इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के बच्चे और पत्नियों का हाल

  • 14 अप्रैल 2019
अल होल कैम्प में बच्चे
Image caption अल होल कैम्प में ऐसे कई बच्चे हैं जिनके माता-पिता का किसी को कुछ नहीं पता

उत्तरपूर्वी सीरिया के अल होल कैम्प में रहने वाले लोगों के चेहरे पर गुस्सा और आंखों में कई सवाल नज़र आते हैं.

इस कैम्प में इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों के छूटे हुए बच्चे और पत्नियां हैं, जो अब अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं.

इस्लामिक स्टेट में शामिल कुछ लड़ाके चरमपंथी विचारधारा से इस कदर प्रभावित हुए थे कि उन्हें अपने अंतिम वक़्त तक यही लगता रहा कि वे अजेय हैं.

वहीं कुछ लड़ाके ऐसे भी थे जो इस्लामिक स्टेट छोड़ कर तो भाग गए लेकिन लौटकर दोबारा कभी अपने घर नहीं गए.

इन लड़ाकों की पत्नियां और बच्चे सरकार की तरफ से बनाए गए कैम्पों में रहने को मजबूर हैं लेकिन उन्हें नहीं पता कि वे कब तक वहां रहेंगे और जाने किस मौक़ा-ए-हालात में उन्हें वहां से चले जाने के लिए कह दिया जाएगा.

उम उस्मा नाम की एक मोरक्कन-बेल्जियन महिला कहती हैं कि वे पिछले छह साल से सीरिया की महिलाओं और बच्चों की मदद कर रही हैं, इनमें से अधिकतर आईएस लड़ाकों के बच्चे और पत्नियां थीं.

अपने नक़ाब को हटाते हुए यह पूर्व नर्स कहती हैं कि नक़ाब पहनना उनकी अपनी मर्जी है. वो कहती हैं, "मैं बेल्जियम में नक़ाब नहीं पहन सकती थी, यहां पहनती हूं क्योंकि यह मेरी इच्छा है."

अल होल कैम्प की बात करें तो यहां रहने वालों की तादात 11 हज़ार से बढ़कर अब 70 हज़ार हो चुकी है.

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Image caption अल होल कैम्प

उम उस्मा कहती हैं कि साल 2016 में ब्रसेल्स में हुए आईएस के हमले के लिए वे किसी तरह की माफी नहीं चाहतीं. उस हमले में 32 लोग मारे गए थे.

वो कहती हैं कि जिस संगठन ने उनके देश में हमला किया उसी संगठन के साथ काम करने पर जो लोग उनसे सवाल पूछते हैं, उस्मा उनको जवाब देना वाजिब नहीं समझतीं.

निशाने पर नवजात

आईएस लड़ाके अपने परिवारों को अपने अंतिम बचाव के तौर पर इस्तेमाल करते रहे हैं.

एक इराक़ी युवक जो आईएस पर हुए हमलों में किसी तरह बच गए थे उन्होंने इस बारे में बताया, "एक दिन में कम से कम दो हज़ार लोग मारे जाते थे. आईएस के लड़ाके परिवारों के टेंट के पास अपनी गाड़ियां खड़ी कर देते थे."

"हम जानते थे कि इन गाड़ियों को निशाना बनाया जाएगा, हम उन लड़ाकों से कहते थे कि वे अपनी गाड़ियां ले जाएं लेकिन वो ऐसा नहीं करते थे और थोड़ी देर में गाड़ियों में आग लग जाती थी."

जब सेना और आईएस लड़ाकों के बीच बाग़ूज़ इलाके में लड़ाई खत्म हो गई तो सेना ने मीडिया के पहुंचने से पहले ही पूरे इलाक़े को साफ़ कर दिया.

छह साल की बच्ची नूर इसी लड़ाई की शिकार है. उसके चेहरे पर धमाके से हुए घाव स्पष्ट देखे जा सकते हैं. नूर का इलाज रेड क्रिसेंट क्लीनिक के कैम्प में चल रहा है.

बीते 15 दिनों से नूर क्लीनिक के बेड पर है. ऐसा महसूस होता है कि जैसे उन्होंने अपने घाव के दर्द को सहन कर लिया है. वो तभी दर्द सी चीखती है जब उसे कुछ हरकत करनी हो.

Image caption युद्ध में घायल बच्ची नूर

अल-होल कैम्प में नूर की तरह और भी कई घायल बच्चे भर्ती हैं. नूर की मां तुर्कमेनिस्तान से हैं. वो भी युद्ध में घायल हुई थीं. नूर के बगल में ही बैठी उसकी मां हर पल नूर को निहारती रहती हैं.

उनकी आंखों में सूख चुके आंसुओं से पता चलता है कि उनके पति आईएस की जंग में शामिल होने गए थे और अब उनकी मौत हो चुकी है.

नूर की हालत और ख़राब हुई तो उन्हें हसकेह शहर के अस्पताल भेज दिया गया. कैम्प में नूर का बेड थोड़ी देर के लिए खाली हुआ लेकिन कुछ ही देर में वहां एक दूसरे बच्चे को लिटा दिया गया.

काले रंग की जैकेट में लिपटी इस बच्ची को देखकर लगता है कि यह इसका जन्म कुछ दिन पहले ही हुआ है. आस्मा नामक इस बच्ची की बहन उसके साथ है.च वह बताती है कि आस्मा छह महीने की है.

Image caption नवजात बच्ची, आस्मा

बाग़ूज़ इलाके में लगभग 169 मासूम बच्चों की मौत होने की ख़बर है. इसके साथ ही इस बात का भी बहुत बड़ा ख़तरा बना हुआ है कि पश्चिमी ताकतें वहां बच गए बच्चों और महिलाओं को अकेला छोड़ देंगी.

वहां छूटे हुए बच्चे अभी भी कट्टरपंथी परिजनों की देख-रेख में हैं. हो सकता है कि आने वाले वक़्त में इन बच्चों को भी कट्टरपंथी भावना का पाठ पढ़ाया जाए.

जो लोग बच गए हैं उन्हें एक खुले ट्रक में भरकर हज़ारों की तादाद में रेगिस्तान के रास्ते अल-होल की तरफ ले जाया जा रहा है.

इस कैंम्प में रहने वाली विदेशी महिलाओं को सुरक्षागार्ड की निगरानी में अलग से रखा जाता है. इसी बीच कैम्प में भी लोगों के भीतर ज़हरीली धारणाएं घर करने लगी है.

एक सुरक्षागार्ड कैम्प में रहने वाले लोगों की तरफ इशारा करते हुए कहता है कि एक दिन पहले इन लोगों ने उस पर पत्थर फेंके थे.

कैम्प के दरवाज़े पर ही कच्चे मांस के बैग रखे हुए दिखते हैं, जिन्हें गंदे तरीके से बांधा हुआ है. वहां मौजूद महिलाएं कई देशों से आई हैं, जिसमें ब्राज़ील, जर्मनी, फ़्रांस, मोरक्को, सोमालिया और भी कई देश शामिल हैं.

19 वर्षीय जर्मन युवती लियोर्ना मेसिंग बताती हैं कि इस कैंम्प में ट्यूनिशिया और रूसी महिलाएं सबसे अधिक हैं.

लियोर्ना 15 साल की उम्र में आईएस में शामिल हो गई थी. उन्होंने वहां एक जर्मन चरमपंथी लड़ाके से शादी कर ली. वो उस लड़ाके की तीसरी पत्नी बनी. फिलहाल उनका पति कुर्दिश सेना की हिरासत में है.

Image caption कैम्प में मौजूद एक जर्मन युवती लियोर्ना मेसिंग

लियोर्ना को अब अपने फ़ैसले पर अफसोस है. वो कहती हैं, "मैंने आईएसआईएस में जाने के छह महीने बाद अपने पिता से मदद मांगी, मेरे पिता ने एक आदमी को मेरी मदद के लिए भेजा लेकिन आईएस के लोगों ने उसे मार डाला. उसके बाद मुझे भी उन्होंने जेल में डाल दिया."

लियोर्ना की गोद में दो महीने का एक बच्चा किलकारियां मार रहा था. ये उनका दूसरा बच्चा है, जिसका जन्म बाग़ूज में ही हुआ है.

वो बताती हैं कि इस बच्चे के जन्म के वक़्त वो बिलकुल अकेली थीं, उनके पास न कोई डॉक्टर या था ना ही कोई नर्स.

लियोर्ना को आज भी अपने पति से प्रेम है. वो कहती हैं कि वो अपने पति का अंतिम वक़्त तक इंतज़ार करेंगी.

अल होल कैम्प में लगातार लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि आख़िर इसे संचालित करने वाले पश्चिमी ताकतें कब तक इन लोगों को यहां पनाह देते रहेंगे.

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