बूचड़खाने में जानवरों के क़त्ल को लेकर यूरोप में विवाद

  • 13 जनवरी 2019
बेल्जियम में एक मुसलमान महिला हलाल मीट शॉप के पास से गुजरती हुई इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बेल्जियम के कुछ इलाकों में पारंपरिक तरीकों से जानवरों को मारने पर पाबंदी है

यूरोप में मुसलमान और यहूदी हमेशा एक दूसरे के ख़िलाफ़ ही नहीं होते हैं, वे कई बार एक भी हो जाते हैं. हाल ही में, एक क़ानून के विरोध में दोनों समुदाय एक साथ दिख रहे हैं, दोनों का कहना है कि इस क़ानून से उनकी धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है.

दरअसल ये पूरा मामला तब शुरू हुआ जब बेल्जियम में एक जनवरी से एक क़ानून लागू हुआ, जो जानवरों के कत्ल के परंपरागत तरीके- चाहे वो यहूदी तरीका हो या फिर हलाल करना हो- से जुड़ा है.

दरअसल, जीव अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ता लंबे समय से इस क़ानून की मांग कर रहे थे, लेकिन यहूदी और इस्लामिक नेता इसे उदारवादी एजेंडे की आड़ में धार्मिक आस्थाओं पर हमला बता रहे हैं.

एडोल्फ हिटलर के समय भी यूरोप में ऐसी बहस देखने को मिली थी, जब 1933 में हिटलर ने जर्मनी में जानवरों को बेहोश किए बिना कत्ल करने पर पाबंदी लगा दी थी.

जीव अधिकार बनाम धार्मिक स्वतंत्रता यूरोपीय क़ानून के तहत जीवों की हत्या किए जाने से पहले उसे बेहोश करना ज़रूरी है ताकि उन्हें दर्द महसूस नहीं हो.

बेहोश करने की प्रक्रिया में जानवरों को कत्ल करने से ठीक पहले अचेत किया जाता है लेकिन इन देशों में धार्मिक कारणों से दी जाने वाली जानवरों की बलि में क़ानून से छूट दी जाती रही है, जिसमें परंपरागत तौर पर जानवरों को एक ही वार में गले से काटने की परंपरा रही है.

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Image caption इटली में एक बूचड़खाना

ताकि जानवरों को कम तकलीफ़ हो

जानवरों के कल्याण के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस परंपरा के चलते जानवरों को कत्ल के समय असहनीय दर्द सहना पड़ता है जबकि धार्मिक नेताओं का कहना है कि परंपरागत तरीके में भी जानवरों को कोई दर्द नहीं होता.

इन लोगों का ये भी दावा रहा है कि परंपरागत तरीके से भी जानवरों की तुरंत मौत हो जाती है और इसका तरीका सैकड़ों साल के चलन में बेहतर होता गया है ताकि जानवरों को कम से कम तकलीफ़ हो.

इन दोनों बहसों के बीच में कुछ यूरोपीय देशों ने धार्मिक कारणों से जानवरों का कत्ल करने वाले बूचड़खानों में सख्त प्रावधान लागू किए हुए हैं. इनमें नीदरलैंड्स, जर्मनी, स्पेन और साइप्रस जैसे देश शामिल हैं.

ऑस्ट्रिया और ग्रीस जैसे देशों में जानवरों के काटे जाने के तुरंत बाद उन्हें बेहोश करने का प्रावधान है.

बेल्जियम के तीन क्षेत्रों में से दो क्षेत्र- फ्लैंडर्स और वालोनिया- ने अब डेनमार्क, स्वीडन, स्लोवानिया, नॉर्वे और आइसलैंड की तरह वह प्रावधान अपना लिया है जिसके तहत जानवरों के कत्ल से पहले उसे बेहोश करना ज़रूरी है.

ख़तना समेत कई मुद्दों पर यहूदी, मुसलमान एकजुट

वैसे परंपरागत तरीके से जानवरों की कत्ल का तरीका, कोई इकलौता मुद्दा नहीं है जिसने यहूदियों और मुसलमानों को एकजुट कर दिया है, बल्कि दोनों समुदाय दूसरे मुद्दों पर भी एकजुट होते रहे हैं.

ख़तना और बाल अधिकार पिछले साल, आइसलैंड में एक क़ानून बनाने के लिए प्रस्ताव पारित किया गया जो बिना किसी चिकित्सीय वजह के ख़तना किए जाने पर पाबंदी लगाने के विषय पर था, बाद में विवाद बढ़ने पर इसे आइसलैंड की संसद ने पास नहीं किया.

यहूदी और मुसलमान दोनों समुदायों में ख़तना कराने की प्रथा है.

2012 में, जर्मनी में भी थोड़े समय के लिए ख़तना पर पाबंदी लगा दी गई थी.

उस वक्त वहां की एक अदालत ने कहा था कि किसी भी बच्चे के शरीर से उसके किसी हिस्से को स्थायी तौर पर हटाना, बाल अधिकार का उल्लंघन है.

अदालत ने ये भी कहा था कि न तो माता पिता के अधिकार और न ही धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को शारीरिक तौर पर गंभीर और स्थायी बदलाव करने के लिए तर्कसंगत ठहराया जा सकता है.

हालांकि इस फ़ैसले को छह महीने बाद पलट दिया गया लेकिन इसको लेकर यहूदी और मुस्लिम समुदायों में काफी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी, दोनों समुदायों का कहना था कि ये फ़ैसला उनकी धार्मिक आस्थाओं पर पाबंदी लगाने जैसा है.

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Image caption फ़्रांस में हलाल मीट प्रॉडक्ट देखते उपभोक्ता

राजनीतिक पहलू

वैसे एक हक़ीकत ये भी है कि आम तौर पर ऐसे क़दम दक्षिणपंथी राजनीति करने वाली पार्टियां उठाती हैं, जिसके चलते विवाद में राजनीतिक पहलू भी जुड़ जाता है.

जानवरों के अधिकार और बच्चों के अधिकार से जुड़े मामलों पर समर्थन करके राजनेता, बाहरी देशों से आकर अपने अपने देशों में आकर रहने वाले लोगों का विरोध भी कर लेते हैं.

बेल्जियम के फलैंडर्स क्षेत्र में पाबंदी लगाने का काम जीव कल्याण मंत्री बेन वेयट्स ने किया था.

जब ये क़ानून 2017 में क्षेत्रीय संसद में पारित किया गया था तब वेयट्स ने ट्वीट किया था, "एनिमल मिनिस्टर होने पर गर्व है, फ्लेमिस (बेल्जियम का एक समुदाय) होने पर भी गर्व है."

बेल्जियम में नाजियों का साथ देने वाले नेता के 90वें जन्मदिन समारोह में शामिल होने के लिए वेयट्स की 2014 में काफी आलोचना भी हुई थी.

एंटवर्प के राबी याकोव डेविड सेकमेल ने न्यूयार्क टाइम्स से कहा, "इन सबसे निश्चित तौर पर द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले की स्थिति दिमाग में आने लगती है, जह जर्मनी में ऐसे क़ानून लागू हुए थे."

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Image caption हॉलैंड में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन

परंपरागत तरीकों पर पाबंदी की मांग

इस्लामिक संस्थाओं के समूह का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील जूस रूट्स ने न्यूयार्क टाइम्स से बताया कि ये पाबंदी अप्रत्यक्ष तौर पर कुछ धार्मिक समूहों पर दोषरोपण करने जैसा ज़्यादा है, इनमें जीव संरक्षण का भाव कम है.

हालांकि बेल्जियम में जीव संरक्षण से जुड़े काम करने वाले समूह ग्लोबल एक्शन इन द इंटरेस्ट ऑफ़ एनीमल्स ने ट्वीटर पर ऐसे आरोपों को खारिज किया है.

इस समूह ने लिखा है, ''वालोनिया में क़ानून को सेंटर-लेफ्ट पार्टी ने पारित किया है, इसलिए ऐसे क़दम केवल दक्षिणपंथी पार्टी उठा रही है, कहना सही नहीं है.''

ये कार्यकर्ता उस आरोप को भी ख़ारिज करते हैं जिसमें कहा जा रहा है कि बेल्ज़ियम का क़ानून परंपरागत तौर पर जानवरों की बलि पर पाबंदी जैसा है.

हालांकि ऐसे भी उदाहरण हैं जब परंपरागत तौर पर जानवरों का क़त्ल किए जाने के दौरान गले से काटने के साथ ही शरीर को बेहोश कर दिया जाता है.

लेकिन मुस्लिम और यहूदी धर्म के धार्मिक नेता हमेशा इस तरह के तरीके को स्वीकार नहीं करते हैं.

वैसे यूरोप में, एक्टिविस्ट और राजनीति करने वाले, दोनों उन परंपरागत तौर तरीकों पर पाबंदी लगाने की मांग करते आए हैं जो यूरोपीय क़ानून और मान्यताओं से मेल नहीं खाते हैं और ये बहस थमने का नाम नहीं ले रही है.

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