क्या शिया-सुन्नी टकराव से आगे बढ़ पाएंगे पाक-ईरान

  • 14 मार्च 2019
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जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में भारतीय सुरक्षाबलों पर आत्मघाती हमले से ठीक एक दिन पहले, 13 फ़रवरी को ईरान के अशांत सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में रेवोल्यूशनरी गार्ड्स को ले जा रही एक बस पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें ईरान के 27 जवान मारे गए थे.

सुन्नी मुस्लिम चरमपंथी समूह जैश अल-अद्ल ने इस हमले की ज़िम्मेदारी ली थी.

ईरान का सीधा आरोप है कि पाकिस्तान की फ़ौज और ख़ुफ़िया एजेंसी इन चरमपंथियों को पनाह देती है. ईरान ने पाकिस्तान को चेतावनी भी दी कि उसे इसकी भारी क़ीमत चुकानी होगी. लेकिन पाकिस्तान इस आरोप को ग़लत बताता है.

इस्लामाबाद में मौजूद बीबीसी संवाददाता आसिफ़ फ़ारूक़ी कहते हैं, ''ईरान और पाकिस्तान के रिश्ते बहुत जटिल हैं. कभी ऐसा लगता है कि दोनों भाई-भाई जैसे हैं. लेकिन बीते दिनों दोनों के रिश्तों में शत्रुता नज़र आई है.''

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Image caption ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी

आसिफ़ फ़ारूक़ी कहते हैं, ''रेवोल्यूशनरी गार्ड्स पर चरमपंथी हमले के मामले में पाकिस्तान कहता है कि हमला करने वाला गुट ईरान में ही रहता है, जो दोनों देशों के बॉर्डर गार्ड्स को चकमा देकर सीमा के इस पार-उस पार आता-जाता है. पाकिस्तान का कहना है कि उन्हें फ़ौज या ख़ुफिया एजेंसी की मदद हासिल है, ये कहना पाकिस्तान के साथ ज़्यादती होगी.''

शिया-सुन्नी समीकरण

पाकिस्तान में बहुसंख्यक मुसलमान सुन्नी हैं जबकि ईरान में शिया मुसलमानों का बोलबाला है. यही वजह है कि पाकिस्तान और ईरान के संबंध में शिया-सुन्नी समीकरण अहम भूमिका अदा करते हैं

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भारत की तरह ईरान भी कहता है कि पाकिस्तान को चरमपंथ की भारी क़ीमत चुकानी होगी.

आसिफ़ फ़ारूक़ी बताते हैं, ''एक ज़माना था जब शिया-सुन्नी मामले का अहम रोल था. अब इतना ज़्यादा नहीं है. लेकिन 80 के दशक में ईरान की क्रांति के बाद पाकिस्तान में बेहद उग्र सुन्नी समूह बने थे. कहा जाता है कि उन्हें सऊदी हुक़ूमत की हिमायत हासिल थी. फिर उनके मुक़ाबले के लिए पाकिस्तान में ही शिया उग्र समूह बनने लगे.''

''माना जाता है कि उन्हें ईरान की हुक़ूमत की हिमायत हासिल थी. पाकिस्तान में बहुत अरसे तक शिया-सुन्नी में जमकर हिंसा हुई. फिर शिया-सुन्नी गुटों पर जब सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया तो हिंसा कम हो गई.''

''लेकिन सऊदी अरब के नेतृत्व में चरमपंथ के ख़िलाफ़ जो गठबंधन बना है, उसमें पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ खड़ा है जबकि ईरान उसके मुख़ालिफ़ है. इस वजह से पाकिस्तान पर ईरान ये आरोप लगाता है कि वो शिया-विरोधी गुट का सदस्य है. यही वजह है कि पाकिस्तान-ईरान संबंधों में एक बार फिर शिया-सुन्नी समीकरणों की झलक नज़र आ रही है.''

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Image caption सऊदी क्राउन प्रिंस, पाकिस्तान में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के साथ

सऊदी अरब की भूमिका

शीतयुद्ध के ज़माने में पाकिस्तान और ईरान दोनों अमरीकी ख़ेमे में थे और उनमें काफ़ी सहयोग था. लेकिन वर्ष 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पाकिस्तान और ईरान के दरम्यान तनाव बढ़ना शुरू हुआ. सऊदी अरब ने इसमें अहम भूमिका निभाई.

भारत के पूर्व राजनयिक विवेक काटजू बताते हैं, ''सऊदी अरब ख़ुद को इस्लामी देशों का नेता मानता है. दूसरी तरफ़ ईरान को भी लगता है कि वही मुसलमानों का नेता है. दोनों देशों ने पाकिस्तान में गुटों को समर्थन दिया. उन गुटों ने जमकर मारकाट मचाई. लेकिन साल 2016 के बाद ये देखने में आया कि ईरान ने अपना दबदबा बढ़ाने की कोशिश की. ये तब की बात है जब अमरीका और ईरान के बीच परमाणु समझौता हो गया था. इलाक़े में ईरान ने अपना दबदबा दोबारा क़ायम करना चाहा.''

इसी कड़ी में ईरान ने पुलवामा में भारतीय सुरक्षाबलों पर हुए आत्मघाती हमले की पुरज़ोर भर्त्सना की. भारत की विदेश नीति में ईरान को सहयोगी माना जाता है.

विवेक काटजू कहते हैं, ''ईरान में चाबहार बंदहगार भारत के सहयोग से विकसित हो रहा है. इससे मध्य एशिया की तरफ़ जाने के लिए एक वैकल्पिक मार्ग बनेगा. तेल और गैस के मामले में भी दोनों देशों के बीच सहयोग जारी है. हालांकि अमरीकी प्रतिबंधों की वजह से इस सहयोग में थोड़ी बाधा आती है. लेकिन दोनों देश कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हैं.''

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Image caption चाबहार बंदरगाह

ब्लैक ट्रेड या ब्लैक इकॉनमी

इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता आसिफ़ फ़ारूक़ी पाकिस्तान-ईरान संबंधों का एक क़ारोबारी पहलू बताते हैं, ''पाकिस्तान और ईरान कई वर्षों से कोशिश कर रहे हैं कि आपसी क़ारोबार को बढ़ाया जाए, जो इस वक़्त बहुत ही कम है. लेकिन कोशिशें कामयाब नहीं हो रहीं.''

''दोनों के बीच सीमा पर तनाव एक बड़ी वजह है. लेकिन पाकिस्तान यदि ईरान से कुछ लेना भी चाहे तो अमरीकी प्रतिबंधों की वजह से नहीं ले पाता. इसलिए पाकिस्तान और ईरान के बीच तस्करी जमकर होती है. दोनों के बीच ब्लैक ट्रेड या ब्लैक इकॉनमी के संबंध बड़े तगड़े हैं.''

शायद यही वजह है कि पाकिस्तान के प्रति ईरान का रवैया कभी नर्म तो कभी गर्म रहा. पाकिस्तान के लिए भी ये चुनौती बनी रही कि वो सऊदी अरब या ईरान, दोनों में से किसके ज़्यादा क़रीब दिखे.

आसिफ़ फ़ारूक़ी बताते हैं, ''पल में तोला, पल में माशा- ईरान और पाकिस्तान के संबंध ऐसे ही है. कभी ठीक हो गए कभी ख़राब हो गए. पाकिस्तान में सरकार बदलने के बाद कोई नीतिगत बदलाव नहीं आया है.

वो कहते हैं, ''ये ज़रूर है कि सऊदी अरब का जो सैन्य गठबंधन है, पाकिस्तान की माली हालत को दुरुस्त करने के लिए उसने जो आर्थिक मदद दी है, सऊदी क्राउन प्रिंस पाकिस्तान आए, भारत के साथ तनाव में जो भूमिका अदा की, इन सबकी वजह से सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के संबंध और अधिक क़रीबी हुए हैं. ये बहुत स्वाभाविक है कि जब आप सऊदी अरब के नज़दीक होंगे, ईरान से दूर होते जाएंगे. पाकिस्तान के लिए ये संतुलन बड़ा मुश्किल है.''

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