चीन 'बदला लेने' के लिए कैसे खाने का इस्तेमाल करता है

  • 18 जनवरी 2019
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Image caption चीन के लिए खाद्य व्यापार भी एक हथियार है

टेक्नॉलोजी कंपनी ख़्वावे की अधिकारी मेंग वांझू की गिरफ़्तारी के बाद चीन के राष्ट्रवादी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने चेतावनी दी थी कि चीन सज़ा के तौर पर कनाडा से तिलहन आयात बंद कर सकता है.

बीते साल 17 दिसंबर को यह बात सामने आई थी कि कनाडा का कृषि क्षेत्र दोनों देशों के बीच कड़वाहट भरे संबंधों का शिकार हो सकता है.

चीन के साथ किसी देश के राजनीतिक झगड़े में ऐसी धमकी पहली बार सुनने को नहीं मिली थी. साल 2010 में नॉर्वे और साल 2012 में फ़िलीपींस के साथ भी ऐसा देखने को मिला था.

विश्लेषक अक्सर चीन पर यह आरोप लगाते हैं कि वह किसी देश की नीतियों को अपमानजनक मानने के बाद प्रतिशोध के रूप में उस देश के ख़िलाफ़ खाद्य और कृषि वस्तुओं का इस्तेमाल करता है.

हालांकि यह स्थापित करना बहुत मुश्किल होता है कि चीन ने दबाव डालने की यह नीति उसी मामले के कारण उठाई है. वह आमतौर पर सीधे-सीधे किसी चीज़ पर पाबंदी तब तक नहीं लगाता है जब तक कि विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में उसे सीधे-सीधे चुनौती न दी जा सके.

इसकी जगह वह खाद्य उत्पादों के सीमा शुल्क में देरी करना, बाज़ार में पहुंचने न देना और कड़े निरीक्षण जैसे अड़ंगे लगाता है.

चीन राजनीति और व्यापार के बीच संबंधों को नकारता रहा है और इन अनौपचारिक प्रतिबंधों को 'सामान्य' बताता है. हालांकि, दूसरा देश जब अपनी पुरानी स्थिति से पलट जाता है तो यह प्रतिबंध हटा भी लिए जाते हैं.

आमतौर पर ऐसी रणनीति सरकारी मीडिया द्वारा ही बताई जाती है जिसमें ग्लोबल टाइम्स जैसे अख़बार शामिल हैं. इसमें व्यापार का बहिष्कार और उस देश के ख़िलाफ़ लोगों की नाराज़गी को भड़काया जाता है.

जैसे-जैसे वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की भूमिका बढ़ी है, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से व्यापारिक निर्भरता को प्रभावित करने की क्षमता भी बढ़ी है.

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Image caption ख़्वावे की अधिकारी की गिरफ़्तारी के बाद कनाडा और चीन के संबंधों में तनाव आया है

चीन का वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रभुत्व जिस तरह से बढ़ रहा है, उसी तरह से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यापार को लेकर उनके शोषण की क्षमता भी बढ़ ही रही है.

अभी जो विवाद चल रहा है, इसके बीच कनाडा में चिंता जताई जा रही है. मेंग की गिरफ़्तारी के बाद चीन ने 14 दिसंबर को ग्लोबल टाइम्स में जवाबी हमला करने के तरीक़ों पर बात की थी, 'गंभीर नतीजे' भुगतने की चेतावनी दी थी.

इसी लेख में चीन के विद्वान लियू वेइदोंग ने कहा था कि चीन सेफ़्टी या स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए कनाडा के उत्पादों को अपने यहां आने से रोक सकता है.

17 दिसंबर को एक अन्य आर्टिकल में अख़बार ने लिखा था कि कनाडा के किसानों की नज़र इस बात पर बनी हुई है कि मेंग की गिरफ़्तारी के बाद चीन के लोगों का ग़ुस्सा कहीं बढ़ तो नहीं रहा है.

चीनी मीडिया ने जिस बड़े नुकसान की बात की, वह था कैनोला. यह एक तिलहन है जिसका कनाडा बड़े पैमाने पर निर्यात करता है और चीन हर साल लगभग दो अरब डॉलर का आयात करता है.

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Image caption चीन ऑस्ट्रेलियाई वाइन का सबसे बड़ा ख़रीदार है

ऑस्ट्रेलिया की वाइन

ऑस्ट्रेलिया के वाइन उत्पादक चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच मई 2018 में पैदा हुए डिप्लोमैटिक तनाव की जद में आ गए थे.

ट्रेज़री वाइन एस्टेट्स दुनिया का सबसे बड़ा वाइन उत्पाद एस्टेट है. उसने कहा था कि चीन के बंदरगाहों पर उसके भेजे माल के ढेर लग रहे हैं क्योंकि नए कस्टम नियम सीधे-सीधे ऑस्ट्रेलिया में बनी वाइन को निशाने पर ले रहे हैं.

बीते साल 5 जून को ऑस्ट्रेलियन फाइनेंशियल रिव्यू में छपे एक लेख में कहा गया था, "यह देरी इसलिए हो रही है क्योंकि वाइन कहां बनी है, इसकी चेकिंग बढ़ गई है. मगर वाइन इंडस्ट्री से सूत्रों का मानना है कि एक्स्ट्रा स्क्रूटनी इसलिए की जा रही है क्योंकि चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच तनाव बढ़ रहा है."

चीन ने इस तरह के दावों को ख़ारिज किया था और कहा था कि चीन का प्रशासन ऐसा सामान्य नियमों के अनुसार ही कर रहा है.

दिसंबर 2017 से ही दोनों के रिश्तों में खिंचाव आ गया था. ऐसा तब हुआ था, जब ऑस्ट्रेलिया ने राजनीति में विदेशी हस्तक्षेप पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक क़ानून प्रस्तावित किया था. ऐसा 'चीन के प्रभाव की रिपोर्टें' आने के बाद किया गया था.

बीते साल 22 मई को एक तीखे संपादकीय में ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि चीन को 'इसे (ऑस्ट्रेलिया) को कुछ समय के लिए मज़ा चखाना चाहिए.'

इसमें बीफ़ और वाइन का आयात घटाने का ज़िक्र करते हुए लिखा था कि "ऑस्ट्रेलिया के निर्यात को 6.45 अरब डॉलर तक घटा दिया गया तो इससे ऑस्ट्रेलिया सकते में आ जाएगा."

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Image caption सोयाबीन किसानों का अमेरिका में काफी राजनीतिक दबदबा है

अमरीकी ज्वार और सोयाबीन

ज्वार और सोयाबीन साल 2018 में ज़्यादातर समय चर्चा में रहे क्योंकि चीन ने अमरीका की इन दो फसलों पर ट्रेड वॉर के कारण तीखे आयात शुल्क लगा दिए थे.

अमरीकी विश्लेषकों का मानना था कि ज्वार को इसलिए चुना गया ताकि राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के राजनीतिक जनाधार के केंद्र में आने वाले टेक्सस और कंसास पर निशाना साधा जाए. इस फसल की अधिकतर पैदावार यहीं होती है.

ज्वार और सोयाबीन को जहां सीधे-सीधे निशाने पर लिया गया, हॉन्ग-कॉन्ग स्थित साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट में 28 दिसंबर को छपे लेख के मुताबिक़ चीन ने अमरीकन चेरी, संतरों और सेब के निर्यात पर अनाधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया.

लेख में ट्रेड एक्सपर्ट्स के हवाले से लिखा गया था, "चीन के अधिकारी इस तरह के क़दमों को सीधे-सीधे अंतरराष्ट्रीय तनाव नहीं जोड़ते और सीधे-सीधे इनका पता भी नहीं चलता. मगर इस तरह के क़दम उठाना चीनी सरकार के तौर-तरीक़ों का हिस्सा हैं और सरकार राजनीतिक झगड़ों में इस तरह की और अन्य नॉन-टैरिफ़ बाधाएं खड़ी करती रही है."

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Image caption फ़िलीपींस में केला कृषि क्षेत्र का सबसे बड़ा निर्यात होने वाली वस्तु है

फ़िलीपींस: केले

चीन और फ़िलीपीन्स के बीच केलों के व्यापार को दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्तों के सूचकांक के तौर पर माना जा सकता है.

अप्रैल 2012 में जब जब फ़िलीपीन्स के जंगी जहाज़ ने चीन के मछुआरों को विवादित साउथ चाइना सी में रोका था, चीन ने फ़िलीपीन्स से केलों का आयात रोक दिया था. चीन ने वजह बताई थी कि इन केलों में 104 किस्म के नुकसानदेह जीव हैं.

फ़िलीपीन्स के बनाना उत्पादन और निर्यातक संघ के कार्यकारी निदेशक स्टीफ़न एंटिग का कहना है कि इसकी असल वजह आर्थिक या गुणवत्ता ख़राब होना नहीं बल्कि राजनीतिक थी.

फ़िलीपीन्स स्टार में उस समय छपे लेख में कहा गया था कि इस तरह से नुकसान पहुंचाना ठीक नहीं जिससे कि विवाद वाले इलाक़े से 700 मील से भी दूर रहने वाले केला उगाने वाले प्रभावित होते हों.

राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटर्टे के शासन में जैसे ही चीन के साथ फ़िलीपीन्स के रिश्ते सुधरे, केलों का कारोबार भी सुधर गया और अक्तूबर 2016 में उनकी बीजिंग यात्रा से ठीक पहले चीन की ओर से लगाया गया अनाधिकारिक प्रतिबंध भी हट गया.

नवंबर 2018 में फ़िलीपीन्स के मीडिया में आए एक लेख में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया था कि, "चीनी लोगों के डाइनिंग टेबल बड़ी मात्रा में फ़िलीपीन्स के फल पहुंच रहे हैं."

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नॉर्व: सैमन मछली

2010 में जब ऑस्लो स्थित नोबेल पीस प्राइज़ कमेटी ने चीन के सत्ताविरोधी लिउ शियाबो को पुरस्कार दिया था, चीन ने नॉर्वे की सैमन मछली पर गुस्सा निकाला था. 2011 में नॉर्वे का निर्यात 59 प्रतिशत घट गया था.

2015 में चीन के प्रशासन ने नॉर्वे से आने वाली सैमन पर आधिकारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिया और कहा कि इसमें एक ऐसा वायरस है जिस कारण इसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

लेकिन दिसंबर 2016 में द्विपक्षीय रिश्ते सामान्य हो गए, जब नॉर्वे ने यह प्रतिबद्धता जताई कि वह ऐसी बातों और क़दमों का समर्थन नही करेगा जो चीन के हितों को नज़रअंदाज़ करते हों.

इसके बाद चीन ने भी नॉर्वे की मछली को अपने यहां आने दिया. नतीजा यह रहा कि साल 2017 में नॉर्वे की सैमन मछली का निर्यात 544 प्रतिशत बढ़ गया.

अप्रैल 2018 में ग्लोबल टाइम्स ने लिखा था कि दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते 'अब तक के शीर्ष स्तर' पर हैं और यह नॉर्वे से सैमन के आयात में 'नाटकीय ढंग से हुई बढ़ोतरी' से स्पष्ट होता है.

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