इसराइल-फ़लस्तीनी विवाद के लिए क्या होगी ट्रंप नीति?

  • 14 अप्रैल 2019
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Image caption माइक पोम्पियो ने हाल ही में पश्चिमी दीवार का दौरा किया था

इसराइल में एक नई कट्टरपंथी सरकार बनने जा रही है. ये ट्रंप की मध्य पूर्व को लेकर शांति योजना को परखने का सही समय है.

विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से बीते दो सप्ताह में चार अलग अलग संसदीय समितियों ने इस बारे में पूछताछ की है लेकिन उन्होंने इसके बारे में कम-से-कम जानकारी बाहर आने देने का हर संभव प्रयास किया है.

यदि इसे लागू करने के समय की बात की जाए तो ये 'तुरंत से लेकर अगले बीस सालों में' कभी भी लागू की जा सकती है.

इसराइली अख़बार कयास लगा रहे हैं कि यहूदियों और मुसलमानों की छुट्टियां ख़त्म होने के बाद मध्य जून के बाद इसे लागू किया जा सकता है.

क्या है नई नीति?

महत्वपूर्ण ये है कि विदेश मंत्री पोम्पियो ने संकेत दिए हैं कि नए प्रस्ताव में फ़लस्तीनी राष्ट्र के निर्माण की बात नहीं है. बीते दो दशकों से अमरीकी नीति का यही आधार स्तंभ था.

हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर इस बारे में कुछ नहीं कहा है.

लेकिन ऐसा लगा कि उन्होंने 'दो राष्ट्र थ्योरी' को समेटने के संकेत दिए. इस बारे में उन्होंने कहा, 'विचार जो नाकाम, पुराने और दोबारा इस्तेमाल करने लायक नहीं है.'

उन्होंने बार बार कहा कि दोनों ही पक्ष अपने आप फ़ैसला लें, जबकि डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद उनसे बार बार ट्रंप प्रशासन की योजना के बारे में जानकारी देने के लिए कहते रहे.

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Image caption बीते महीने पोम्पियो यरूशलम में नेतनयाहू के मेहमान थे

उनके लिए और भी चिंताजनक ये है कि पोम्पियो ने इसराइल के नियंत्रण वाले पश्चिमी तट इलाक़े के सभी हिस्सों को एकतरफ़ा क़ब्ज़े में लेने का विरोध नहीं किया. इसराइली प्रधानमंत्री बार बार ये कहते रहे हैं कि वो ऐसा करेंगे.

उन्होंने ये भी स्पष्ट किया कि ट्रंप प्रशासन का तरीका ज़मीनी सच्चाई को स्वीकार करने का है.

ये एक उपयोगी मोड़ है, ख़ासकर तब जब जिन सच्चाइयों को वो स्वीकार कर रहे हैं वो इसराइल का पक्ष हैं.

नीति कैसे बदली है?

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अब तक की शांति वार्ता में दो राष्ट्रों का प्रस्ताव दिया जाता रहा था जिसमें 1967 के अरब क्षेत्र जिन पर इसराइल ने क़ब्ज़ा कर लिया था वहां सीमा बनाई जाए और आपसी सहमति से दोनों ओर से ज़मीनों की अदला-बदली हो, पर्याप्त सुरक्षा इंतेज़ाम हों, फ़लस्तीनी शरणार्थियों के साथ न्याय हो, यरूशलम पर वार्ता हो, नियंत्रण वाला पूर्वी हिस्सा भी जिसे फ़लस्तीनी अपनी राजधानी होने का दावा करते हैं.

लेकिन अब अमरीका ने यरूशलम को इसराइल की राजधानी मान लिया है, संयुक्त राष्ट्र की उन संस्थाओं की फंडिंग रोक दी है जो फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए काम करती हैं और क़ब्ज़े वाले अन्य इलाक़े गोलान हाइट्स पर इसराइल का अधिकार स्वीकार कर लिया है.

यहूदी विरोधी भावना से लड़ने के लिए विदेश विभाग के नई दूत एलन कार्र ने अमरीकी नीति में इसराइली पक्ष को मज़बूत किया है.

उन्होंने हमें बताया कि यहूदी आबादी वाले पश्चिमी तट में बने सामानों का बहिष्कार करना यहूदियों का विरोध करना है, भले ही ये आबादी अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध हो और इसका विस्तार इतना अधिक हो चुका है कि अब सवाल पूछा जाने लगा है कि फ़लस्तीनी राष्ट्र संभव भी है या नहीं.

वो कहते हैं, "यहूदियों के बनाए सामान को स्वीकार न करना और उनकी पड़ोस में रहने वाले अरब समुदाय के सामान को स्वीकार करना मेरी नज़र में भेदभाव है."

प्रतिक्रिया कैसी रही है?

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अमरीकी प्रशासन के कट्टरपंथी इसराइली सरकार के पक्ष को अपनाने से अमरीका में रह रहे उदारवादी यहूदी भी सकते में हैं.

जे स्ट्रीट लॉबी ग्रुप से जुड़े येरेमी बेन अमि कहते हैं, "उनका ऐसे प्रस्ताव देने का कोई इरादा नहीं है जो इस संघर्ष का समाधान कर दें. बल्कि वो अमरीकी सरकार की स्थिति को इसराइली राजनीति की सबसे कट्टरपंथी विचारधारा से जोड़ रहे हैं."

अब तक के क़दमों को देखते हुए फ़लस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने अमरीका के सभी प्रयासों का बहिष्कार किया है. अमरीकी नीति के योजनाकार और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर इससे बहुत ख़ुश नहीं हैं.

कुशनर और पोम्पियो कहते रहे हैं कि उनकी रणनीति फ़लस्तीनीयों का जीवन बेहतर करने के लिए है और इसके लिए दोनों ही पक्षों को कुछ न कुछ समझौते करने ही होंगे.

मध्य पूर्व को लेकर अमरीका की नई नीति के बारे में ज़्यादा जानकारियां सार्वजनिक नहीं हैं लेकिन जो जानकारियां लीक हुई हैं उनमें खाड़ी के अरब देशों से फ़लस्तीनी क्षेत्रों में अरबों डॉलर निवेश करवाने, फ़लस्तीनी राष्ट्र के बजाए फ़लस्तीनी स्वायत्तता और पश्चिमी तट पर इसराइली की सैन्य मज़बूती पर ज़ोर है.

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क्या है फ़लस्तीनियों की प्रतिक्रिया?

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Image caption पश्चिमी तट में लगातार यहूदी बस्तियों का विस्तार हो रहा है

हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक अधिकतर फ़लस्तीनियों ने अपने नेतृत्व के अमरीकी योजना का बहिष्कार करने का समर्थन किया है क्योंकि वो मानते हैं कि उनकी मूल राष्ट्रीय मांगों को स्वीकार करने की कोई नीयत उन्हें नहीं दिख रही है.

महमूद अब्बास इस समय बेहद अलोकप्रिय हैं.लेकिन हाल के यरूशलम दौरे पर उन्होंने बताया कि फ़लस्तीनियों ने उन्हें कम से कम तीन मुद्दों पर अडिग रहने का श्रेय दिया है. ये हैं यरूशलम, शरणार्थी और वित्तीय दबाव के बावजूद फ़लस्तीनी क़ैदियों के लिए फंड बनाए रखना. इसराइली इन क़ैदियों को आंतकवादी मानते हैं.

संसद में किए गए सीधे सवालों में पोम्पियो ने ये तो माना है कि अमरीकी शांति योजना को लागू करने के लिए दोनों ही पक्षों का इसे स्वीकार करना ज़रूरी है.

"इसे शांतिपूर्ण समाधान बनाने के लिए फ़लस्तीनी लोगों का इससे सहमत होना ज़रूरी है"

ऐसे में अभी तक जो संकेत मिल रहे हैं उनसे लग रहा है कि ये योजना नाकाम होने वाली है. लेकिन फिलहाल तो देखना ये है कि इस योजना में है क्या. भले ही ये दो महीनों में सामने आए या इसमें बीस साल और लग जाएं.

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