#Christchurch: सोशल मीडिया पर कैसे हुआ वायरल हमले का वीडियो

  • 16 मार्च 2019
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न्यूज़ीलैंड के क्राइस्टचर्च में शुक्रवार को दो मस्जिदों पर हुए हमले में 49 लोगों की मौत हो गई और 20 से ज़्यादा लोग घायल हुए. इस हमले के मुख्य संदिग्ध को कोर्ट में पेश किया गया.

मुख्य संदिग्ध ब्रेंटन टैरंट 28 वर्षीय ऑस्ट्रेलियाई नागरिक है. कोर्ट में पेशी के दौरान संदिग्ध ने सफेद कमीज पहनी हुई थी और उनके हाथ में हथकड़ी लगी थी.

न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जैसिंडा अर्डर्न के मुताबिक संदिग्ध हमलावर के पास पांच बंदूकें और एक लाइसेंसशुदा हथियार था. प्रधानमंत्री ने क्राइस्टचर्च हमले को आतंकवादी घटना बताया है. न्यूज़ीलैंड में भारत के राजदूत संजीव कोहली ने बताया है कि क्राइस्टचर्च में हुए इस हमले के बाद नौ भारतीय मूल के नागरिक भी लापता हैं.

इस घटना का सबसे चौंकाने वाला पहलू ये है कि संदिग्ध ने मस्जिद पर हमले के पूरे वाकये को कैमरे में कैद करके सीधे फ़ेसबुक पर लाइव स्ट्रीम किया.

सोशल मीडिया पर ये वीडियो वायरल हो गया यानी बहुत तेज़ी से फैल गया. इस वीडियो को सोशल मीडिया कंपनी अपने प्लेटफॉर्म से जब तक हटातीं तब तक दुनिया भर के कई यूजर्स इसे शेयर कर चुके थे.

इस घटना के वीडियो की तस्वीरों को, ग्राफ़िक तस्वीरों और इस वीडियो को कई बड़ी न्यूज़ वेबसाइट ने पहले पन्ने पर जगह दी.

इस घटना ने एक बार फिर ये साबित किया है कि कैसे फ़ेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और रेडिट जैसी सोशल मीडिया वेबसाइट्स अपने प्लेटफॉर्म पर दक्षिणपंथी अतिवाद को रोकने में नाकाम हैं.

हिंसा के वीडियो शेयर न करने की अपील करने में भी ये सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पीछे रहे. इनके पहले आम यूज़र्स ने दूसरे यूज़र्स से अपील की कि वो ये वीडियो शेयर न करें.

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Image caption इस हमले पर चल रही सुनवाई के दौरान कोर्ट के बाहर अपने पिता की तस्वीर लेकर खड़े हमले के शिकार उमर नबी.

सोशल मीडिया पर क्या शेयर हुआ?

न्यूज़ीलैंड हमले से ठीक 10-20 मिनट पहले एक दक्षिणपंथी वेबसाइट 8 चैन ने एक पोस्ट शेयर किया. इसमें हमले के संदिग्ध व्यक्ति के फ़ेसबुक पेज का लिंक दिया गया था. इस पेज पर ही संदिग्ध ने हमले को लाइव स्ट्रीम किया और कुछ दस्तावेज़ भी साझा किए जो नफ़रत के विचारों से भरे हुए थे.

डेटा का विश्लेषण करने वाली संस्था बेलिनकैट के विश्लेषक रॉबर्ट इवान के मुताबिक जो दस्तावेज़ इस फ़ेसबुक पेज पर शेयर किए गए इसमें नफ़रत वाली भाषा के साथ निम्न स्तर की ट्रोलिंग की गई थी. ऐसा लोगों का ध्यान बंटाने के लिए किया गया था.

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Image caption ब्रेंटन टैरंट नाम के शख़्स की प्रोफ़ाइल से हमले की लाइव स्ट्रीमिंग हुई थी

हमलावर ने इस पूरे हमले को लाइव स्ट्रीम किया, लेकिन जब तक फेसबुक इसे उस पेज से हटाता तब तक इसे डाउनलोड या कॉपी करके पूरे प्लेटफॉर्म पर वायरल किया जा चुका था.

इस वीडियो को हटाए जाने के बाद भी इसे सोशल मीडिया पर देखा जा सकता था. या यूं कहें कि जिस तेज़ी से इसे यूट्यूब-फ़ेसबुक ने हटाया, उससे कई ज़्यादा तेज़ी से इसे दोबारा कई यूट्यूब चैनल ने अपलोड कर दिया.

कई ऑस्ट्रेलियाई मीडिया ब्रॉडकास्टरों ने इस वीडियो के कुछ फ़ुटेज प्रसारित किए. ऐसा ही कई अखबारों ने भी किया.

बज्जफ़ीड के पत्रकार रेयान मैक ने इस वीडियो को शेयर करने वालों की एक टाइमलाइन बनायी और जो सामने आया वो चौंकाने वाला था. कई वैरिफ़ाइड ट्विटर अकाउंट जिसके 694,000 फॉलोवर थे उन्होंने भी इस वीडियो को शेयर किया.

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सोशल मीडिया कंपनियों ने क्या किया?

सभी सोशल मीडिया कंपनियों ने गोलीबारी के पीड़ितों के लिए संवेदनाएं व्यक्त कीं. उन्होंने इस लाइव वीडियो को हटाने में तेज़ी दिखायी.

फ़ेसबुक ने ट्वीट कर बताया है कि उसने हमलावर के फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट से इन वीडियो को हटा दिया है. साथ ही फ़ेसबुक ने कहा है कि वह इस अपराध और हत्यारे की प्रशंसा करने वाले वीडियो को भी हटा रहे हैं.

दूसरी ओर यूट्यूब ने कहा है कि इस हमले से जुड़े सभी हिंसात्मक वीडियो को हम हटाने का काम कर रहे हैं.

अगर हम ये देखें कि सोशल मीडिया कंपनियों ने अति दक्षिणपंथी चरमपंथ को अपने प्लेटफॉर्म पर रोकने के लिए हालिया समय में क्या किया है तो हमें कई तरह-तरह के उपाय नज़र आएंगे.

साल 2017, दिसंबर में ट्विटर ने कई अति दक्षिणपंथी और नफ़रत फ़ैलाने वाले कई अकाउंट को ब्लॉक कर दिया. इस सिलसिले में ट्विटर ने रिचर्ड स्पेंसर का अकाउंट भी ब्लॉक कर दिया. रिचर्ड स्पेंसर एक 'अमेरिकी श्वेत राष्ट्रवादी' हैं जिन्होंने 'अल्टरनेटिव राइट' शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल किया था.

फ़ेसबुक ने भी साल 2018 में स्पेंसर का अकाउंट ब्लॉक कर दिया. फ़ेसबुक ने ऐसा करने के पीछे ये तर्क दिया कि उसके लिए स्पेंसर के नफ़रत फैलाने वाले भाषण और राजनीतिक भाषण में फ़र्क कर पाना मुश्किल हो रहा है.

मार्च महीने में, यूट्यूब पर ये आरोप लगा कि उसने प्रतिबंधित नियो-नाज़ी समूह 'नेशनल एक्शन' को बढ़ावा देने वाले वीडियो को रोकने में गैर-ज़िम्मेदार रवैया अपनाया.

ब्रितानी सांसद ईवेट कूपर ने यूट्यूब पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म ने इन वीडियो को ब्लॉक करने का वादा तो किया लेकिन ये इस पर बार-बार नज़र आते रहे.

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सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म क्या कर सकते हैं?

सर्वे विश्वविद्यालय की राजनीति वैज्ञानिक सीरन गिलेस्पी का मानना है कि ये समस्या वीडियो से कई आगे बढ़ चुकी है.

गिलेस्पी कहते हैं, ''ये सिर्फ़ इस तरह के वीडियो का प्रसारण करने का मसला नहीं है. इस तरह के वीडियो को रोकने में सोशल मीडिया कंपनियां तेज़ी दिखा रही हैं. लेकिन एक बार अगर ये वीडियो शेयर होने लगे तो इसे रोका नहीं जा सकता क्योंकि इस प्लेटफ़ॉर्म का व्यवहार ही कुछ ऐसा है कि इसे रोकना मुमकिन नहीं होगा. लेकिन इस तरह के कंटेंट को शेयर होने से पहले सावधानी बरतते हुए रोका जा सकता है. ''

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गिलेस्पी कहते हैं कि एक शोधकर्ता होने के नाते वो यूट्यूब का खूब इस्तेमाल करते हैं और कई बार उन्हें अति दक्षिणपंथी सामग्रियां मिलती रहती हैं.

गिलेस्पी का मानना है कि इस क्षेत्र में यू ट्यूब को काफ़ी काम करने की ज़रूरत है. क्योंकि उसके चैनल पर अति दक्षिणपंथी और नस्लवादी सामग्रियों का भंडार है.

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