'बर्बाद' होते वेनेज़ुएला के लिए भारत क्यों है संजीवनी

  • 18 मार्च 2019
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Image caption साल 2016 में भारतीय गैस कंपनी के निदेशक के साथ वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति मादुरो

अमरीका ने वेनेज़ुएला पर प्रतिबंध लगाकर ना सिर्फ़ उसके सबसे बड़े ग्राहक को उससे दूर कर दिया है बल्कि उसकी आय का प्रमुख स्रोत भी बंद कर दिया है. अमरीका वेनेज़ुएला के तेल का सबसे बड़ा ग्राहक रहा है.

अमरीका ने वेनेज़ुएला के साथ तेल और अन्य उत्पादों का व्यापार करने वाले देशों पर भी जुर्माना लगाने की बात कही है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मडुरो हैं.

अमरीका सहित कई अन्य पश्चिमी देश निकोलस मडुरो का विरोध कर रहे हैं और उन्हें वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता नहीं देते हैं.

इन प्रतिबंधों के चलते वेनेज़ुएला में कच्चे तेल का उत्पादन लगातार घटता जा रहा है. एसएंडपी ग्लोबल प्लेट्स की ओर से प्राप्त डेटा के अनुसार पिछले महीने वेनेज़ुएला में कच्चे तेल का उत्पादन 1.10 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक गिर गया.

जनवरी महीने के मुक़ाबले इन आंकड़ों में 60 हज़ार बैरल प्रतिदिन की गिरावट आई है. इतना ही नहीं वेनेज़ुएला का तेल उद्योग साल 2003 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.

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एसएंडपी ग्लोबल प्लेट्स के अनुसार फ़रवरी माह के अंतिम दिनों में वेनेज़ुएला के बंदरगाहों पर 10.8 मिलियन बैरल तेल अपने ग्राहकों के इंतज़ार करता रहा.

पिछले साल दिसंबर तक इसमें से अधिकतम तेल अमरीका निर्यात होता था, लेकिन अब इसकी सभी संभावनाएं ख़त्म हो चुकी हैं.

वेनेज़ुएला अब अपने तेल के निर्यात के लिए दूरस्त देशों की ओर निगाहें गड़ाए हैं, जिसमें भारत सबसे प्रमुख है. अमरीका के बाद अगर किसी देश में वेनेज़ुएला से तेल का निर्यात होता है तो वह भारत ही है.

यह जानना दिलचस्प है कि आख़िर भारत और वेनेज़ुएला के बीच वाणिज्यिक संबंध कैसे स्थापित हुए और मौजूदा वक़्त में दोनों देश एक दूसरे के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हो गए.

तेल की मांग

भारत चीन के बाद सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश है, इसकी वजह से यहां तेल की मांग भी लगातार बढ़ती जा रही है.

बीते एक दशक में भारत की सालाना औसतन विकास दर सात प्रतिशत रही है. वाहन चलाने वालों और फैक्ट्रियों के संख्या में भी वृद्धि हुई है. यही वजह है कि भारत में तेल की खपत भी तेजी से बढ़ी है. भारत अब दुनिया भर में तेल का आयात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है.

तेल की अपनी बढ़ती मांग के लिए भारत लगातार अलग-अलग देशों तक पहुंचा हैं. इसमें इराक़, सऊदी अरब, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, मेक्सिको, ब्राज़ील और रूस प्रमुख हैं.

इसके अलावा भारत ने उन देशों से भी तेल के लिए संपर्क साधा जिनसे उसके अन्य साथी राष्ट्र दूरी बनाकर रखते हैं, जैसे ईरान और वेनेज़ुएला.

विल्सन सेंटर रिसर्च की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार साल 2012 से 2017 के बीच वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए ने हर साल भारत को औसतन चार लाख 24 हज़ार बैरल तेल प्रतिदिन बेचा.

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अमरीका के प्रतिबंधों की घोषणा के दो हफ्ते बाद कंपनी के अध्यक्ष और पीपल्स पावर ऑफ पेट्रोलियम के मंत्री मैनुअल क्वेवेदो ने नई दिल्ली की यात्रा की. इसे कई मीडिया ने "सरप्राइज विजिट" बताया था.

यहां उन्होंने ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े एक कार्यक्रम में शिरकत की और भारतीय अधिकारियों से भी मुलाक़ात की.

उन्होंने कहा था, "भारत के साथ हमारे रिश्ते जारी रहेंगे, व्यापार जारी रहेगा और हम सभी व्यापारिक रिश्तों को मज़बूत करेंगे."

क्वेवेदो ने भारत को दूसरे तरह के भुगतान प्रणाली की भी पेशकश की थी, "जैसे सामानों के बदले सामान" ताकि अमरीकी बैंकिंग प्रणाली को नज़रअंदाज किया जा सके.

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विल्सन सेंटर की रिपोर्ट तैयार करने वाले हरि शेषासायी ने बीबीसी वर्ल्ड को बताया कि इसका नतीजा यह हुआ कि उस महीने भारत तेल ख़रीद में वेनेजुएला का सबसे बड़ा ग्राहक बन कर उभरा. भारत हर दिन पांच से छह लाख बैरल तेल ख़रीदने लगा था.

तो क्या भारत को प्रतिबंधों से चिंतित नहीं है?

छोटी अवधि

शेषासायी के मुताबिक वेनेज़ुएला के कच्चे तेल की ख़रीद में वृद्धि की मुख्य वजह बड़ी छूट है जो दो बड़ी भारतीय कंपनियां- रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी को दी गई. ये दो निजी कंपनियां वेनेज़ुएला के कच्चे तेल के सबसे बड़े ख़रीदार हैं.

रिलायंस इंडस्ट्रीज भारत की सबसे बड़ा व्यापारिक कंपनी है, जिसके मालिक मुकेश अंबानी को फ़ोर्ब्स मैगज़ीन ने पिछले साल एशिया का सबसे अमीर आदमी बताया था.

रॉयटर्स न्यूज एजेंसी के मुताबिक़ नायरा एनर्जी का संबंध रूसी तेल कंपनी रोस्नेफ्ट से है. साल 2017 के मध्य में दोनों के बीच क़रार हुआ था.

प्रतिबंध लगाए जाने से पहले स्विटज़रलैंड की फर्म ट्रैफिग्योरा से भी इसकी साझेदारी थी. यह स्विस फर्म वेनेज़ुएला के मध्यस्थ के रूप में काम करता था और कच्चा तेल ख़रीद कर चीन और अमरीका को दोबारा बेचता था.

रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी के पास भारत की सबसे बड़ी रिफाइनरी है और इनमें से कई सबसे आधुनिक हैं.

ये वेनेज़ुएला के कच्चे तेलों को रिफाइन करने में सक्षम हैं. इस तरह अमरीका को नज़रअंदाज़ करना वेनेज़ुएला के लिए आसान रहा है.

इसके अलावा चीन और रूस के उलट भारत वेनेज़ुएला के साथ तेल का व्यापार नक़दी में करता है. वेनेज़ुएला के मडुरो सरकार पर चीन और रूस का बड़ा ऋण है, जिसे वो तेल के ज़रिए चुकाने को मजबूर हैं.

भारत के साथ सामान के बदले सामान का व्यापार करना वेनेज़ुएला के लिए काफ़ी आसान है और फ़ायदेमंद भी क्योंकि भारत तेल से लेकर दवा तक का उत्पादन करता है.

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अथाह तेल वाले वेनेज़ुएला में भोजन संकट

अमरीकी दबाव

हालांकि विशेषज्ञों ने संदेह जताया है कि वेनेज़ुएला की तेल कंपनियां भारत को एक दिन में पांच लाख बैरल तेल भेज सकती हैं जो पहले अमरीका को देता था.

अमरीका भारत पर यह दबाव बना रहा है कि वो वेनेज़ुएला से तेल ख़रीदना बंद करे.

दोनों देशों के बीच कुछ समय से ट्रेड वॉर चल रहा है. इस महीने की शुरुआत में अमरीका ने कहा था कि वो भारत को तरजीह देना बंद कर देगा, जिसके तहत भारत को 5.6 अरब डॉलर शुल्क की छूट मिलती है.

भारत के विदेश सचिव विजय गोखले और अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो के बीच बीते सोमवार को वेनेज़ुएला के साथ व्यापार के संबंध में चर्चा हुई.

इस बैठक के बाद पोम्पियो ने पत्रकारों से कहा, ''हमने भारत से वही कहा है जो अन्य देशों से कहा कि आप मडुरो शासन के लिए लाइफलाइन का काम मत करिए.''

गेटवे हाउस ग्लोबल इंडियन काउंसिल में ऊर्जा एवं पर्यावरण अध्ययन के विशेषज्ञ अमित भंडारी मानते हैं कि अगर अमरीका और अधिक दबाव डालेगा तो रिलायंस इंडस्ट्री और नायरा एनर्जी जैसी तेल कंपनियां वेनेज़ुएला से तेल खरीदना बंद कर देंगी.

अमित भंडारी ने बीबीसी संवाददाता पूजा अग्रवाल से कहा, "भारत के मामले में सरकार वेनेज़ुएला के साथ तेल के संबंध में बातचीत नहीं करेगी, लेकिन तेल कंपनियां इस संबंध में फ़ैसला ज़रूर ले सकती हैं. अगर कोई कंपनी अमरीका के प्रतिबंधों का उल्लंघन करती है तो उस पर और अधिक जुर्माना लग सकता है. जैसा कि बीएनपी परिबास बैंक के साथ हुआ. इस बैंक ने अमरीका के ईरान, उत्तर कोरिया और क्यूबा पर लगाए प्रतिबंधों का उल्लंघन किया था, तब अमरीका ने उस पर 8,900 मिलियन अमरीकी डॉलर का जुर्माना लगाया था."

भंडारी मानते हैं कि कोई भी भारतीय कंपनी अमरीका के आर्थिक ढांचे में अपनी पकड़ कमज़ोर करने के बारे में सोच भी नहीं सकती, ऐसा ज़रूर हो सकता है कि भारतीय कंपनियां वेनेज़ुएला से तेल ख़रीदना कम कर दें.

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