भानमति के कुनबे से कौन बनेगा प्रधानमंत्री: वुसअत का ब्लॉग

  • 1 अप्रैल 2019
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इन दिनों कराची में बैठकर भारतीय चुनाव अभियानों को देखने का वही मज़ा आ रहा है जो गैलरी में बैठकर थिएटर देखने का आता है.

कहां है तुम्हारा 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का पांच वर्ष पुराना दावा, कहां है किसानों के लिए अच्छे दिन, कितना काला धन विदेशों से लाकर जनता की जेबों में डाला, कितनी नौकरियां पांच वर्षों में पैदा कीं?

चुप करो पाकिस्तान की ज़बान में बोलने वालों, हमसे पांच साल का पूछते हो तुमने 60 साल में जनता के लिए क्या किया?

हमारा तो एक प्रधानमंत्री है लेकिन तुम्हारे भानमति के कुनबे में से कौन-बनेगा प्रधानमंत्री? तुम में से किसका सीना 56 का न सही 50 इंच का ही है?

चलिए मोदीजी या उनके विरोधियों का एक-दूसरे पर कीचड़ उछालना बनता है क्योंकि चुनाव का मौसम है.

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पाकिस्तान में भी चुनावी माहौल

पर हमारे यहां पाकिस्तान में ऐसी क्या आफ़त आ पड़ी है कि अगले चुनाव में चार साल पड़े हैं और इमरान ख़ान की सरकार ने मुश्किल से नौ महीने पूरे किए हैं लेकिन फिर भी माहौल ऐसा है कि जैसे हमारे यहां भी अगले महीने चुनाव होने जा रहे हैं.

ज़रदारी और नवाज़ शरीफ़ हम तुम्हारी जेबों से लूट का एक-एक पैसा निकाल लेने तक तुम्हें नहीं छोड़ेंगे. लोग तुम जैसे लूटेरों को कभी भी दोबारा सत्ता में नहीं लाएंगे.

"ओए इमरान ख़ान, ओ मांगे-तांगे की सरकार के रोबोट लीडर, दोस्त देशों से भीख मांगकर ख़र्चे पूरे करने वाले शर्मसार होने की बजाय हमें आंखें दिखा रहा है. हम जब चाहें तुम्हारी हुकूमत गिरा दें."

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ये आपा-धापी इस वक़्त क्यों हो रही है किसी को कुछ नहीं मालूम. डॉलर नौ महीनों में 124 रुपये से बढ़कर 142 रुपये का हो गया है. अगले तीन-चार महीनों में 170 रुपये का होता नज़र आ रहा है.

पेट्रोल पर नौ महीनों में 20 रुपये प्रति लीटर दाम और बढ़ गए हैं. वित्त मंत्री असद उमर कह रहे हैं कि आर्थिक सुधार धीरे-धीरे शुरू हो चुका है. अच्छे दिन बस अगले चौक पर खड़े हैं.

मगर स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान कह रहा है कि छह प्रतिशत आर्थिक विकास का सपना मत देखिए. वार्षिक आंकड़ा अगले तीन से साढ़े तीन प्रतिशत का कांटा भी पार कर जाए तो बड़ी बात समझिएगा, पर सरकार और विपक्ष किसी और ही दुनिया में हैं.

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चुनाव जीतने के लिए ख़ान साहब के वादे

सरकार ने ग़रीबी हटाने के लिए सारी पुरानी चालू योजनाओं पर एहसास के एक नए नाम से नया रंग फेर दिया है. लगता है सारे मसले हल हो चुके हैं इसलिए अब बहस सिर्फ़ इस बात पर हो रही है कि ग़रीब औरतों के लिए 11 सालों से चल रही बेनज़ीर भुट्टो इनकम सपोर्ट प्रोग्राम का नाम बदला जाए या नहीं.

ख़ान साहब ने चुनाव जीतने के जोश में एक करोड़ घरों और एक करोड़ नौकरियों का वादा तो कर दिया पर अब जब उन्हें यह पता चल रहा है कि सरकार की जेब में पैसे तो हैं ही नहीं तो यह कहा जा रहा है कि जब प्राइवेट सेक्टर को आर्थिक नीतियों से जोड़ लिया जाएगा तो नए कारखाने लगेंगे, नई नौकरियां पैदा होंगी. इन नौकरियों के आधार पर लोगों को अपना घर ख़ुद बनाने का मौक़ा मिलेगा. तो यह होगा नया पाकिस्तान. नया पाकिस्तान ज़िंदाबाद.

मुझे क्यों लग रहा है कि जहां भारत में इस महीने एक और शेख़ चिल्ली का चुनाव होने जा रहा है तो हमारे यहां शेख़ चिल्ली को नौ महीने बाद भी यक़ीन नहीं आ रहा है कि वह अब वह विपक्ष में नहीं, सत्ता में हैं और सत्ता में सिर्फ़ अंडे सहने का फ़ॉर्मूला नहीं चलता बल्कि अंडों से चूज़े निकालकर भी दिखाने पड़ते हैं.

अभी तो यूं है कि हमारे यहां विपक्ष सरकार में भी है और सरकार के बाहर भी, पर सरकार कहां है.

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