भारत मोहनजोदड़ो की मूर्ति पाकिस्तान को लौटाए: वुसअत का ब्लॉग

  • 27 फरवरी 2019
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पिताजी बताते हैं कि विभाजन के ज़माने में ट्रांज़िस्टर टेक्नोलॉजी नहीं आई थी और रेडियो बिजली से ही चलता था.

एक आदमी विभाजन के बाद जब लुट-पिटकर पाकिस्तान पहुंचा तो हर वक़्त ऑल इंडिया रेडियो सुनता रहता.

किसी ने पूछा, "भईया कभी रेडियो पाकिस्तान भी सुन लिया करो." तो कहने लगा कि ऑल इंडिया रेडियो सुनना ज़्यादा ज़रूरी है क्योंकि कम से कम दुश्मन की बिजली तो ख़र्च हो रही है.

यह बात यूं याद आई कि जब भारत में क्रिकेटर हरभजन सिंह समेत बहुत से लोगों की तरफ़ से यह मांग होने लगी कि इंग्लैंड में होने वाले क्रिकेट विश्व कप में भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई मैच न खेले, भले ही पाकिस्तान को भारतीय बायकॉट के बदले दो प्वाइंट्स ही क्यों न मिल जाएं.

मगर सुनील गावस्कर ने कहा कि पुलवामा की ख़ूनी घटना का ग़ुस्सा अपनी जगह है लेकिन इस ग़ुस्से के बदले बिना मुक़ाबला किए क्रिकेट के मैदान में पाकिस्तान को मुफ़्त के दो प्वाइंट्स थमा देने से आख़िर भारत को क्या मिलेगा.

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'जोश मलीहाबादी की क़ब्र पर कालिख़ पोत दें'

फिर ख़बर आई कि कश्मीरी छात्रों और परिवारों को कई राज्यों में हमलों, धमकियों और ख़ौफ़ का सामना करना पड़ रहा है. फिर यह ख़बर मिली कि बेंगलुरू में 53 वर्ष से मौजूद 'कराची बेकरी' का कुछ जोशीले युवाओं ने घेराव किया ताकि कराची बेकरी में से कराची शब्द हटा दिया जाए या बेकरी बंद कर दी जाए.

कराची से आकर बेंगलुरू में बसने वाले खानचंद रमनानी ने ग़ुस्से में भरी मंडली को बताया कि वह ख़ुद 1947 में सिंध छोड़कर भारत में बसे और उन्होंने अपनी बेकरी का नाम कराची बेकरी किसी पाकिस्तानी के कहने पर नहीं रखा बल्कि अपनी जन्मभूमि से जुड़ी यादों को ज़िंदा रखने के लिए रखा है.

अगर यह कोई ग़लत बात है तो 60 सालों तक किसी ने उन्हें यह क्यों नहीं बताया. ग़ुस्सा ऐसे भी उतारा जा सकता है हमने तो यह सोचा नहीं था.

मगर अब हम यह सोच रहे हैं कि जब कभी इस्लामाबाद जाएं तो जोश मलीहाबादी की क़ब्र पर कालिख़ पोत दें क्योंकि मलीहाबाद तो भारत में है.

फ़िराक़ गोरखपुरी, असग़र गोंडवी, अकबर इलाहाबादी और ग़ौस मथरावी की शायरी कराची यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी से निकाल फेंके क्योंकि यह सारी जगहें तो भारत में है और भारत पाकिस्तान का दुश्मन है.

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'पाकिस्तान में बम्बई बेकरी का नाम बदला जाए'

पाकिस्तान के हैदराबाद में विभाजन से पहले की 'बम्बई बेकरी' मौजूद है और उसका मालिक एक पाकिस्तानी हिंदू है.

क्या मैं उससे कहूं कि पाकिस्तान में रहना है तो बम्बई बेकरी का नाम मक्का या मदीना बेकरी रखे या कम से कम कराची बेकरी रख ले.

क्या कल से मैं देहली कबाब हाउस और बुंदू ख़ान मेरठवाले को भारतीय एजेंट समझकर उसके शीशे तोड़ दूं?

क्या मुझे पाकिस्तान से अपनी मोहब्बत जताने के लिए भारत से नफ़रत करना ज़रूरी है? अगर बेंगलुरु की कराची बेकरी इसलिए सुरक्षित नहीं कि कराची पाकिस्तान में है तो फिर मोहनजोदड़ो से मिलने वाली 'डांसिंग गर्ल' भी पाकिस्तान को लौटा दें क्योंकि मोहनजोदड़ो तो पाकिस्तान में है.

और 'जन गण मन अधिनायक जय हे' में पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा में से सिंध निकालकर उड़ीसा डाल दें और सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा भी फाड़कर फेंक दें क्योंकि यह इक़बाल ने लिखा था और इक़बाल अब पाकिस्तान के राष्ट्रीय कवि हैं.

'बंदर की बला तबेले के सिर, गिरा गधी पर से और ग़ुस्सा कुम्हार पर' यह हम सब बचपन से सुनते आ रहे हैं, मगर यही कुछ करते भी तो आ रहे हैं. इसीलिए तो हम दक्षिण एशियाई यहिंच खड़े हैं और दुनिया आगे बढ़कर कहीं से कहिंच पहुंच गई है.

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