थाईलैंड: राजा या सेना, राजनीतिक व्यवस्था किसकी कठपुतली ?

  • 14 फरवरी 2019
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खूबसूरत समुद्री तट. कामयाब पर्यटन उद्योग. मैन्युफेक्चरिंग यानी निर्माण का स्थापित केंद्र और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था.

फिलहाल दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन आसियान की अगुवाई कर रहे थाईलैंड को दुनिया ऐसी ही खूबियों से पहचानती है.

साल 2016 में थाईलैंड की राजनीति को लेकर चर्चा लोकप्रिय राजा पूमीपोन अदून्यादेत के निधन के बाद हुई थी.

करीब 70 साल तक शासन व्यवस्था की बागडोर संभालने वाले राजा पूमीपोन के नाम दुनिया में सबसे लंबे वक़्त तक राजगद्दी पर रहने का कीर्तिमान है.

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Image caption थाईलैंड की राजगद्दी पर करीब 70 साल तक रहे पूमीपोन अदून्यादेत का 2016 में निधन हुआ. अब उनके बेटे महा वाचिरालोंगकोन राजा हैं. मई में उनका विधिवत राज्याभिषेक होना है.

चुनाव में राजकुमारी की दावेदारी

अब राजा पूमीपोन की बड़ी बेटी राजकुमारी उबोनरत माहिदोन की वजह से थाईलैंड की राजनीति पर पूरी दुनिया की नज़रें दोबारा आ टिकी हैं.

थाईलैंड के निर्वासित पूर्व प्रधानमंत्री टकसिन चिनावाट की समर्थक मानी जाने वाली थाई रक्सा चार्ट पार्टी के नेता प्रीचापोल ने राजकुमारी उबोनरत को लेकर एक अहम घोषणा की.

प्रीचापोल ने बीते हफ़्ते पार्टी की बैठक के बाद कहा, " कार्यकारिणी की बैठक में हमने प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के नाम पर चर्चा की. एक सदस्य ने उनका नाम प्रस्तावित किया. हम सभी इस बात पर सहमत थे कि प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर ये सबसे उपयुक्त नाम है."

थाईलैंड के राजघराने में राजकुमारी उबोनरत सबसे बड़ी हैं और उनकी शख्सियत भी सबसे अलग है. वो फ़िल्मों में काम कर चुकी हैं. स्टेज शो करती हैं. चैरिटी में हिस्सा लेती हैं और ख़ुद को आम लोगों की जमात का हिस्सा बताती हैं.

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राजा की आपत्ति

साल 1972 में अमरीकी नागरिक पीटर जेनसन से शादी के बाद वो शाही पदनाम भी छोड़ चुकी हैं. साल 2001 में तलाक़ के बाद वो थाईलैंड लौटीं और राज घराने से दोबारा उनका संबंध जुड़ा.

लेकिन, राजकुमारी उबोनरत ने कहा कि वो 'राजघराने से संपर्क तोड़ चुकी हैं और एक आम नागरिक की तरह चुनाव में शरीक होंगी.'

थाईलैंड की विपक्षी पार्टियां राजकुमारी की घोषणा से उत्साहित हो गईं लेकिन उनके छोटे भाई और थाईलैंड के मौजूदा राजा महा वाचिरालोंगकोन ने उनके फ़ैसले को 'अनुचित' बताने में देर नहीं की.

राजा की आपत्ति के बाद चुनाव आयोग ने सोमवार को उनकी दावेदारी खारिज कर दी. थाईलैंड में भारत के राजदूत रह चुके विवेक काटजू वहां की राजनीति पर करीबी निगाह रखते हैं.

काटजू कहते हैं, " ये जरूर है कि राजकुमारी राजपरिवार की सदस्य हैं लेकिन जब 1970 के दशक में उन्होंने एक अमरीकी नागरिक से शादी की थी तब उनका स्टेटस कम हो गया था. अब राजा ने हुक्म दिया है कि वो चुनाव नहीं लड़ सकती हैं और राजनीति में नहीं आ सकती हैं. ये थाईलैंड के संविधान के विपरीत है."

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सेना के साथ सहमति

राजा महा वाचिरालोंगकोन, जिन्हें रामा दशम भी कहा जाता है, की ओर से जारी बयान में साफ़ तौर पर कहा गया कि संविधान के मुताबिक 'राजवंश के सदस्यों को राजनीतिक तौर पर निरपेक्ष रहना चाहिए.'

मलाया विश्वविद्यालय के सीनियर लेक्चरर राहुल मिश्रा जैसे कई विश्लेषक इसे मौजूदा प्रधानमंत्री प्रयूत जन ओचा और राजमहल के बीच सहमति का नतीजा मानते हैं.

राहुल मिश्रा कहते हैं, " जब राजकुमारी ने कहा कि वो थाई रक्सा पार्टी से लड़ेंगी तो ये राय बनी थी कि प्रयूत जन ओचा इसके बारे में कोई बयान देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. राजा ने ख़ुद कहा कि हम इस चीज को पसंद नहीं करते. राज परिवार के लोग राजनीति से ऊपर हैं. ये ऐसा बयान था जिससे लगा कि शायद प्रयूत और राजा के बीच सहमति है."

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नया संविधान

बीते शुक्रवार को प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का एलान करने वाले प्रयूत जन ओचा थाईलैंड की सेना में जनरल रहे हैं. साल 2014 में थाईलैंड की सेना ने टकसिन चिनावाट की बहन यिंगलक चिनावाट की सरकार का तख्ता पलट किया और जनरल प्रयूत प्रधानमंत्री बने.

साल 2016 में सेना ने नया संविधान तैयार किया और जनमत संग्रह कराया. संविधान में बदलाव इस तरह से किया गया कि लोकतंत्र बहाली के बाद भी सत्ता पर सेना की पकड़ बनी रहे.

राजा महा वाचिरालोंगकोन ने भी नए संविधान के सिर्फ कुछ ही प्रावधानों पर आपत्ति की. राहुल मिश्रा इसे सेना और राजा के बीच के गठजोड़ के तौर पर देखते हैं.

मिश्रा कहते हैं, " दक्षिण पूर्व एशिया में वायांग यानी कठपुतली का खेल बड़ा लोकप्रिय है. राजा भी इस खेल को संचालित करने वाले लोगों में से एक है. राजा ने सत्ता संभालने के बाद पहली चीज ये की कि सत्ता के जो तमाम औजार हैं, उन पर अपनी पकड़ बनाई."

वो आगे कहते हैं, "जब संविधान तैयार कर राजा के सामने पेश किया गया तब उन्होंने काफी समय लगाया. राजा ने कहा कि संविधान में मुझे ये प्रावधान नहीं समझ आ रहे हैं, उन्हें आप बदलें, उसके बाद ही मैं संविधान को मंजूरी दूंगा."

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किसके पास है ताक़त?

राहुल मिश्रा का आकलन है कि ये दिखता जरूर है कि सेना और प्रयूत जन ओचा काफी शक्तिशाली हैं लेकिन राजा ने अपनी ताकत काफी बढ़ाई है और चुनाव में उनकी अहम भूमिका होगी.

लोकप्रियता की बात करें तो राजा पूमीपोन को थाईलैंड में बहुत ऊंचा दर्ज़ा हासिल था. जबकि उनके बेटे और मौजूदा राजा महा वाचिरालोंगकोन की जीवनशैली की कई बार आलोचना होती रही है.

हालांकि, वो अपनी पकड़ बनाए रखने में महारथी माने जाते हैं. जब उनकी बहन ने अपनी दावेदारी पेश की तो माना गया कि राजकुमारी का ये कदम संविधान में बदलाव करने वाली सेना पर भारी पड़ेगा. राजा के हस्तक्षेप को भी इसी से जोड़कर देखा गया. नए संविधान के बाद सेना का दबदबा बढ़ा है लेकिन राजा की अहमियत बरकरार है.

राहुल मिश्रा कहते हैं, " सीनेट के 250 सदस्य सेना या नेशनल काउंसिल फॉर पीस एंड आर्डर नामित करेगी. राजा जब इन्हें मजूरी देंगे तभी ये सदस्य नामित होंगे. मुझे लगता है कि लोकतंत्र की जो धुरी है, वो राजा पर आश्रित हो रही है."

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Image caption पूर्व प्रधानमंत्री टकसिन चिनावाट और उनकी बहन यिंगलक चिनावाट फिलहाल निर्वासित जीवन बिता रहे हैं.

चिनावाट की लोकप्रियता बरकरार?

थाईलैंड में सेना के सत्ता पर काबिज होने का इतिहास पुराना है. साल 1932 में पूर्ण राजशाही ख़त्म होने के बाद से सेना 12 बार तख्ता पलट कर चुकी है.

साल 2001 के बाद से थाईलैंड में हुए चुनावों में टकसिन चिनावाट और उनके करीबियों का दबदबा रहा है. टकसिन 2006 तक प्रधानमंत्री रहे और 2011 से 2014 तक प्रधानमंत्री का पद उनकी बहन के पास रहा. अब भी थाईलैंड में उनके समर्थकों की कमी नहीं.

थाईलैंड में भारत के राजदूत रहे विवेक काटजू कहते हैं, " थाईलैंड के राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में एक मूलभूत दरार है. एक तरफ वो कैंप है जो राजपरिवार से संबंधित रहा है. ये गुट बैंकॉक इलीट का है, जिसने हमेशा वहां शासन किया है, दूसरी तरफ वो लोग हैं जिनकी सोच है कि उनको शासन अपने हाथ में लेना चाहिए. ऐसे लोग गरीब तबके से हैं. वो उत्तर और उत्तर पूर्व से आते हैं और टकसिन उनका प्रतिनिधित्व करते हैं."

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Image caption चुनाव प्रचार करते थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रयूत जन ओचा. वो साल 2014 के तख्ता पलट के बाद प्रधानमंत्री बने थे.

मुक़ाबला कितना कड़ा?

थाईलैंड के मेट्रो शहर संपन्नता की कहानी सुनाते हैं तो कई हिस्से ऐसे भी हैं, जहां विकास की छाया भी नहीं पहुंची है. सेना समर्थक प्रयूत की पलांग प्रचारत पार्टी के विरोधी इस स्थिति को ही भुनाने की तैयारी में हैं.

चुनाव में मुक़ाबले के सवाल पर राहुल मिश्रा कहते हैं, " थाईलैंड में पार्टियां बहुत हैं. लेकिन तीन पार्टियां प्रमुख हैं. पहली प्रयूत की पलांग प्रचारत पार्टी है. दूसरी सुदारत की पार्टी है थाई पार्टी. 2001 से लगातार चुनाव जीतने वाली टकसिन की पार्टी का ही ये एक रूप है. इसका दूसरा रूप थाई रक्सा चार्ट पार्टी है. तीसरी डेमोक्रेट पार्टी है, जिसे अभिजीत वेज्जाजिवा चला रहे हैं."

वो बताते हैं, "पलांग प्रचारत को पांच सौ में से सिर्फ 126 सीट जीतनी हैं. लेकिन 126 सीटों पर मुक़ाबला भी उनके लिए मुश्किल होगा. आम जनता का बड़ा समर्थन थाई पार्टी के लिए है. बची सीटें डेमोक्रेट पार्टी के पास जा सकती हैं."

थाईलैंड में चुनी हुई सरकारों को सीमित कार्यकाल मिला है लेकिन देश की आर्थिक तरक्की पर इसका ख़ास असर नहीं हुआ.

विवेक काटजू इसकी वजह बताते हैं, " चाहे कितना भी राजनीतिक विवाद हो. चाहे समाज में उथल पुथल हो, थाईलैंड के नेताओं ने कभी आर्थिक व्यवस्था पर विवादों का साया नहीं पड़ने दिया. मुझे लगता है कि ये थाईलैंड की आर्थिक सफलता का रहस्य है."

वो आगे कहते हैं, "थाईलैंड में जो नीतियां अपनाई गईं वो बहुत अहम थीं. उन्होंने थाईलैंड को मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक प्लेटफॉर्म बनाया. दुनिया की बड़ी कंपनियों खासकर जापानी और चीनी कंपनियों को आमंत्रित किया. उन्हें कुशल श्रमिक मिले. इन्फ्रास्ट्रक्चर, बिजली और पानी की व्यवस्था मिली. यातायात और संचार की प्रणाली अच्छी मिली."

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24 मार्च को चुनाव

लेकिन अब बात लोकतंत्र बहाली की है. पूर्व जनरल प्रयूत 2014 से ही चुनाव टालते रहे हैं. थाईलैंड के लोगों के पास करीब पांच साल के इंतज़ार के बाद 24 मार्च को अपना भविष्य तय करने का मौका होगा. विवेक काटजू की राय है कि इसी वजह से चुनाव अहम माने जा रहे हैं.

वो कहते हैं, "थाईलैंड की जनता और वहां के नए राजा चाहते हैं कि सैनिक शासन ख़त्म हो. उम्मीद कर सकते हैं कि इन चुनावों के जरिए थाईलैंड में सामाजिक शांति और राजनीतिक स्थिरता आए. लेकिन मैं चुनाव को पूर्ण समाधान के रूप में नहीं देखता."

चुनाव से किसी बड़े बदलाव या समाधान की उम्मीद दूसरे विश्लेषक भी नहीं कर रहे हैं. लेकिन, ये जरूर कहा जा रहा है कि चुनावों के जरिए लोगों के पास अपनी राय जाहिर करने का मौका होगा. वो भी तब जब सड़सठ बरस की एक राजकुमारी भी बता चुकी हैं कि अगर मौका मिलता तो वो सेना की पसंदीदा पार्टी को चुनौती देना पसंद करतीं.

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