समझौता ट्रेन धमाके का फ़ैसला ऐन वक़्त पर टलवाने वाली राहिला कौन

  • 14 मार्च 2019
राहिला वकील

11 मार्च 2019, शाम चार बजे.

सभी को 2007 के समझौता ट्रेन धमाके में पंचकुला की अदालत के फ़ैसले का इंतज़ार था.

हिंदुत्ववादी विचारधारा रखने वाले असीमानंद सहित सुनील जोशी, रामचंद्र कालसांगरा, संदीप डांगे और लोकेश शर्मा का नाम आरोप पत्र में शामिल है.

तभी ख़बर आई कि फ़ैसले को 14 मार्च के लिए टाल दिया गया है.

कारण था कि एक पाकिस्तानी महिला राहिला वकील ने एक भारतीय वकील मोमिन मलिक के माध्यम से अदालत में दिए आवेदन में कहा कि मामले से जुड़े पाकिस्तानी चश्मदीदों को बुलाया जाए और वो भी अपनी बात अदालत के सामने रखना चाहते हैं.

जांच एजेंसी एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) के वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी से कहा कि इससे पहले अदालत के कई समन जारी करने के बावजूद पाकिस्तान की तरफ़ से से कोई जवाब नहीं आया था.

उधर राहिला का दावा है कि उन्हें आज तक कोई समन नहीं मिला.

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फ़ैसले के ऐन वक्त पर आवेदन दाख़िल करने वाली राहिला वकील आखिर कौन हैं?

समझौता ब्लास्ट से संबंध

18 फ़रवरी 2007 को हरियाणा के पानीपत में हुए एक धमाके और उसके बाद लगी आग में 68 लोग मारे गए थे. मरने वालों में ज़्यादातर पाकिस्तानी थे.

मैं धमाके के कुछ घंटे बाद ही घटनास्थल पर पहुंचा था.

धमाके और आग से रेल के डिब्बे अंदर और बाहर से पूरी तरह जल गए थे.

कुछ दूर पर ही एक कमरे में मृतकों के कुछ शवों को इकट्ठा करके रखा गया था.

भारत सरकार के मुताबिक़ मरने वालों में मोहम्मद वकील भी शामिल थे. राहिला मोहम्मद वकील के बेटी हैं.

पाकिस्तान के हफ़ीज़ाबाद ज़िले के ढींगरावाली गांव की रहने वाली राहिला मानने को तैयार नहीं हैं कि ट्रेन हादसे में उनके पिता मोहम्मद वकील की मौत हो गई थी.

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समझौता ब्लास्ट: आखिर कौन हैं राहिला वकील?

राहिला का मानना है कि उनके पिता किसी भारतीय जेल में बंद हैं.

लंबे वक्त से भारत में राहिला के वकील पानीपत के मोमिन मलिक के मुताबिक उन्होंने करीब 90 भारतीय जेलों में आरटीआई के माध्यम से जानकारी मांगी लेकिन कहीं भी मोहम्मद वकील नहीं मिले.

आठ भाई-बहनों में सबसे बड़ी राहिला 18 जनवरी को अपने घर पर ही थीं जब उन्हें टीवी पर ट्रेन बम धमाके का पता चला.

पिछली रात 11 बजे ही उनकी अपने पिता से फ़ोन पर बातचीत हुई थी.

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मोहम्मद वकील 11 जनवरी को एक महीने के लिए भारत के मुजफ्फ़रनगर में अपने परिवार से मिलने पहुंचे थे लेकिन पाकिस्तान में बेटे के एक्सीडेंट के बाद वो जल्दी ही वापस पाकिस्तान की ओर रवाना हो गए.

लेकिन वो आज तक घर नहीं पहुंचे.

राहिला की मां का परिवार उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर का रहने वाला है.

दावे

राहिला के वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे सहयोगी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि अधिकारियों को कई चिट्ठियां लिखने के बाद ही साल 2010 में एनआईए ने उनसे मोहम्मद वकील की मौत की पुष्टि की.

बीबीसी से बातचीत में राहिला ने अपने दावे के चार मुख्य आधारों को गिनाया.

  • उनका दावा है कि न उनका न उनके किसी रिश्तेदार का डीएनए समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट के मृतकों से मेल खाया है.
  • राहिला का दावा है कि मुज़फ्फ़रनगर से छपने वाले एक अखबार में हमले में बच गए स्थानीय लोगों की सूची में उनके पिता का नाम था.
  • उनका कहना है कि साल 2009 में पाकिस्तान की ओर से जारी एक सूची जारी की गई थी जिसमें भारतीय जेलों में कथित तौर पर बंद सात पाकिस्तानी कैदियों के नाम थे. मोहम्मद वकील का नाम भी उस सूची में था.
  • मुजफ़्फ़रनगर में रहने वाले राहिला के मामा मारूफ़ अली के मुताबिक उन्होंने घटना के कुछ वक्त बाद दिल्ली की एक इमारत में एक फ़िल्म 'रील' में मोहम्मद वकील को देखा था जो ट्रेन में बैठे हुए थे, हालांकि वो कौन सी इमारत थी, क्या उन्होंने ये तस्वीरें किसी टीवी चैनल या वीडियो पर देखीं, उनसे बातचीत में ये बातें साफ़ नहीं हो पाईं.

उधर एनआईए के वकील राजन मल्होत्रा के मुताबिक़ राहिला ने तो "रेलवे ट्राइब्यूनल से क्लेम भी ले लिया है."

राहिला की अपने पिता से क्या आख़िरी बात हुई थी?

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धमाके के एक दिन पहले की रात को याद करते हुए राहिला बताती हैं, "मामू ने अब्बू से बात करवाई थी... अब्बू ने कहा था कि हम ट्रेन में बैठ गए हैं. ट्रेन चलने वाली है. आपके मामू दिल्ली में ट्रेन में बैठाने आए हुए हैं. आप लोग परेशान न हों."

धमाके के थोड़े वक्त बाद ही राहिला अपने अंकल के साथ 10 दिनों के इमरजेंसी वीज़ा पर पानीपत पहुंचीं.

वो बताती हैं, "रेलवे वालों ने सामान चेक करवाया. मैंने एक-एक शव को देखा और चेक किया", लेकिन उन्हें अपने पिता से जुड़ा कोई सामान नहीं मिला.

राहिला के मुताबिक पानीपत में उनका डीएनए टेस्ट हुआ जिसके नतीजे किसी भी शव के डीएनए से मैच नहीं हुए.

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उनका दावा है कि 2008-9 में उनके पास भारत सरकार की ओर एक चिट्ठी आई जिसमें कहा गया कि उनका बेटा या भाई दोबारा डीएनए टेस्ट के लिए भारत आए.

वो कहती हैं, "मेरे छोटे भाई और चाचा भारत गए. उनका भी डीएनए टेस्ट किसी शव से मैच नहीं हुआ."

मुआवज़ा

एनआईए वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया राहिला ने तो "रेलवे ट्राइब्यूनल से क्लेम भी ले लिया है... नो नो नो. उनका कहना है कि चश्मदीद एक दो ज़िंदा हैं... उन्होंने कोई नाम भी नहीं दिए हैं."

उधर राहिला का परिवार कोई मुआवज़ा मिलने से इनकार करती हैं.

उनके वकील मोमिन मलिक ने अमृतसर में हमारे साथी रविंदर सिंह रॉबिन को बताया कि साल 2010 में उन्होंने मुआवज़े की रक़म के लिए अदालत में एक अर्ज़ी दाखिल की थी.

सात साल बात कुछ रक़म पाकिस्तान में भारतीय उच्चायोग के पास भेजी गई लेकिन राहिला के परिवार ने ये रक़म लेने से मना कर दिया.

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पाकिस्तान में राहिला के वकील राणा अज़ीज़ का कहना है कि उनके पास मोहम्मद वकील की मौत की पुष्टि करने वाले कोई कागज़ात नहीं हैं, इसलिए वो किस कारण कोई मुआवज़ा लेते.

वकील परिवार के मुताबिक पानीपत में एक कब्र में दबे शव के डीएनए सैंपल के मोहम्मद वकील से मैच होने की बात सामने आई थी लेकिन भारतीय वकील मोमिन मलिक ने जब जांच की तो पता लगा कि वो कराची के किसी व्यक्ति का शव था.

राहिला कहती हैं, "उनके (भारतीय अधिकारियों के) पास कोई तो सुबूत होगा. किसको दिए हैं पैसे? मुझे बताएं किसको पैसे दिए हैं? कितने पैसे खाए हैं? हमने तो पैसों की कोई डिमांड ही नहीं की है. अगर पैसे चाहिए होते तो मैं पैसे और एक शव लेकर उसी समय आ जाती. 13 साल से क्यों ज़लील होते इस चीज़ के लिए."

राहिला बताती हैं कि हादसे के बाद मृतकों और घायलों के परिवारजनों के रहने का इंतज़ाम पानीपत हास्पिटल में किया गया था.

वो कहती हैं, "वो 15 लाख रुपए देने का ऑफ़र कर रहे थे. मुझे भी कहा कि आप भी 15 लाख रुपए ले लें. दो-तीन शव ऐसे थे जिनकी शिनाख्त नहीं हो पा रही थी. उन्होंने कहा कि आप कोई भी शव लेकर जा सकते हो. ये किसी न किसी इंसान की तो हैं ना. आप एक बॉडी ले जाओ. आपको भारत सरकार 15 लाख रुपए दे रही है. एक रेलवे के वज़ीर ने मुझे ये कहा लेकिन मैंने कहा कि बात 15 लाख रुपए की नहीं है. जब मुझे अपने वालिद साहब से जुड़े सुबूत नहीं मिले, तो मैं क्यों लेकर जाऊं. आप 15 लाख रुपए की बात कर रहे हैं. मैं आपको 30 लाख रुपए का ऑफ़र करती हूं."

परिवार पर असर

राहिला के मुताबिक उनके पिता के नहीं रहने से परिवार पर भारी सामाजिक और आर्थिक असर पड़ा है.

अपना मां हाशिरुन बेगम के बारे वो कहती हैं, "अम्मी बीपी और दिल की मरीज़ बन चुकी हैं. 13 साल कोई इंसान उम्मीद पर बैठा हो, ना उसे कोई इंसाफ़ न मिल रहा हो या कोई सुनवाई न हो रही हो, तो उसका क्या होगा. जिसे अपने पांच बेटियों और तीन बेटों को पालना हो और आगे दुनिया में चलने के काबिल बनाना हो, उसका क्या होगा."

राहिला के अनुसार घर की आर्थिक हालत को संभालने के लिए उनके भाइयों को अपनी पढ़ाई तक छोड़ देनी पड़ी.

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भारतीय अदालत से उम्मीद

साल 2007 के बाद राहिला अपने पिता से जुड़ी जानकारी और जांच के बारे में और जानने वो साल 2012 में भी भारत आईं.

वो कहती हैं, "तकरीबन 2012 में मैं जब गई हूं केस की डेट थी लेकिन उन्होंने हमें अदालत में पेश होने नहीं दिया. न हमें अदालत में भारतीय सरकार ने बुलाया हमें कि हम अपना मौकिफ़ बयान कर सकें.... जब हमें बुलाया नहीं जाता तो हम कैसे पेश हों."

अब भारतीय अदालत से उनकी क्या उम्मीद होगी?

राहिला कहती हैं, "हम चाहते हैं कि अदालत आदेश दे कि हमें वीज़ा दिया जाए. मैं अदालत के सामने बोलना चाहती हूं, ताकि हमें पता चले कि हमारे पिता कहां हैं, किस जगह पर हैं, जिंदा हैं और कहां हैं."

वो कहती हैं, "आखिरी सांस तक इंसान को उम्मीद रहती है. उम्मीद तो तभी खत्म होगी जब कोई सुबूत सामने आएगा."

उधर 14 मार्च को अदालती कार्रवाई पर एनआईए के वकील राजन मल्होत्रा ने बीबीसी को बताया, "एनआईए अपना जवाब पेश करेगी. उसके बाद बहस होगी. उसके बाद अदालत फ़ैसला करेगी."

(इनपुट्स - अमृतसर से रविंदर सिंह रॉबिन, हफ़ीज़ाबाद (पाकिस्तान) से नइम अब्बास)

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