भारत-पाकिस्तान तनाव: क्या मोदी पर भारी पड़े इमरान ख़ान

  • 2 मार्च 2019
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पाकिस्तान से भारतीय पायलट विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई के साथ ही कश्मीर में हमले के बाद दोनों परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच उपजे तनाव में कमी की उम्मीद की जा रही है.

ऐसे में यह सवाल उठता है कि पूरे संकट के दौरान धारणाओं की लड़ाई में आख़िर कौन जीता? गुरुवार को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संसद में घोषणा की थी कि पाकिस्तान भारतीय पायलट को 'शांति की उम्मीद' में भारत को सौंप देगा.

दिल्ली में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी दिन वैज्ञानिकों की एक बैठक को संबोधित कर रहे थे.

इमरान ख़ान की घोषणा के बाद मोदी ने पाकिस्तान पर तंज कसते हुए कहा था, "पायलट प्रोजेक्ट पूरा हो गया है और अब हमें इसे सच में कर दिखाना है."

मोदी की यह टिप्पणी उनके समर्थकों को ख़ूब रास आई. लेकिन कई लोगों को यह टिप्पणी बेस्वाद और आत्मुग्धता भरी लगी.

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'एयरस्ट्राइक' के बाद कहां खड़े हैं भारत-पाकिस्तान

मंगलवार को जब भारतीय लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तानी इलाक़े में घुस कथित रूप से बलाकोट में मौजूद चरमपंथी कैंपों पर बम गिराए तो पीएम मोदी ने एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा, "मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि देश सुरक्षित हाथों में है." इस रैली में मोदी ने ख़ूब तालियां बटोरीं.

लेकिन 24 घंटों के भीतर ही पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की और दावा किया कि उन्होंने पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में भारत के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया.

पाकिस्तान का दावा उस वक्त सच भी साबित हो गया जब उस हादसाग्रस्त विमान के पायलट विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को एक वीडियो में पाकिस्तानी क़ब्ज़े में देखा गया.

हालांकि इस दौरान दोनों देशों पर तनाव कम कर शांति स्थापित करने का दबाव था. ऐसे में इमरान ख़ान पहले दो क़दम आगे बढ़े और उन्होंने भारतीय पायलट को रिहा करने की घोषणा की.

पूर्व भारतीय राजनयिक और कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ केसी सिंह मानते हैं कि इमरान ख़ान की डिप्लोमैटिक रिवर्स स्विंग में मोदी ने ख़ुद को फँसा हुआ पाया.

(रिवर्स स्विंग क्रिकेट में इस्तेमाल किया जने वाला शब्द है जिसमें घूमती हुई गेंद अचानक से बल्लेबाज की तरफ़ आती है. इमरान ख़ान दुनिया के बेहतरीन क्रिकेटर रहे हैं.)

सुरक्षा का संकट

भारत में 2014 में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आने के बाद से मोदी की पकड़ भारतीय राजनीति में और मज़बूत होती गई. स्थानीय मीडिया के आज्ञाकारी रुख़ के कारण मोदी की दबंग राष्ट्रवादी छवि उभरकर सामने आई है.

ऐसे में कई लोग हैरान हैं कि जब देश मुश्किल हालात में था और परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसी से युद्ध की अफ़वाह हिलोरे मार रही थी, उस वक़्त अपने ब्यूरोक्रेट्स और सेना के अधिकारियों को मीडिया के सामने भेजने के बजाय मोदी ख़ुद सामने क्यों नहीं आए.

इस तरह की नाराज़गी भारत की मुख्य विपक्षी पार्टियों में भी थी. देश की 21 विपक्षी पार्टियों ने मोदी की इस बात के लिए आलोचना की कि जब देश उनके कार्यकाल में बड़े सुरक्षा संकट के मुहाने पर खड़ा है तब वो चुनावी और राजनीतिक कार्यक्रमों में व्यस्त रहे और यहां तक कि एक वो एक मोबाइल ऐप के लॉन्चिंग कार्यक्रम में भी शामिल हुए.

कई लोग मानते हैं कि पाकिस्तान की तत्काल जवाबी कार्रवाई में भारत के लड़ाकू विमान का गिराया जाना और एक पायलट का सीमा पार गिरफ़्तार किया जाना मोदी के लिए क़रारा झटका था और हैरान करने वाला था.

इस दौरान इमरान ख़ान तनाव कम करने और बातचीत की पेशकश करते रहे. इसी क्रम में उन्होंने भारतीय पायलट की रिहाई की भी घोषणा कर दी.

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केसी सिंह मानते हैं कि इमरान ख़ान इस दौरान गरिमामयी और धैर्यशील छवि बनाने में कामयाब रहे. ख़ान ने एक संदेश दिया कि पाकिस्तान मसलों का समाधान संवाद के ज़रिए करने के लिए तैयार है. भारतीय पायलट को वापस भेजने की घोषणा कर पीएम ख़ान ने सबको हैरान कर दिया.

इस दौरान इमरान ख़ान अपने लोगों, सुरक्षा अधिकारियों और मीडिया से नियमित तौर पर बात करते रहे. भारत में कई लोगों को लग रहा है कि पूरे घटनाक्रम में इमरान ख़ान एक 'प्रासंगिक नेता' के तौर पर सामने आए जो बातचीत और शांति के ज़रिए तनाव को कम करने के लिए राह खोजने की पहल कर रहा है.

दूसरी तरफ़ भारतीय पीएम मोदी के हाथों से पूरा घटनाक्रम फिसलता नज़र आया. इतिहासकार श्रीनाथ राघवन मानते हैं कि पाकिस्तान ने पूरे मामले में हैरान किया है.

भारत ने 14 फ़रवरी को पुलवामा में 40 से ज़्यादा सीआरपीएफ़ के जवानों के मारे जाने के बाद पाकिस्तान पर आधी रात को कार्रवाई की थी.

लेकिन पाकिस्तान की जवाबी कार्रवाई ज़्यादा तीव्र और अक्खड़ रही. पाकिस्तान ने दूसरे ही दिन उजाले में ऐसा किया.

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'प्रतिशोध रणनीति नहीं होती'

एख भारतीय पालयट का पाकिस्तान में पकड़ लिया जाना मोदी सरकार की उम्मीदों और उसकी बनाई छवि के उलट थी. इससे इस पूरे मामले को लेकर सरकार की तैयारी भी सवालों के घेरे में है.

पाकिस्तान के क़ब्ज़े में भारतीय पायलट के आने से घटनाक्रम का पूरा रुख़ ही बदल गया. अब पायलट को वापस लाने की बात होने लगी.

पाकिस्तान के हमले के 30 घंटे बाद भारत की सेना की तरफ़ से बयान आया. इसके बाद मोदी और उनकी सरकार के नियंत्रण में घटनाक्रम नहीं रहा. आख़िरकार सरकार पूरे मामले पर नियंत्रण के लिए अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश करती दिखी.

मोदी कोई पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं जिन्हें पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूहों के उकसावे से सुरक्षा संकट का सामना करना पड़ा है. इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह को भी सीमा पार से होने वाले हमलों का सामना करना पड़ा है और भारत ने इसका जवाब भी दिया है.

लेकिन तब सुनियोजित फ़ैसला होता था. राघवन कहते हैं, "प्रतिशोध एक रणनीतिक हथियार नहीं हो सकता. भावनाओं पर आधारित रणनीति कई बार काम नहीं आती."

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भारतीय हवाई हमले के बाद बालाकोट पहुंचा बीबीसी

भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से में पायलट की रिहाई को मोदी की जीत की तरह पेश किया गया. बहुत कम लोग हैं जो सवाल पूछ रहे हैं कि पुलवामा हमला क्या ख़ुफ़िया एजेंसियों की नाकामी नहीं थी? और पाकिस्तान ने कैसे दिन दहाड़े आपके विमान को मार गिराया?

भारत के जाने-माने रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला मानते हैं कि भारतीय सेना पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठनों को अपनी कार्रवाई से रोकने में नाकाम रही है. शुक्ला मानते हैं कि भारतीय सेना अपनी कार्रवाइयों से लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाई है.

शुक्ला कहते हैं, "पाकिस्तान ने दिखाया है कि वो भारत से बराबरी कर सकता है. दशकों से उपेक्षा और फंड के अभाव में भारतीय सेना की स्थिति बदतर होती गई है. ऐसे में मोदी पाकिस्तान पर भरोसे के साथ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर सकते हैं."

दूसरी तरफ़ अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों ने पाकिस्तान के बालाकोट में जहां बम गिराए हैं वहां आतंकी ठिकानों का कितना नुक़सान हुआ है.

भारत की तरफ़ से आधिकारिक रूप से सेना की इस कार्रवाई में कितने लोग मारे गए हैं, इसकी संख्या नहीं बताई गई है जबकि मीडिया का एक धड़ा 300 से अधिक लोगों की मौत का आंकड़ा बता रहा है. कुल मिलाकर पूरे मामले पर मोदी कई सवालों के घेरे में हैं.

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हवाई हमले पर क्या बोले बालाकोट के लोग?

क्या मोदी अपने हाथों से पूरे घटनाक्रम को निकल जाने देंगे. कई लोग मानते हैं कि इमरान ख़ान पाकिस्तान में 'धारणाओं की लड़ाई' भले जीत गए हैं लेकिन मोदी भारत में पूरे घटनाक्रम के नैरेटिव से अपनी पकड़ इतनी आसानी से नहीं जाने देंगे.

जाने-माने स्तंभकार संतोष देसाई कहते हैं, "मीडिया के नैरेटिव पर मोदी का लगभग नियंत्रण है. मुझे नहीं लगता कि मोदी धारणा की लड़ाई हार रहे हैं. उनके समर्थकों को लगता है कि मोदी के दबाव में इमरान ख़ान को भारतीय पायलट को छोड़ना पड़ा."

एमआईटी के प्रोफ़ेसर विपिन नारंग मानते हैं कि दोनों में से कोई भी देश युद्ध नहीं चाहता है. नारंग क्यूबा के मिसाइल संकट को याद करते हैं और कहते हैं कि अगर वहां कुछ भी ग़लती होती तो असहनीय तबाही आ सकती थी.

वो कहते हैं, "दोनों पक्ष सामान्य हो जाएंगे. पाकिस्तान आख़िरकार आतंकवाद ख़त्म कर सकता है और वो उलझने से बचना चाहेगा. भारत रणनीतिक सख़्ती जारी रख सकता है."

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