सिंधु जल संधि के तहत भारत के पानी रोकने के फ़ैसले पर क्या बोला पाकिस्तान

  • 22 फरवरी 2019
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पाकिस्तान ने कहा है कि वो रावी, सतलज और ब्यास नदियों से पाकिस्तान के हिस्से के पानी को रोकने के भारत की योजना से चिंतित नहीं है.

पाकिस्तान के जल संसाधन मंत्रालय के सचिव ख्वाजा शुमैल ने पाकिस्तान के अख़बार डॉन से कहा कि यदि भारत अपनी पूर्वी नदियों के पानी को अपने लोगों के लिए इस्तेमाल करता है तो इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि सिंधु जल समझौता ऐसा करने की अनुमति देता है.

उन्होंने कहा कि सिंधु जल संधि के संदर्भ में भारत के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बयान को चिंताजनक नहीं मानता है.

पाकिस्तान की ओर से यह बयान उस ख़बर के बाद आया जिसमें कहा गया कि भारत ने पाकिस्तान को जाने वाली अपनी तीन नदियों के पानी को रोकने का बड़ा फ़ैसला किया है.

हालाँकि, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के दफ़्तर ने बीबीसी को बताया कि ये दीर्घकालिक योजना है और इसका सिंधु नदी संधि से कोई लेना-देना नहीं है.

लेकिन कुछ मीडिया ख़बरों में ये कहा जा रहा है कि भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को जाने वाली तीन नदियों का पानी रोकने का फ़ैसला किया है.

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सिंधु जल संधि कायम रहेगी

लेकिन गडकरी के दफ़्तर ने ये स्पष्ट किया कि इस फ़ैसले का पुलवामा हमले से कोई संबंध नहीं है. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि सिंधु जल संधि अपनी जगह कायम रहेगी.

गडकरी के दफ़्तर ने गुरुवार को कहा था कि, "रावी, सतलज और ब्यास नदियों का पानी डैम बनाकर रोका जाएगा. शाहपुर-कांडी डैम बनाने का काम पुलवामा हमले के पहले से ही हो रहा है. अब कैबिनेट अन्य दो डैम बनाने पर फ़ैसला लेगी."

ख्वाजा ने कहा कि रावी पर शाहपुर-कांडी बांध बनाना चाहता है, जो 1995 से रुका पड़ा है. अब वे (भारत) इसे बनाना चाहते हैं ताकि इनके हिस्से के पानी का इस्तेमाल किया जा सके जो अभी पाकिस्तान में बह कर आता है. तो यदि वो इस पानी को रोककर और वहां बांध बनाकर या किसी अन्य तरीके से उसका इस्तेमाल करना चाहते हैं तो वो करें. इसे लेकर हमें न तो कोई चिंता है और न ही कोई आपत्ति, क्योंकि सिंधु जल संधि में इसे लेकर अनुमति है.

हालांकि ख्वाजा शुमैल ने कहा कि यदि भारत पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम और चेनाब) के पानी को मोड़ने या रोकने का प्रयास करेगा तो निश्चित ही पाकिस्तान इस पर अपनी चिंता व्यक्त करेगा, क्योंकि इन नदियों के पानी पर हमारा अधिकार है.

पाकिस्तान के सिंधु जल संधि कमिश्नर सैयद मेहर अली शाह के अनुसार, इस समझौते ने 1960 में ही पूर्वी नदियों के पानी का इस्तेमाल करने का हक़ भारत को दिया था अब ये उन पर है कि उसे वो इस्तेमाल करें या नहीं.

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Image caption पुलवामा हमले का शिकार सीआरपीएफ़ की गाड़ी

पुलवामा हमले से पहले भारत आए थे पाक विशेषज्ञ

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पाकिस्तानी विशेषज्ञों के तीन सदस्यीय शिष्टमंडल ने 28 जनवरी से एक फ़रवरी के दरम्यान चेनाब नदी पर कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स का दौरा किया था, इनमें पकल दुल जल विद्युत परियोजना (1,000 मेगावाट), लोअर कलनाई जल-विद्युत परियोजना (48 मेगावाट), रातले जल-विद्युत परियोजना (850 मेगावाट) और बगलिहार जल विद्युत परियोजना (950 मेगावाट) शामिल हैं.

इसके अलावा, भारत ने पुलवामा हमले से कुछ दिन पहले ही सिंधु जल संधि के तहत अपनी तीन रन-ऑफ़-द-रिवर हाइड्रोपावर परियोजनाओं को पाकिस्तान से साझा किया था.

पुलवामा में चरमपंथी हमले के बाद से ही भारत में सिंधु जल संधि के तहत पाकिस्तान को दिये जाने वाले पानी पर प्रतिबंध लगाने की मांग जोरों पर है. भारत ने पाकिस्तान से 'मोस्ट फेवर्ड नेशन' का दर्जा वापस लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को अलग-थलग करने की अपनी तरफ से कूटनीतिक दबाव बनाने का काम शुरू कर दिया है.

2016 में उड़ी चरमपंथी हमले के बाद भी भारत में सिंधु जल संधि को तोड़ते हुए पाकिस्तान को जाने वाले पानी को रोकने की मांग की गई थी.

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क्या है सिंधु जल संधि?

1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए सिंधु जल संधि के तहत- सिंधु, झेलम और चेनाब का पानी पाकिस्तान को दिया गया और रावी, ब्यास, सतलज का पानी भारत को दिया गया.

इसमें ये भी था कि भारत अपनी वाली नदियों के पानी का, कुछ अपवादों को छोड़कर, बेरोकटोक इस्तेमाल कर सकता है. वहीं पाकिस्तान वाली नदियों के पानी के इस्तेमाल का कुछ सीमित अधिकार भारत को भी दिया गया था. जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी.

समझौते के मुताबिक कोई भी एकतरफ़ा तौर पर इस संधि को नहीं तोड़ सकता है या बदल सकता है.

बंटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली नदियों पर हुए विवाद की मध्यस्थता वर्ल्ड बैंक ने की थी. लिहाजा यदि भारत यह समझौता तोड़ता है तो पाकिस्तान सबसे पहले विश्व बैंक के पास जाएगा. और विश्व बैंक भारत पर ऐसा नहीं करने के लिए दबाव बना सकता है.

इस समझौते में चीन को शामिल नहीं किया गया है जबकि सिंधु नदी तिब्बत से शुरू होती है. अगर चीन नदी को रोक दे या बहाव को बदल दे तो दोनों देशों के लिए नुकसानदायक होगा.

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