ये हथियार परमाणु युद्ध की संभावनाओं को और बढ़ा रहे हैं

  • 10 फरवरी 2019
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Image caption डीएफ-26 मिसाइल

परमाणु युद्ध का ख़तरा लोगों के जे़हन में डर पैदा कर देता है. परमाणु और पारंपरिक हथियारों के बीच जो अंतर अब ख़त्म हो रहा है वो इस ख़तरे को और बढ़ा ही रहा है.

परमाणु और गैर-परमाणु हथियार कभी भी पूरी तरह से एक-दूसरे से अलग नहीं थे.

उदाहरण के लिए बी-29 बमवर्षक विमानों को लें. इसे पारंपरिक बमों के लिए विकसित किया गया था.

लेकिन 6 अगस्त 1945 को इनमें से एक विमान 'एनोला गे' ने जापान के हिरोशिमा पर दुनिया का पहला परमाणु बम गिराया.

74 साल बाद, दुनिया के नौ देशों के पास हज़ारों परमाणु बम हैं, जो बड़ी मात्रा में गैर-परमाणु बमों से लिपटे हुए हैं.

1986 में दुनिया भर में परमाणु बमों की संख्या क़रीब 64 हज़ार थी जिसमें अब कमी आई है लेकिन आज के परमाणु बम हिरोशिमा पर गिराये गए बम से लगभग 300 गुना अधिक शक्तिशाली हैं.

सभी परमाणु संपन्न देशों के पास दोहरे इस्तेमाल के लायक हथियार हैं. मतलब ये कि इनका पारंपरिक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और परमाणु बम को ले जाने में भी.

इनमें लंबी दूरी की मिसाइलें भी शामिल हैं और मार करने की इनकी क्षमता में भी लगातार वृद्धि हो रही है.

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परमाणु शक्ति बढ़ाने पर ज़ोर

उदाहरण के लिए रूस ने हाल ही में एक क्रूज मिसाइल 9एम729 को अपने बेड़े में तैनात किया है.

अमरीका का मानना है कि इन मिसाइलों का दोहरा उपयोग हो सकता है और 500 किलोमीटर की दूरी पर इसका 'अच्छी तरह से' परीक्षण किया गया है.

अमरीका का दावा है कि रूस ने इसके साथ ही मध्यम दूरी की मिसाइलों के इस्तेमाल पर लगी प्रतिबंध वाली संधि की शर्तों का उल्लंघन किया है.

हथियारों की इस नए दौड़ पर अपनी चिंता जताते हुए अमरीका ने इस समझौते से हटने की घोषणा भी कर दी.

इस बीच, चीन ने भी हाल ही में अपनी नई मिसाइल डीएफ-26 का प्रदर्शन किया है.

2,500 किलोमीटर तक सटीक प्रहार करने में सक्षम दुनिया की यह सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल है.

कई स्थितियां हैं जब ऐसी मिसाइलें परमाणु युद्ध की संभावनाओं को बढ़ा सकती हैं.

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वास्तविकता यह है कि युद्ध के दौरान यह जानना मुश्किल है कि शत्रु किस तरह की मिसाइल दाग रहा है.

युद्ध में शामिल दूसरे देश, क्या तब तक इंतजार करेंगे कि मिसाइल दागी जाए और जब वो गिरे तब यह आकलन किया जाए कि वो कैसे शस्त्र थे.

सबसे बड़ा ख़तरा तो यह है कि युद्ध की स्थिति में इसका पारंपरिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाए लेकिन शत्रु उसे परमाणु हथियार समझ कर अपने परमाणु हथियार चला दे.

कल्पना कीजिये कि चीन ने अपनी सीमा में परमाणु हथियार संपन्न डीएफ-26 मिसाइलों को तैनात किया है और अमरीका उन्हें ग़लती से पारंपरिक हथियार समझते हुए नष्ट करने का फ़ैसला करे.

इस तरह से अमरीका हमला करके अनजाने में चीन को अपने बाकी परमाणु हथियारों को लॉन्च करने के लिए उकसा सकता है.

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Image caption रूस की 9एम729 मिसाइल

सैटेलाइट सिस्टम

दोहरे उपयोग वाली मिसाइलें एकमात्र हथियार नहीं हैं जिसके जरिए परमाणु और गैर-परमाणु हथियारों इस्तेमाल किये जा सकते हैं.

उदाहरण के लिए, सभी न्यूक्लियर सेना को संचार प्रणाली की आवश्यकता है, इसके लिए सैटेलाइट की आवश्यकता होती है.

लेकिन, तेज़ी से, ऐसे परमाणु कमांड-कंट्रोल सिस्टम का उपयोग गैर-परमाणु ऑपरेशन के लिए भी किया जा रहा है.

उदाहरण के लिए, अमरीका, परमाणु या पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ हमले की चेतावनी के लिए उपग्रहों का इस्तेमाल करता है.

नैटो और रूस के बीच संघर्ष में, इनका इस्तेमाल रूस की लॉन्च की गई पारंपरिक बैलिस्टिक मिसाइलों का पता लगाने के लिए किया जा सकता है- उन्हें मार गिराने की दिशा में उठाये गये पहले कदम के रूप में.

अगर यह रणनीति कामयाब रही तो रूस जवाब में अमरीका के पूर्व-चेतावनी वाले उपग्रहों पर हमले कर सकता है.

वास्तव में, अमरीकी ख़ुफ़िया समुदाय ने चेताया भी है कि रूस इस उद्देश्य के लिए ज़मीनी लेज़र हथियार विकसित कर रहा है.

लेकिन अमरीका की पूर्व-चेतावनी वाले उपग्रहों को ख़त्म करने मात्र से पारंपरिक हथियारों वाले मिसाइलों को दागने की उसकी क्षमता कम नहीं होगी.

बल्कि इससे अमरीका को आशंका ज़रूर होगी कि कहीं रूस, अमरीका पर परमाणु हमले की योजना तो नहीं बना रहा.

दरअसल, अपनी परमाणु नीति में अमरीका स्पष्ट रूप से किसी भी उस देश के ख़िलाफ़ अपने परमाणु हथियारों के उपयोग पर विचार करने की चेतावनी देता है जो उसके परमाणु कमांड-एंड-कंट्रोल सिस्टम पर हमला करता है.

चेतावनी इस बात पर निर्भर है कि अमुक देश सबसे पहले परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया है.

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हथियारों पर प्रतिबंध

मुमकिन है कि परमाणु संपन्न देशों की सरकारें परमाणु और गैर परमाणु हथियारों के बीच बढ़ती उलझन से अवगत हैं.

भले ही वो इससे जुड़े कुछ ख़तरों से परिचित हैं. लेकिन, इसके ख़तरों को कम करना उनकी प्राथमिकता नहीं दिखती.

उनका पूरा ध्यान दूसरे देश को रोकने के लिए अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने पर रहता है.

इन देशों के लिए एक विकल्प ये हो सकता है कि वो उन हथियारों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर सकते हैं जो परमाणु कमांड-एंड-कंट्रोल उपग्रहों के लिए ख़तरा हैं.

लेकिन फिलहाल, परमाणु संपन्न देश ऐसी किसी भी सहमति के लिए एक मेच पर बैठने के लिए तैयार नहीं हैं.

लिहाजा, ऐसे किसी सहयोग की संभावनाएं अभी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है.

(जेम्स एक्टन कार्नेगी एंडॉमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में परमाणु नीति कार्यक्रम के सह-निदेशक हैं)

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