अमरीकी विमानों के दम पर टिकी है पाकिस्तानी वायु सेना

  • 28 फरवरी 2019
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13 अप्रैल, 1948 को पाकिस्तान के रिसालपुर में पहली बार मोहम्मद अली जिन्ना ने तत्कालीन रॉयल पाकिस्तान वायु सेना के सदस्यों से कहा था कि "पाकिस्तान को अपनी वायु सेना जल्द तैयार कर लेनी चाहिए."

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा था कि "यह एक कुशल वायु सेना होनी चाहिए, जो किसी से भी पीछे नहीं हो और पाकिस्तान की रक्षा के लिए सेना और नौसेना के साथ खड़ा हो सके."

71 साल बाद आज पाकिस्तानी वायु सेना सुर्ख़ियों में है और स्थितियां सामान्य नहीं हैं.

बालाकोट के बाद भारत और पाकिस्तान की वायु सेना सक्रिय हैं और दोनों देशों ने एक-दूसरे के विमानों को मार गिराने का दावा किया है.

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भारतीय वायु सेना दुनिया की चौथी बड़ी सेना है. उसके पास 31 लड़ाकू दस्ता है. एक लड़ाकू दस्ते में 17 से 18 जेट होते हैं.

वहीं पाकिस्तान अपने पास 20 लड़ाकू दस्ता होने का दावा करता है और इस तरह भारतीय वायु सेना पाकिस्तानी वायु सेना से कहीं आगे है.

लेकिन इस तरह की तुलना एक-दूसरे के शक्तिशाली होने की पूरी कहानी नहीं बताता है.

रॉयल पाकिस्तान वायु सेना के शुरुआती दिन बहुत अच्छे नहीं थे. इस बात का ज़िक्र पाकिस्तान के आधिकारिक इतिहास में किया गया है.

लिखा गया है, "बंटवारे के निर्णय के बाद आधिकारिक समझौते के तहत पाकिस्तान को हथियारों, उपकरणों और विमानों का वैध हिस्सा देने के बाद भी भारत ने तत्कालीन रॉयल पाकिस्तान वायु सेना को मानने से इंकार कर दिया था."

"भारत से जो भी मिला था उसमें से अधिकांश सही नहीं थे. उपकरणों के बक्से में रद्दी माल और बेकार चीज़ें थीं और कुछ नहीं था."

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पाकिस्तान वायु सेना की यात्रा

कश्मीर को लेकर 1947-48 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष के बाद पाकिस्तान वायु सेना की यात्रा की शुरुआत हुई.

1965 और 1971 में लड़े गए युद्धों के दौरान भारत और पाकिस्तान की वायुसेना ने सक्रिय भूमिका निभाई थी. यही कारण है कि दोनों देश की सेना इनके पराक्रमों को मान्यता देती है.

आज पाकिस्तान के एफ़-16 और जेएफ़-17 थंडर विमानों की बात हो रही है. एफ़-16 का निर्माण अमरीका करता है, वहीं जेएफ़-17 थंडर चीन की मदद से पाकिस्तान ने बनाया है.

एफ़-16 सिंगल इंजन लड़ाकू विमान है, जिसे पाकिस्तान ने पहली बार 1982 में अपनाया था. अभी पाकिस्तान के पास इसका चौथा जेनरेशन मॉडल है.

इसके मुक़ाबले जेफ़-17 कहीं हल्का और सभी तरह के मौसम में इस्तेमाल किया जाने वाला लड़ाकू विमान है. इसे दिन और रात कभी भी इस्तेमाल किया जा सकता है. यह 'मल्टी-रोल' लड़ाकू विमान है.

आने वाले सालों में यह पाकिस्तान वायु सेना का सबसे शक्तिशाली विमान होगा, जो फ्रांस के मिराज जैसे पुराने विमानों की जगह ले लेगा.

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पाकिस्तान के दावे

पाकिस्तान वायु सेना जेएफ़-17 की पांचवी पीढ़ी को विकसित कर रहा है जो और भी उन्नत संस्करण होगा. हालांकि इस बारे में बहुत कम सुना और देखा गया है.

पाकिस्तान वायु सेना तीन जगहों से अपना नियंत्रण क़ायम करता है- पेशावर, लाहौर और कराची. इसके अलावा इसका एयर डिफेंस कमांड रावलपिंडी में है और स्ट्रैटेजिक कमांड इस्लामाबाद में है.

पाकिस्तान दावा करता है कि उसके पास एयर रडार, जटिल रख रखाव की सुविधाएं और उसे लॉन्च करने का बेहतर सेटअप नेटवर्क है.

हालांकि ये दावे मई 2011 में धरे रह गए थे, जब अमरीकी सेना ने अफ़ग़ानिस्तान से पाकिस्तान में घुस कर ओसामा बिन लादेन को मारा था.

पाकिस्तान वायु सेना उस समय अमरीकी घुसपैठ का पता नहीं लगा सकी थी, जिसने सभी को चौंका दिया था.

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नीतिगण निर्णय

एक और दिलचस्प पक्ष है.

पिछले साल कैलिफोर्निया के थिंकटैंक रंद कोऑर्पोरेशन ने कहा था, "पाकिस्तान वायु सेना के नीतिगत निर्णय थल सेना लेती है. ये निर्णय वायु सेनाध्यक्ष की सलाह पर लिए जाते हैं. इसलिए वायु सेना के असल निति निर्धारक वायु सेना अध्यक्ष नहीं, थल सेना अध्यक्ष होते हैं."

इसका वायु सेना पर क्या असर होता है?

पाकिस्तान वायु सेना के पूर्व एयर ऑपरेशन डायरेक्टर और लेखक क़ैसर तुफ़ैल कहते हैं, "दुनिया में कोई भी वायु सेना ऐसी नहीं है, जिसके पास वो सबकुछ है जो वह चाहता है. कुछ मायनों में आर्थिक ज़रूरत कभी पूरी नहीं होती, क्या ऐसा नहीं है? लेकिन मैं उन सभी से असहमत हूं जो यह कहता है कि पाकिस्तान वायु सेना को उसका हक़ नहीं मिलता है."

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वायु सेना का विकास

पाकिस्तान वायु सेना के विकास के बारे में वो बताते हैं, "मेरे हिसाब से पाकिस्तान वायु सेना का विकास तीन चरणों से गुज़रा है. पहला, पाकिस्तान के गणतंत्र बनने तक. पाकिस्तान वायु सेना उस समय इस्तेमाल किए गए उपकरण चलाता था."

"इसके बाद दूसरा चरण रहा जब पाकिस्तान सेंट्रल ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (CENTO) और साउथ इस्ट एशिया ट्रिटी ऑर्गेनाइजेशन (SEATO) में शामिल हुआ. यह चरण भारत के ख़िलाफ़ लड़े गए 1965 के युद्ध तक चला. इस चरण में अमरीका के कई स्टार फाइटर जेट को शामिल किया गया, जिसमें एफ़ 86 और एफ़ 104 शामिल है. इस चरण में पाकिस्तान वायु सेना के सभी पायलट अमरीकी वायु सेना के साथ प्रशिक्षण लेते थे."

तीसरा चरण तब शुरू हुआ जब 1965 के युद्ध के बाद पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाए गए.

उन्होंने कहा, "इस चरण ने हमें विविधता दिखाई और प्रयास जारी है."

भारतीय वायु सेना के कुछ लोगों को लगता है कि पाकिस्तान की वायु सेना विकसित नहीं हो पाई है.

पिछले साल भारतीय वायु सेना के उपप्रमुख पद से रिटायर हुए एयर मार्शल एसबी देव कहते हैं, "पाकिस्तान की वायु सेना हमारी बराबरी करना चाहती है. उनके पायलट बहुत बुरे नहीं हैं लेकिन मेरी समझ में पाकिस्तान वायु सेना को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उनकी वायु सेना अपनी ताक़त बढ़ाने के लिए चीन की तरफ़ देख रही है."

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क्या पाक वायु सेना को कमतर आंकता है भारत?

क्या भारतीय वायु सेना पाकिस्तान की वायु सेना को कमतर आंकती है.

इस सवाल का जवाब रिटायर एयर वाइस मार्शल और भारतीय वायु सेना में पायलट रहे अर्जुन सुब्रमण्यम 'ना' में देते हैं.

वो बालाकोट हमले के आधार पाक वायु सेना को कमतर न आंकने की सलाह देते हैं.

वो कहते है, "जिस तरह का हमला भारत ने किया है, मेरे हिसाब से किसी भी देश की वायु सेना होती तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ता. इसका पूरा श्रेय भारतीय वायु सेना को जता है जो सही से टार्गेट कर सकी और हमले कर सकी."

पाकिस्तान वायु सेना के बारीकियों के बारे में विस्तार से बताते हुए उन्होंने कहा, "मुझे उनके एयर डिफेंस नेटवर्क की क्षमता पर किसी तरह का संदेह नहीं है. लेकिन मेरी समझ में उनके एफ़ 16 में कुछ कमियां हैं और जहं तक जेएफ़ 17 की बात है तो युद्ध में इस्तेमाल के लिए सफल और साबित विमान नहीं है."

क़ैसर तुफ़ैल कहते हैं, "आज पाकिस्तान के पास कम तरह के लड़ाकू विमान हैं, जिसकी देख रेख करना आसान है. चूंकि हमने भारतीय वायु सेना का सामना किया है, इसलिए हम अत्यधिक अनुशासित हैं."

चीन से उनके संबंधों पर वो कहते हैं, "चीन के साथ हमारे संबंधों स्पष्ट है. जेएफ़-17 थंडर हो या फिफ्थ जेनेरेशन लड़ाकू विमान, हम सही रास्ते पर हैं और बेहतर विकास कर रहे हैं. हम अपने खुद के उपकरण भी बना रहे हैं और काफी तेज़ गति ये काम कर रहे हैं."

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