाए.

Image caption भारत के पंजाब में पराली का इस्तेमाल खाद के लिए किया जाने लगा है

क्या भारतीय किसानों ने हल ढूंढ निकाला है?

भारत में चंद प्रगतिशील किसानों ने इस मुद्दे का एक हल ढूंढ निकाला है. वह बीते चंद सालों से चावल की पराली और पुआल को खाद में तब्दील कर रहे हैं. कई इलाक़ों में उनसे ऊर्जा भी पैदा की जा रही है जबकि चंद संगठन उनसे गैस बनाने की योजना भी बना रही हैं.

ये काम अधिकतर व्यक्तिगत या निजी तौर पर जारी है हालांकि एक निजी संगठन के कर्मचारी ने बीबीसी को बताया कि सरकार ने उनसे ये सीएनजी गैस ख़रीदने का वादा किया है. इस तरह दो फ़ायदे होते हैं.

वही पराली या पुआल जो पहले किसान जला देता था, अब उसके लिए क़ीमती हो जाएगी. वह उसे जलाने के बजाए बचाने की ख़ुद व्यवस्था करेगा. दूसरा इसे खाद में तब्दील करने से किसान की आर्थिक बोझ कम हो जाता है. इससे गेंहू के खेत को तक़रीबन 25 फ़ीसद कम खाद देना पड़ती है.

Image caption भारत में खेतों को साफ़ करने के लिए मशीनों का इस्तेमाल होता है

फ़र्क़ मशीनरी का है

भारत में किसान ऐसे हारवेस्टर या मशीनें इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी मदद से चावल की फसल उठाते वक़्त पौधे को बिलकुल नीचे से काटा जाता है. इसी मशीन के ज़रिए खेत में फैल जाने वाले पुआल को भी एक लाइन में इकट्ठा कर दिया जाता है.

इसके बाद बेलर की मदद से वहीं खेत में इसे भूसे में तब्दील कर दिया जाता है और बिना इंसानी मदद के ट्रॉली में डाल लिया जाता है.

अब खेत साफ़ हैं. रोटावेटर आदि की मदद से बच जाने वाली पराली को काट-पीटकर ज़मीन ही मैं पड़ा रहने दिया जाता है. वहीं ये पानी में गल सड़कर खाद में बदल जाती है. पुआल को अलग तरीक़े से इस्तेमाल करके ऊर्जा पैदा की जा सकती है.

इस तरह किसान की खाद का ख़र्च कम और पुआल के बिकने से चावल की फसल पर अतिरिक्त लाभ होता है.

Image caption मशीनों की मदद से पुआल भी किसानों के लिए लाभकारी होता नज़र आ रहा है

पाकिस्तानी किसान को 'ख़ाक भी नहीं बचती'

पाकिस्तान में पंजाब प्रांत के कृषि विभाग में डायरेक्टर जनरल के पद पर तैनात ज़फ़रयाब हैदर इसकी उपयोगिता को भी स्वीकार करते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "किसी अच्छे किसान से सुना था कि हम जब पराली जलाएं तो हमें तो ख़ाक भी नहीं बचती."

यानी खेत के जल जाने के बाद उसकी राख भी हवा में बिखर जाती है.

"उसमें कोई शक नहीं कि अगर आप पराली को काटकर ज़मीन में मिला दें तो उससे ज़मीन की उर्वरता में वृद्धि होती है. ज़मीन की खनिज को सोखने की क्षमता बढ़ जाती है."

Image caption धान के खेतों के अंदर आग लगाने का तरीक़ा बरसों से चला आ रहा है

किसान क्यों पराली जलाता है?

ज़फ़रयाब हैदर का कहना था कि पाकिस्तानी किसान के पास अब तक ऐसी मशीनें उपलब्ध नहीं थीं कि जिनकी मदद से वह पुआल को काटकर ज़मीन में मिला पाता.

शुरुआत में जब पुआल के भूसे के तौर पर मांग ज़्यादा होती है तो वह बिक जाता है. जब मांग पूरी हो जाए तो उसका कोई ख़रीदार नहीं होता. तब किसान के पास उससे छुटकारे का आसान हल उसे जलाना होता है.

पाकिस्तान में चावल उगाने वाले अधिकतर छोटे किसान हैं. उसके पास महंगी मशीन ख़रीदने या पुआल को उठवाकर खेत से निकालने के संसाधन नहीं होते हैं. ऐसे में वह एक बार फिर 'आसान हल की ओर जाता है.'

Image caption धान के पुआल को खेत में मिला देने से ज़मीन की उर्वरता में वृद्धि होती है

मशीनें कब आएंगी?

अब तक पाकिस्तान में किसान को डर और धमकी से रोकने की कोशिश की जा रही थी. पाकिस्तान में धारा 144 के तहत आग लगाने वाले किसान के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती थी. हालांकि, यह रणनीति अधिक काम नहीं आई.

कुछ समय से किसानों को जानकारी देने के लिए देहात इलाक़ों में कमेटियां भी बनाई गई हैं.

ज़फ़रयाब हैदर का कहना था कि 'अब उन्हें समझाया जा रहा है कि स्थाई लाभ इसी में है कि उसे आग लगाने की जगह ज़मीन में मिला दिया जाए.'

उनका कहना था कि इस काम के लिए मशीनें अब पाकिस्तान में आ रही हैं. तक़रीबन 250 के क़रीब मशीनें गुजरांवाला डिविज़न में किसानों के पास आ चुकी हैं.

Image caption पाकिस्तान में कुछ मशीनें विदेश से मंगवाई गई हैं

"कुछ मशीनें विदेशों से आई थीं और उसके बाद दूसरे शहरों में रिवर्स इंजीनियरिंग करके उन्हें स्थानीय रूप में तैयार कर लिया गया. ये मशीनें हर्वेस्टर ही की वह शक्ल है जो पौधे को बिलकुल नीचे से काटेंगी."

ज़फ़रयाब हैदर का कहना था कि कृषि विभाग ने बजट में पंजाब सरकार से किसानों के लिए ये मशीनें छूट पर हासिल करने के लिए कहा है.

उनका मानना है कि इससे छोटा किसान भी फ़ायदा उठा पाएगा. "एक बार ये मशीनें आम हो गईं तो जो ख़रीद न भी सकें वह किराए पर लेकर इस्तेमाल कर सकता है."

हालांकि, ये देखना बाक़ी है कि ऐसा होने में कितना वक़्त लगता है. क्या आने वाले साल में स्मॉग का मौसम एक बार फिर आएगा?

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