भारत-पाक अपने ग़ुस्से को पीने पर क्यों हैं मजबूर- वुसत का ब्लॉग

  • 18 मार्च 2019
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जब चार दिन पहले भारत और पाकिस्तान ने अटारी में सीमापार करतारपुर कॉरिडोर बनाने के बारे में विस्तार से बातचीत की और उसके बाद सौहार्दपूर्ण वातावरण की बात करते हुए संयुक्त घोषणापत्र जारी किया तो मुझे भी ख़ुशी हुई कि आपसी गर्मागर्मी और छिछा-लेदर अपनी जगह, पर चलिए चार वर्ष में पहली बार किसी भी विषय पर किसी भी बहाने दोनों मिल तो बैठे और जल्दी फिर मिल बैठेंगे.

मगर अगले ही दिन अख़बार 'द हिंदू' में ये पढ़ कर मज़ा किरकिरा हो गया कि बातचीत में भाग लेगने वाले एक भारतीय कर्मचारी का कहना है कि वो पाकिस्तान के रवैये से ख़ुश नहीं.

पहले पाकिस्तान वीज़ा फ्री कॉरिडोर की बात कर रहा था अब वो यात्रियों के लिए कुछ फीस के साथ स्पेशल परमिट की शर्त लगा रहा है.

भारत कहता है कि रोज़ाना पांच हज़ार यात्रियों को करतारपुर साहिब के दर्शन की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि सात सौ यात्री रोज़ाना ठीक हैं.

भारत कहता है कि यात्रियों को पैदल आने जाने की इजाज़त होनी चाहिए और पाकिस्तान कहता है कि नहीं. 15-15 के ग्रुप में गाड़ी में बैठा कर लाया ले जाया जाएगा.

इसके अलावा पाकिस्तान ने गुरुद्वारे की वो सौ एकड़ ज़मीन भी कॉरिडोर तामीर के बहाने कब्ज़े में ले ली है जो महाराजा रणजीत सिंह ने दान की थी.

और ये कि उत्तरी अमरीका की सिख फ़ॉर जस्टिस नामक संस्था ने अगले वर्ष करतारपुर में 'ख़ालिस्तान रेफेरेन्डम' के नाम से एक सम्मेलन का भी ऐलान किया है. इससे पता चलता है कि इन लोगों को पाकिस्तान का समर्थन हासिल है.

हो सकता है कि दोनों देशों की मुलाक़ात के अंदर की ये सब बातें ठीक हों लेकिन पाकिस्तान ने अंदर की कोई बात भी मीडिया को अब तक नहीं बताई. सिर्फ़ ये कहा है कि अगली मुलाक़ात दो अप्रैल को होगी.

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जब मुलाक़ात होती है तो दोनों तरफ़ से दस तरह की बातें एक दूसरे के सामने रखी जाती हैं. क्या ये उचित है कि किसी भी समझौते से पहले अंदर की सारी बातें मीडिया को पता चल जाएं.

वैसे इनमें से ऐसी कौन-सी बात है जो मिल बैठकर नहीं सुलझाई जा सकती और उसे चौक में बैठ कर तय करना ही ज़रूरी है?

मुझे ऐसा लग रहा है कि करतारपुर कॉरिडोर पर दोनों देश एक दूसरे को दूध तो ज़रूर पेश कर रहे हैं लेकिन मेघनिया डाल कर. और नुक़सान किसका है- सिर्फ़ समुदाय का.

आपने बचपन में लोमड़ी और सारस की कहानी तो ज़रूर सुनी होगी जिनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती.

एक दिन शेर ने कहा कि "बस अब बहुत हो गया, अब दोस्ती कर लो."

शेर के कहने पर दोनों ने मजबूरन हाथ मिलाया और लोमड़ी ने सारस को खाने पर बुलाया.

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सारस जब बन-ठन कर आया तो लोमड़ी ने पतले शोरबे से भरी प्लेट सारस के आगे रख दी. अब सारस की चोंच इतनी लंबी थी कि प्लेट में रखा शोरबा पीना बहुत मुश्किल था. तो लोमड़ी ने कहा कि "अरे भाई सारस आप तो बहुत तकल्लुफ़ कर रहे हैं, ये देखिए ऐसे पिया जाता है."

और फिर लोमड़ी ने ज़बान निकाली और लप-लप कर के सारा शोरबा सुड़क लिया.

अगले दिन सारस ने भी लोमड़ी को खाने पर बुलाया और सामने एक सुराही रख दी जिसके अंदर बोटियां पड़ी हुई थीं.

अब भला लोमड़ी की थूथनी सुराही में कैसे जाती. ग़ुस्सा तो बहुत आया मगर पी गई.

सारस ने कहा, "लोमड़ी आपा, आप तो बहुत ही तकल्लुफ कर रही हैं. ये देखिए सुराही में से बोटियां ऐसे खाते हैं."

सारस ने अपनी पतली चोंच सुराही में डाली और सारी बोटियां सटक लीं.

मैं सोच रहा हूं कि अटारी में तो भारत को ग़ुस्सा आ गया अब दो अप्रैल को वाघा में पाकिस्तान भारतीय शिष्टमंडल को करतारपुर की थाली में शोरबा पिलाएगा या सुराही में बोटियां परोसेगा.

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