हिन्दू हमारे लिए उतने ही प्यारे, भारत अपने अल्पसंख्यकों पर ध्यान दे: पाकिस्तान

  • 26 मार्च 2019
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पाकिस्तान में दो हिंदू लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्म परिवर्तन को लेकर बहस जारी है.

ये दोनों लड़कियां पाकिस्तान के सिंध प्रांत के घोटकी ज़िले की हैं. इन लड़कियों के पिता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद होली के दिन (बीते गुरुवार को) हुआ ये मामला चर्चा में आया.

इन दोनों लड़कियों का भी एक वीडियो सोशल मीडिया में पोस्ट किया गया है, जिसमें ये अपनी मर्ज़ी से इस्लाम अपनाने की बात कर रही हैं. हालांकि दोनों लड़कियां नाबालिग़ हैं इसलिए ये भी सवाल उठ रहे हैं कि नाबालिग़ लड़कियां अपने मन से इस मामले में फ़ैसला कैसे ले सकती हैं?

पाकिस्तान सरकार के मुताबिक़ प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने सिंध और पंजाब की सरकार से इस मामले की जांच करने को कहा है.

इस मामले को लेकर रविवार को भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के सूचना मंत्री चौधरी फ़व्वाद चौधरी के बीच ट्विटर पर नोंक झोंक भी हुई.

पाकिस्तान के सूचना मंत्री चौधरी फ़व्वाद हुसैन से बीबीसी ने इस मुद्दे पर सवाल किए. पढ़िए उनके साथ हुई बातचीत

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बीबीसी: ये मामला बहुत वक़्त से चल रहा है तो क्या जबरन धर्मांतरण पर राष्ट्रीय स्तर पर कोई विधेयक लाया जा सकता है?

फ़व्वाद चौधरी: बुनियादी तौर पर तो ये एक राज्य का मामला है और सिंध प्रांत की सरकार पहले ही धर्मांतरण पर अपना क़ानून बना चुकी है.

मुझे कहना होगा कि उन्होंने एक सराहनीय काम किया है. अगर ज़रूरत पड़ी तो हम इसको लेकर एक केंद्रीय क़ानून भी बना सकते हैं.

देखिए क़ुरान (मुसलमानों का सर्वोच्च धार्मिक ग्रन्थ) हमारा सर्वोच्च क़ानून है.

क़ुरान-ए-पाक में है कि "ला इकराहा फ़िद्दीन" यानी कि दीन (धर्म) के मामले में आप कोई जबर (ज़बरदस्ती) नहीं कर सकते.

जब से इमरान ख़ान ने पाकिस्तान में हुकूमत संभाली है. नया पाकिस्तान की जबसे हमने बुनियाद रखी है. हमारा मामला बिल्कुल साफ़ है कि हमारे यहां, जो हमारे झंडे का सफ़ेद रंग है वो भी हमें उतना ही प्यारा है जितना हमारे झंडे का दूसरा रंग.

अल्पसंख्यकों के लिए हमारी जो प्राथमिकता है वो इस क़दर ज़्यादा है कि अभी हाल में पंजाब में हमने अपने एक सीनियर मंत्री को इस बात पर उनके पद से हटा दिया कि उन्होंने एक बयान दिया जिससे हमारे अल्पसंख्यक हिंदू भाइयों का दिल टूटा था.

इसके ऊपर हमारी स्थिति बिल्कुल साफ़ है. मेरा मानना है कि जब से हमने हुकूमत संभाली है कोई ये शिकायत नहीं कर सकता है कि हमने क़ानून का इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से किया है.

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Image caption भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के सूचना मंत्री चौधरी फवाद हुसैन

बीबीसी: आपने ट्वीट किया कि सुषमा स्वराज को पाकिस्तान के मामले में नहीं बोलना चाहिए. लेकिन उसके कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री इमरान ख़ान (भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र) मोदी को ताना कस रहे थे कि आपके मुल्क में सही स्थिति नहीं है?

फ़व्वाद चौधरी: मेरा पूरा ट्वीट ये था कि बहुत ख़ुशी की बात है कि सुषमा स्वराज को दूसरे देशों में अल्पसंख्यकों के ऊपर होने वाले सलूक का अहसास है लेकिन क्या ही अच्छा हो कि वो अपने मुल्क से ये मामला शुरू करें.

ख़ासकर भारत प्रशासित कश्मीर और गुजरात में जो अल्पसंख्यक हैं, मिनिस्टर साहिबा का ध्यान उनकी तरफ़ भी होना चाहिए.

बुनियादी तौर पर तो मैंने स्वागत किया कि उन्होंने अच्छा किया काम है, लेकिन चैरिटी बिगिन्स एट होम (अच्छे काम की शुरुआत घर से होती है.)

अगर सुषमा स्वराज अपने अल्पसंख्यकों के लिए वही जज्बात रखें तो ये बड़ी अच्छी बात है. लेकिन हिंदुस्तान का रवैया दोहरा है.

मुसलमानों के साथ वहां जो ज़ुल्म हो रहा है, ईसाइयों के साथ जो ज़ुल्म हो रहा है और तो और बौद्ध मत के मानने वालों के साथ जो सलूक हो रहा है, वो तो भारत का चेहरा सबके सामने है.

वो हमें ये नहीं बता सकते. हमें ये सबक़ नहीं दे सकते. वाक़यात हर जगह होते हैं देखना ये होता है कि सरकार कहां खड़ी है?

क्या पाकिस्तान का प्रधानमंत्री हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री की तरह दमन करने वालों के साथ खड़ा है या वो पीड़ित के साथ खड़ा है?

फ़र्क़ हिंदुस्तान और पाकिस्तान में ये है कि पाकिस्तान का प्रधानमंत्री और पाकिस्तान की हुकूमत उन बच्चियों के साथ खड़ी हुई हैं जिनके साथ ज़ुल्म हुआ है.

जबकि भारत में ये होता है कि वो ज़ुल्म करने वालों के साथ खड़े होते हैं. ये बुनियादी फ़र्क़ है हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रवैए में.

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Image caption मसूद अज़हर

बीबीसी : मसूद अज़हर के मुद्दे पर क्या कहेंगे?

चौधरी फ़वाद हुसैन : जो सरकार का बयान है हम उससे जुड़े हुए हैं. मसूद अज़हर हों या कोई और हो, जो पाकिस्तान में होगा, जो पाकिस्तान का शहरी है या नहीं लेकिन उस पर पाकिस्तान का क़ानून लागू होगा.

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